भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2417

400 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/28-32 ] पद्मपुराणमें— “न शूद्रा भगवद्भक्तास्ते तु भागवता मताः। सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने॥” “श्वपाकमिव नेक्षेत लोके विप्रमवैष्णवम्। वैष्णवो वर्णबाह्योऽपि पुनाति भुवनत्रयम्॥” “शूद्रं वा भगवद्भक्तं निषादं श्वपचं तथा। वीक्ष्यते जातिसामान्यात् स याति नरकं ध्रुवम्॥” [अर्थात् “भगवद्भक्त ‘शूद्र’ नहीं हैं, उन्हें ‘भागवत’ कहा जाता है। जो भगवान् श्रीजनार्दनके भक्त नहीं हैं, वे ही सभी वर्णोंमें शूद्र हैं। जगत्में जिस प्रकार कुत्तेका माँस खानेवाले चण्डालका दर्शन नहीं करना चाहिये, उसी प्रकार किसी ब्राह्मणके अवैष्णव होनेपर उसका दर्शन करना भी निषिद्ध है। किन्तु वैष्णव यदि वर्णके बाहर भी हों, तो वे त्रिभुवनको पवित्र करते हैं। जो भगवद्भक्तको ‘शूद्र’ अथवा ‘निषाद’ या ‘चण्डाल’ आदि रूपमें साधारण जाति-बुद्धिके अनुसार दर्शन करता है, वह निश्चित रूपसे नरकगामी होता है।”] गरुड़पुराणमें— “भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते। स विप्रेन्द्रो मुनिश्रेष्ठः स ज्ञानी स च पण्डितः॥” [अर्थात् “यह आठ प्रकारकी भक्ति जिस म्लेच्छकुलमें उत्पन्न व्यक्तिमें भी विद्यमान रहती है, उसे ब्राह्मणोंमें प्रधान, मुनियोंमें श्रेष्ठ, ज्ञानी और पण्डित समझना चाहिये।”] तत्त्वसागरमें— “यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः। तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥” [अर्थात् “जिस प्रकार काँसा-धातु रसविधानसे (किसी रसायनिक विधिसे) स्वर्णताको प्राप्त करती है अर्थात् स्वर्ण बन जाती है, उसी प्रकार मनुष्योंको दीक्षा-विधानके द्वारा ब्राह्मणताकी प्राप्ति हुआ करती है।”] ऐसे बहुतसे शास्त्रीय-वचनोंमें वैष्णवोंमें अप्राकृत- ब्राह्मणता नित्य अनुस्यूत (ग्रंथित) है, ऐसा जाना जाता है। अतएव नीचकुलमें उत्पन्न व्यक्तिका भी श्रीकृष्णके प्रति भक्तिमान् होनेपर तब उसका नीच-जातित्व नहीं रहता। 'मैं वैष्णव नहीं हूँ,'—यह श्रीझडु-ठाकुरकी वैष्णवोचित उदारता है और उनके अपने निरभिमानी होनेका सूचकमात्र है, 'मेरे-अतिरिक्त अन्य समस्त कृष्णभक्तोंका ही शास्त्रीय-सत्यके अनुसार उत्तम-अधिकार है; और केवलमात्र मैं ही भक्तिहीन हूँ एवं नीच-कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ; मुझमें उच्च-अधिकारको प्राप्त करनेकी शक्ति नहीं हैं',—आदि शुद्धभक्तोचित दैन्य-उक्ति ही वास्तविक देहात्मबुद्धिसे मुक्त महाभागवतोंका स्वभाव है॥ 28-29 ॥ मानद झडु-ठाकुरके द्वारा कुछ दूरी तक श्रीकालिदासके पीछे चलना, और फिर अपने घर लौटना :— ताँरे नमस्करि’ कालिदास विदाय मागिला। झडुठाकुर तबे ताँर अनुव्रजि’ आइला ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासने श्रीझडु ठाकुरको नमस्कार करके उनसे विदायी माँगी। श्रीझडु ठाकुर कुछ दूर तक उनके पीछे चल करके अपने घरपर लौट आये॥ 30 ॥ अनुभाष्य—'अनुव्रजि',—पीछे-पीछे आकर ॥ 30 ॥ ताँरे विदाय दिया ठाकुर यदि घरे आइल। ताँर चरण-चिह्न येइ ठाञि पड़िल ॥ 31 ॥ झडु ठाकुरके लौट जानेपर श्रीकालिदासके द्वारा अपने समस्त अङ्गोंपर उन्हें वैष्णव मानकर उनके चरणकी धूलिको लेकर मलना :— सेइ धूलि लञा कालिदास सर्वाङ्गे लेपिला। ताँर निकट एकस्थाने लुकाञा रहिला ॥ 32 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासको विदायी देकर श्रीझडु ठाकुर जब अपने घर लौट गये, तब जहाँ-जहाँपर उनके चरणोंके चिह्न पड़े थे, श्रीकालिदासने उन स्थानोंकी रजको लेकर अपने समस्त अङ्गोंपर लगाया और फिर