श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमद्भागवत (3/33/7)में — अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥27॥ अनुवाद—हे भगवन्, जिनके मुखमें आपका नाम वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस खानेवाले) होनेपर भी श्रेष्ठ हैं। जो आपका नाम कीर्तन करते हैं, उन्होंने सब प्रकारकी तपस्या कर ली है, समस्त यज्ञ कर लिये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया है एवं अङ्गसहित समस्त वेदोंका पाठ कर लिया है, इसलिये उनकी आर्योंमें गणना होती है ॥27॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 11/192 संख्या देखें ॥27॥ श्रीकृष्णभक्तकी पदवीका निर्णय :— शुनि' ठाकुर कहे,—“शास्त्र, एड् सत्य हय। सेइ नीच নহে,—याँते कृष्णभक्ति हय ॥ 28॥ श्रीकृष्णभक्तोंका जड़ीय-अभिमानशून्य अप्राकृत-अभिमानमय अमानी होना और सम्मान प्रदान करना :— आमि—नीचजाति, आमार नाहि कृष्णभक्ति। अन्य ऐछे हय, आमाय नाहि ऐछे शक्ति ॥”29॥ अनुवाद—शास्त्रोंके इन श्लोकोंको सुनकर श्रीझाडु ठाकुरने कहा,—“शास्त्रोंमें कही गयीं ये बातें सत्य ही हैं कि वह व्यक्ति नीच नहीं है, जिसमें कृष्णभक्ति हो। किन्तु मैं नीच जातिका व्यक्ति हूँ और मुझमें कृष्णभक्ति भी नहीं है। उपरोक्त श्लोकोंमें कही गयीं बातें अन्य निम्न कुलमें उत्पन्न कृष्णभक्तोंके लिये उपयुक्त हैं, किन्तु मुझमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति नहीं है॥”28-29॥ अनुभाष्य—महाभारतके वनपर्वमें 180 अः— “शूद्रे तु यद्भवेलक्ष्म द्विज्ये तच्च न विद्यते। न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥” उसी वनपर्वमें 211 अः— “शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः। आर्जवे वर्त्तमानस्य ब्राह्मण्यमभि-जायते ॥” [अर्थात् “शूद्रमें यदि विप्रके लक्षण दिखलायी दें एवं यदि ब्राह्मणमें वे लक्षण न हों, तब वह शूद्र-कुलमें उत्पन्न व्यक्ति शूद्र नहीं है और ब्राह्मण-वंशमें उत्पन्न व्यक्ति भी ब्राह्मण नहीं है। शूद्र योनिमें जन्म ग्रहण करनेपर भी यदि उसमें सद्गुणसमूह विद्यमान हो, उन गुणोंमें-से 'सरलता'-नामक गुणके रहनेपर उसमें ब्राह्मणता मानी जाती है।”] महाभारतके अनुशासन पर्वके 163 अः— “स्थितो ब्राह्मण-धर्मेण ब्राह्मण्यमुपजीवति। क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयः स गच्छति॥ एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा। शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत्॥ न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं न च सन्ततिः। कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम्॥” [अर्थात् “ब्राह्मण धर्मके द्वारा ब्राह्मणता होती है—उस धर्ममें स्थित होकर कोई क्षत्रिय अथवा वैश्य भी ब्रह्मत्व प्राप्त करता है। हे देवि! इन समस्त शुभकर्मोंके आचरणके द्वारा शूद्र भी ब्राह्मणता प्राप्त करता है एवं वैश्य क्षत्रियत्व प्राप्त करता है। जन्म, संस्कार, वेदाध्ययन और सन्तान होना—ब्राह्मणताका कारण नहीं है, स्वभाव ही एकमात्र कारण है।”] (भाः 4/21/12)— “सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैक-दण्डधृक्। अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः॥” [अर्थात् “सप्तद्वीपवाली पृथ्वीके एकछत्र दण्ड- विधाता सम्राट पृथु महाराजकी आज्ञा ऋषिकुल ब्राह्मण और अच्युत गोत्रीय वैष्णवोंके अतिरिक्त अन्य सर्वत्र ही पालनीय थी।”] (भाः 7/11/35)— “यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्। यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥” [अर्थात् “मनुष्योंके वर्णका बोध करानेवाले जो समस्त लक्षण कहे गये हैं, उनमेंसे जो लक्षण जिस स्थानपर लक्षित होंगे, उन्हीं लक्षणोंके द्वारा ही उसी वर्णका कहकर उस व्यक्तिको निर्देश करना होगा।”]