श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
श्रीमद्भागवत (3/33/7)में — अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥27॥ अनुवाद—हे भगवन्, जिनके मुखमें आपका नाम वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस खानेवाले) होनेपर भी श्रेष्ठ हैं। जो आपका नाम कीर्तन करते हैं, उन्होंने सब प्रकारकी तपस्या कर ली है, समस्त यज्ञ कर लिये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया है एवं अङ्गसहित समस्त वेदोंका पाठ कर लिया है, इसलिये उनकी आर्योंमें गणना होती है ॥27॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 11/192 संख्या देखें ॥27॥ श्रीकृष्णभक्तकी पदवीका निर्णय :— शुनि' ठाकुर कहे,—“शास्त्र, एड् सत्य हय। सेइ नीच নহে,—याँते कृष्णभक्ति हय ॥ 28॥ श्रीकृष्णभक्तोंका जड़ीय-अभिमानशून्य अप्राकृत-अभिमानमय अमानी होना और सम्मान प्रदान करना :— आमि—नीचजाति, आमार नाहि कृष्णभक्ति। अन्य ऐछे हय, आमाय नाहि ऐछे शक्ति ॥”29॥ अनुवाद—शास्त्रोंके इन श्लोकोंको सुनकर श्रीझाडु ठाकुरने कहा,—“शास्त्रोंमें कही गयीं ये बातें सत्य ही हैं कि वह व्यक्ति नीच नहीं है, जिसमें कृष्णभक्ति हो। किन्तु मैं नीच जातिका व्यक्ति हूँ और मुझमें कृष्णभक्ति भी नहीं है। उपरोक्त श्लोकोंमें कही गयीं बातें अन्य निम्न कुलमें उत्पन्न कृष्णभक्तोंके लिये उपयुक्त हैं, किन्तु मुझमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति नहीं है॥”28-29॥ अनुभाष्य—महाभारतके वनपर्वमें 180 अः— “शूद्रे तु यद्भवेलक्ष्म द्विज्ये तच्च न विद्यते। न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥” उसी वनपर्वमें 211 अः— “शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः। आर्जवे वर्त्तमानस्य ब्राह्मण्यमभि-जायते ॥” [अर्थात् “शूद्रमें यदि विप्रके लक्षण दिखलायी दें एवं यदि ब्राह्मणमें वे लक्षण न हों, तब वह शूद्र-कुलमें उत्पन्न व्यक्ति शूद्र नहीं है और ब्राह्मण-वंशमें उत्पन्न व्यक्ति भी ब्राह्मण नहीं है। शूद्र योनिमें जन्म ग्रहण करनेपर भी यदि उसमें सद्गुणसमूह विद्यमान हो, उन गुणोंमें-से 'सरलता'-नामक गुणके रहनेपर उसमें ब्राह्मणता मानी जाती है।”] महाभारतके अनुशासन पर्वके 163 अः— “स्थितो ब्राह्मण-धर्मेण ब्राह्मण्यमुपजीवति। क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयः स गच्छति॥ एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा। शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत्॥ न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं न च सन्ततिः। कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम्॥” [अर्थात् “ब्राह्मण धर्मके द्वारा ब्राह्मणता होती है—उस धर्ममें स्थित होकर कोई क्षत्रिय अथवा वैश्य भी ब्रह्मत्व प्राप्त करता है। हे देवि! इन समस्त शुभकर्मोंके आचरणके द्वारा शूद्र भी ब्राह्मणता प्राप्त करता है एवं वैश्य क्षत्रियत्व प्राप्त करता है। जन्म, संस्कार, वेदाध्ययन और सन्तान होना—ब्राह्मणताका कारण नहीं है, स्वभाव ही एकमात्र कारण है।”] (भाः 4/21/12)— “सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैक-दण्डधृक्। अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः॥” [अर्थात् “सप्तद्वीपवाली पृथ्वीके एकछत्र दण्ड- विधाता सम्राट पृथु महाराजकी आज्ञा ऋषिकुल ब्राह्मण और अच्युत गोत्रीय वैष्णवोंके अतिरिक्त अन्य सर्वत्र ही पालनीय थी।”] (भाः 7/11/35)— “यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्। यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥” [अर्थात् “मनुष्योंके वर्णका बोध करानेवाले जो समस्त लक्षण कहे गये हैं, उनमेंसे जो लक्षण जिस स्थानपर लक्षित होंगे, उन्हीं लक्षणोंके द्वारा ही उसी वर्णका कहकर उस व्यक्तिको निर्देश करना होगा।”]
400 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/28-32 ] पद्मपुराणमें— “न शूद्रा भगवद्भक्तास्ते तु भागवता मताः। सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने॥” “श्वपाकमिव नेक्षेत लोके विप्रमवैष्णवम्। वैष्णवो वर्णबाह्योऽपि पुनाति भुवनत्रयम्॥” “शूद्रं वा भगवद्भक्तं निषादं श्वपचं तथा। वीक्ष्यते जातिसामान्यात् स याति नरकं ध्रुवम्॥” [अर्थात् “भगवद्भक्त ‘शूद्र’ नहीं हैं, उन्हें ‘भागवत’ कहा जाता है। जो भगवान् श्रीजनार्दनके भक्त नहीं हैं, वे ही सभी वर्णोंमें शूद्र हैं। जगत्में जिस प्रकार कुत्तेका माँस खानेवाले चण्डालका दर्शन नहीं करना चाहिये, उसी प्रकार किसी ब्राह्मणके अवैष्णव होनेपर उसका दर्शन करना भी निषिद्ध है। किन्तु वैष्णव यदि वर्णके बाहर भी हों, तो वे त्रिभुवनको पवित्र करते हैं। जो भगवद्भक्तको ‘शूद्र’ अथवा ‘निषाद’ या ‘चण्डाल’ आदि रूपमें साधारण जाति-बुद्धिके अनुसार दर्शन करता है, वह निश्चित रूपसे नरकगामी होता है।”] गरुड़पुराणमें— “भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते। स विप्रेन्द्रो मुनिश्रेष्ठः स ज्ञानी स च पण्डितः॥” [अर्थात् “यह आठ प्रकारकी भक्ति जिस म्लेच्छकुलमें उत्पन्न व्यक्तिमें भी विद्यमान रहती है, उसे ब्राह्मणोंमें प्रधान, मुनियोंमें श्रेष्ठ, ज्ञानी और पण्डित समझना चाहिये।”] तत्त्वसागरमें— “यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः। तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥” [अर्थात् “जिस प्रकार काँसा-धातु रसविधानसे (किसी रसायनिक विधिसे) स्वर्णताको प्राप्त करती है अर्थात् स्वर्ण बन जाती है, उसी प्रकार मनुष्योंको दीक्षा-विधानके द्वारा ब्राह्मणताकी प्राप्ति हुआ करती है।”] ऐसे बहुतसे शास्त्रीय-वचनोंमें वैष्णवोंमें अप्राकृत- ब्राह्मणता नित्य अनुस्यूत (ग्रंथित) है, ऐसा जाना जाता है। अतएव नीचकुलमें उत्पन्न व्यक्तिका भी श्रीकृष्णके प्रति भक्तिमान् होनेपर तब उसका नीच-जातित्व नहीं रहता। 'मैं वैष्णव नहीं हूँ,'—यह श्रीझडु-ठाकुरकी वैष्णवोचित उदारता है और उनके अपने निरभिमानी होनेका सूचकमात्र है, 'मेरे-अतिरिक्त अन्य समस्त कृष्णभक्तोंका ही शास्त्रीय-सत्यके अनुसार उत्तम-अधिकार है; और केवलमात्र मैं ही भक्तिहीन हूँ एवं नीच-कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ; मुझमें उच्च-अधिकारको प्राप्त करनेकी शक्ति नहीं हैं',—आदि शुद्धभक्तोचित दैन्य-उक्ति ही वास्तविक देहात्मबुद्धिसे मुक्त महाभागवतोंका स्वभाव है॥ 28-29 ॥ मानद झडु-ठाकुरके द्वारा कुछ दूरी तक श्रीकालिदासके पीछे चलना, और फिर अपने घर लौटना :— ताँरे नमस्करि’ कालिदास विदाय मागिला। झडुठाकुर तबे ताँर अनुव्रजि’ आइला ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासने श्रीझडु ठाकुरको नमस्कार करके उनसे विदायी माँगी। श्रीझडु ठाकुर कुछ दूर तक उनके पीछे चल करके अपने घरपर लौट आये॥ 30 ॥ अनुभाष्य—'अनुव्रजि',—पीछे-पीछे आकर ॥ 30 ॥ ताँरे विदाय दिया ठाकुर यदि घरे आइल। ताँर चरण-चिह्न येइ ठाञि पड़िल ॥ 31 ॥ झडु ठाकुरके लौट जानेपर श्रीकालिदासके द्वारा अपने समस्त अङ्गोंपर उन्हें वैष्णव मानकर उनके चरणकी धूलिको लेकर मलना :— सेइ धूलि लञा कालिदास सर्वाङ्गे लेपिला। ताँर निकट एकस्थाने लुकाञा रहिला ॥ 32 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासको विदायी देकर श्रीझडु ठाकुर जब अपने घर लौट गये, तब जहाँ-जहाँपर उनके चरणोंके चिह्न पड़े थे, श्रीकालिदासने उन स्थानोंकी रजको लेकर अपने समस्त अङ्गोंपर लगाया और फिर
[ 16/31-41 सोलहवाँ अध्याय 401
वे उनके घरके निकट ही किसी एक स्थानपर छिप गये॥ 31-32॥ समस्त ब्राह्मणोंके गुरु झडु-ठाकुरके द्वारा मनोमयी अर्च्चाके मानस-पूजनके बाद श्रीकृष्णका उच्छिष्ट मानकर आमको खाना :- झडुठाकुर घर याइ' देखि' आम्रफल। मानसेइ कृष्णचन्द्रे अर्पिला सकल॥ 33॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने अपने घर जाकर जब श्रीकालिदासके द्वारा भेंटमें लाये आमोंको देखा, तब उन्होंने मन-ही-मन श्रीकृष्णचन्द्रको समस्त आम अर्पित किये॥ 33॥ कलार पाटुया खोला हैते आम्र निकालिया। ताँर पत्नी ताँरे देन, खायेन चुषिया॥ 34॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीने केलेके पेड़के पत्ते और छालसे बने दोनेमें-से आम निकालकर उन्हें दिये और श्रीझडु ठाकुरने उन्हें चूसकर खाया॥ 34॥ अनुभाष्य—'पाटुया-खोला',—पत्ते और छाल; 'निकालिया',—बाहर निकाल करके॥ 34॥ वैष्णव-पत्नीके द्वारा वैष्णव-पतिके उच्छिष्टका सम्मान :- चुषि' चुषि' चोषा आठि फेलिला पाटुयाते। ताँरे खाओयाञा ताँर पत्नी खाय पश्चाते॥ 35॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने आमकी गुठलियोंको भी चूस-चूसकर उसे उसी दोनेमें डाल दिया। श्रीझडु ठाकुरको आम खिलानेके बाद उनकी पत्नीने स्वयं भी आम खाये॥ 35॥ आठि-चोषा सेइ पाटुया-खोलाते भरिया। बाहिरे उच्छिष्ट-गर्त्ते फेलाइला लञा॥ 36॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीने भी आमकी गुठलियोंको उसी दोनेमें भरकर उसे अपने घरके बाहर बने जूठन फेंकनेवाले गड्ढेमें फेंक दिया॥ 36॥ महासौभाग्यवान् श्रीकालिदासके द्वारा अति आनन्दसे अप्राकृत-बुद्धिसे वैष्णव-उच्छिष्टका सम्मान :- सेइ खोला, आठि, चोकला चुषे कालिदास। चुषिते चुषिते हय प्रेमेते उल्लास॥ 37॥ अनुवाद—श्रीकालिदास उस दोनेको और उसमें पड़ी गुठलियों तथा आमके छिलकोंको चूसने लगे। चूसते-चूसते वे प्रेममें आविष्ट हो गये॥ 37॥ अनुभाष्य—'चोकला',—छिलका॥ 37॥ गौड़देशके समस्त वैष्णवोंके उच्छिष्टका सम्मान करनेवाले श्रीकालिदास :- एइमत यत वैष्णव वैसे गौड़देशे। कालिदास ऐछे सबार निला अवशेषे॥ 38॥ अनुवाद—जितने भी वैष्णव गौड़देशमें रहते थे, श्रीकालिदासने इसी प्रकार उन सबके उच्छिष्टको ग्रहण किया॥ 38॥ पुरीमें आनेपर श्रीकालिदासके प्रति महाप्रभुके द्वारा उनपर निष्कपट महाकृपा :- सेइ कालिदास यबे नीलाचले आइला। महाप्रभु ताँर उपर महाकृपा कैला॥ 39॥ अनुवाद—वे श्रीकालिदास जब श्रीजगन्नाथपुरीमें आये, तब महाप्रभुने उनके ऊपर महान कृपा की॥ 39॥ महाप्रभुके कमण्डलुके वाहक श्रीगोविन्द :- प्रतिदिन प्रभु यदि यान दरशने। जल-करङ्ग लञा गोविन्द याय प्रभु-सने॥ 40॥ अनुवाद—प्रतिदिन जब महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये जाते थे, तब श्रीगोविन्द जलसे भरे कमण्डलुको अपने हाथमें लेकर महाप्रभुके साथ-साथ चलते थे॥ 40॥ सिंहद्वारके निकट सीढ़ीके नीचे गड्ढेमें महाप्रभुके चरणोंको धुलवाना :- सिंहद्वारेर उत्तरदिके कपाटेर आड़े। बाइश 'पहाच'-तले आछे एक निम्न गाड़े॥ 41॥
402 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/41-49 ] सेइ गाड़े करेन प्रभु पादप्रक्षालने। तबे करिबारे याय ईश्वर-दरशने॥42॥ अनुवाद—सिंहद्वारकी उत्तर दिशामें कपाटके पीछे श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी ओर जानेवाली बाईस सीढ़ियोंसे पहले भूमिपर एक गड्ढा बना हुआ था। श्रीगोविन्द महाप्रभुके चरणोंको उसी गड्ढेमें ही धुलाते थे, उसके पश्चात् ही महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये मन्दिरमें जाते थे॥41-42॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बाइश पहाच',—बाइस 'पाहाच', उड़ीसाके लोग एक-एक सीढ़ीको 'पाहाच' कहते हैं। सिंहद्वारसे मन्दिरकी ओर जानेके लिये बाइस सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं॥41॥ अनुभाष्य—'आड़े',—आड़में, बीचके स्थानमें; वर्तमान समयमें ये सब स्थान खाली नहीं हैं, वहाँ घर आदि बन गये हैं। 'गाड़े',—गड्ढेमें॥41॥ लोक-शिक्षक आचार्यरूपी महाप्रभुका कठोर नियम :— गोविन्देरे महाप्रभु कैराछे नियम। “मोर पादजल येन ना लय कोनजन ॥” 43 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दको एक नियम बतलाया था,—“कोई भी मेरा चरणजल न ले॥” 43 ॥ अति अन्तरङ्ग भक्तके अतिरिक्त अन्य सभीका महाप्रभुके चरणामृतमें अनधिकार :— प्राणिमात्र लइते ना पाय सेइ जल। अन्तरङ्ग भक्त लय करि' कोन छल॥44॥ अनुवाद—कोई भी प्राणी महाप्रभुके चरणोंके जलको नहीं ले सकता था, केवलमात्र अन्तरङ्ग भक्त ही किसी छलसे उसे ले लेते थे॥44॥ श्रीकालिदासके द्वारा महाप्रभुके चरणामृतको ग्रहण करनेके उद्देश्यसे उनके निकट हाथ फैलाना :— एकदिन प्रभु ताँहा पाद प्रक्षालिते। कालिदास आसिं' ताँहा पातिलेन हाते॥45॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु अपने श्रीचरण धो रहे थे, तब श्रीकालिदासने वहाँ आकर अपना हाथ फैला दिया॥45॥ तीन बार अञ्जलीसे महाप्रभुके चरणामृतको पान करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा निषेध :— एक अञ्जलि, दुइ अञ्जलि, तिन अञ्जलि पिला। तबे महाप्रभु ताँरे निषेध करिला॥46॥ महाप्रभुके द्वारा अपने चरणामृतको प्रदान करनेके बाद पुनः ग्रहण करनेके लिये निषेध :— “अतःपर आर ना करिह पुनर्बार। एतावता वाञ्छा पूरण करिनुँ तोमार ॥” 47 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासने जब महाप्रभुके चरणजलकी एक अञ्जलि, दूसरी अञ्जलि और तीसरी अञ्जलि भरकर पी ली, तब महाप्रभुने श्रीकालिदासको और लेनेसे मना करते हुए कहा,—“अब इसके उपरान्त पुनः ऐसा मत करना। मैंने अब तककी तुम्हारी अभिलाषाको पूर्ण किया है॥” 46-47 ॥ अनुभाष्य—'एतावता',—अब तक॥47॥ अन्तर्यामी परमेश्वर श्रीगौरसुन्दर :— सर्वज्ञ-शिरोमणि चैतन्य ईश्वर। वैष्णवे ताँहार विश्वास जानेन अन्तर॥48॥ वैष्णवोंमें अप्राकृत श्रद्धाके कारण श्रीकालिदासके लिये ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ कृपाका प्रदर्शन :— सेइ गुण लञा प्रभु ताँरे तुष्ट हइला। अन्येरे दुर्लभ प्रसाद ताँहारे करिला ॥ 49 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु ईश्वर होनेके कारण सर्वज्ञोंके भी शिरोमणि हैं। महाप्रभु जानते थे कि श्रीकालिदासका हृदयकी गहराइयों तक वैष्णवोंके प्रति दृढ़ विश्वास है। इसी गुणके कारण महाप्रभुने उनसे सन्तुष्ट होकर उनके प्रति ऐसी कृपा की जो अन्योंके लिये अति दुर्लभ है॥48-49॥
[ 16/50-55 सोलहवाँ अध्याय 403 महाप्रभुके द्वारा श्रीनृसिंह-प्रणाम :- बाइश 'पहाच'-पाछे उपर दक्षिण-दिके। एक नृसिंह-मूर्ति आछेन उठिते वामभागे ॥ 50 ॥ प्रतिदिन ताँरे प्रभु करेन नमस्कार। नमस्करि' एइ श्लोक पड़े बार बार ॥ 51 ॥ अनुवाद-दक्षिण-दिशामें बाईस सीढ़ियोंके पीछे ऊपरकी ओर श्रीनृसिंह भगवान्का एक विग्रह है, जो सीढ़ियोंसे चढ़कर मन्दिर जाते समय बायीं ओर पड़ता है। महाप्रभु प्रतिदिन श्रीनृसिंह भगवान्के उस श्रीविग्रहको नमस्कार करते और नमस्कार करनेके पश्चात् यह निम्नलिखित श्लोक बार बार पढ़ते ॥ 50-51 ॥ शुद्धभक्ति प्रचारक भक्तोंके एकमात्र रक्षक, पाखण्डियोंका दमन करनेवाले, भक्तप्रिय श्रीनृसिंहको प्रणाम :- नृसिंह-पुराणके दो वचन— नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाददायिने। हिरण्यकशिपोर्वक्षःशिलाटङ्क-नखालये ॥ 52 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रह्लादको आनन्द प्रदान करनेवाले नृसिंहको नमस्कार है; हिरण्यकशिपुकी वक्षरूपी शिलाको विदीर्ण करनेमें समर्थ नखोंको धारण करनेवाले नृसिंहको नमस्कार है ॥ 52 ॥ अनुभाष्य- हिरण्यकशिपोः (कश्यपतनयस्य प्रह्लादपितुः विष्णु-वैष्णव- विरोघिनः दैत्यराजस्य) वक्षःशिलाटङ्कनखालये (वक्षः एव शिलाः तस्याः टङ्कः पाषाण-विदारकास्त्रविशेषः, टङ्कः एव नखानां आलिः श्रेणी यस्य तस्मै) प्रह्लादाह्लाद-दायिने (हिरण्यकशिपोः तनयस्य शुद्धवैष्णवप्रवरस्य आनन्ददात्रे) नरसिंहाय (नृसिंहदेवाय) ते (तुभ्यं) नमः। श्लोक-भावानुवाद-कश्यप ऋषिके पुत्र और प्रह्लादके पिता विष्णु-वैष्णव-विरोधी दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षरूपी शिलाको पत्थर काटनेकी छेनीके समान नखश्रेणीवाले और शुद्धवैष्णवोंमें प्रधान हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लादको आनन्द प्रदान करनेवाले नृसिंहदेवको नमस्कार करता हूँ॥ 52 ॥ शुद्धभक्ति-प्रचारकोंके द्वारा सर्वत्र ही अधोक्षज श्रीनृसिंहदेवका अपने रक्षकके रूपमें दर्शन :- इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो यतो यतो यामि ततो नृसिंहः। बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो नृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये ॥ 53 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस ओर [देवीधाममें] नृसिंह, उस ओर [परव्योममें] नृसिंह, जहाँ जहाँ जाता हूँ, उस स्थानपर नृसिंह ही हैं, बाहर भी नृसिंह हैं, और हृदयमें नृसिंह हैं,-ऐसे उन आदि-नृसिंहके मैं शरणागत होता हूँ॥ 53 ॥ अनुभाष्य- इतः (अस्मिन् स्थाने देवीधाम्नि) नृसिंहः, परतः (परव्योम्नि) नृसिंहः, यतः यतः (यत्र यत्र) [प्रति-] यामि, ततः (तत्र) नृसिंहः, बहिः (प्रपञ्चे) नृसिंहः, हृदये (अन्तर्जगति) नृसिंहः [स्फुरति]; अतः आदिम् (आदिदेवं सर्वमूलं) नृसिंहम् [अहं] शरणं प्रपद्ये (आश्रये इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ महाप्रभुके द्वारा प्रसादका भोजन :- तबे प्रभु करिला जगन्नाथ दरशन। घरे आसि' करिला मध्याह्न-भोजन ॥ 54 ॥ अनुवाद-श्रीनृसिंहदेवको नमस्कार करनेके पश्चात् महाप्रभुने भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन किये। तब अपने निवास स्थानपर आकर मध्याह्न-कृत्य समाप्त करके भोजन किया ॥ 54 ॥ उच्छिष्ट प्राप्तिकी प्रतीक्षामें खड़े श्रीकालिदासको महाप्रभुकी इच्छाके अनुसार उनके उच्छिष्टका दान :- बहिद्वारे आछे कालिदास प्रत्याशा करिया। गोविन्देरे ठारे प्रभु कहेन जानिया ॥ 55 ॥
404 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/55–64 ] अनुवाद—श्रीकालिदास महाप्रभुके वासस्थानके बाहर द्वारपर मनमें कुछ आशा लेकर खड़े थे। महाप्रभु उनके हृदयकी बातको जानते थे, इसलिये उन्होंने सङ्केतसे श्रीगोविन्दसे कुछ कहा॥ 55 ॥ अनुभाष्य—'ठारे',—इशारेसे, सङ्केतसे ॥ 55 ॥ प्रभुर इङ्गिते गोविन्द सब जाने। कालिदासेरे दिल प्रभुर शेषपात्र दाने॥ 56 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके सङ्केतोंको श्रीगोविन्द भली-भाँति समझते थे, इसलिये उन्होंने श्रीकालिदासको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रदान किया ॥ 56 ॥ महाप्रभुकी चरम कृपा प्राप्तिका एकमात्र कारण :— वैष्णवेर शेष-भक्षणेर एतेक महिमा। कालिदासे पाओयाइल प्रभुर कृपा-सीमा ॥ 57 ॥ अनुवाद—वैष्णवोंके उच्छिष्टको खानेकी इतनी महिमा है कि उसीने श्रीकालिदासको महाप्रभुकी चरम कृपाको प्राप्त करवाया॥ 57 ॥ सभी साधकोंको ग्रन्थकारका उपदेश :— ताते 'वैष्णवेर झूटा' खाओ छोड़ि' घृणा-लाज। याहा हैते पाइबा वाञ्छित सब काज ॥ 58 ॥ अनुवाद—इसलिये आप घृणा और लज्जाका त्याग करके वैष्णवोंका जूठा खाओ, जिसके द्वारा आपकी समस्त वाञ्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी ॥ 58 ॥ कृष्णके उच्छिष्ट और भक्तके उच्छिष्टकी संज्ञा :— कृष्णेर उच्छिष्ट हय 'महाप्रसाद'–नाम। 'भक्तशेष' हैले महा–महाप्रसादाख्यान ॥ 59 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके उच्छिष्टका नाम 'महाप्रसाद' होता है। उस महाप्रसादको भक्तोंके द्वारा ग्रहण करनेके पश्चात् उनका उच्छिष्ट महा-महाप्रसाद कहलाता है॥ 59 ॥ साधकको चित्-बल प्रदान करनेवाली तीन अप्राकृत वस्तुएँ :— भक्तपदधूलि आर भक्तपद-जल। भक्तभुक्त-शेष,–एइ तिन साधनेर बल ॥ 60 ॥ अनुवाद—भक्तोंके चरणोंकी धूलि, भक्तोंके चरणोंका जल और भक्तोंका उच्छिष्ट—ये तीन भक्तिसाधनके बल हैं ॥ 60 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तिन साधनेर बल',—भक्तकी चरणधूलिको ग्रहण करना, भक्तोंके चरणोंके जलको ग्रहण करना और भक्तोंके अधरामृतको ग्रहण करना—ये तीनों ही समस्त साधनोंके बलस्वरूप हैं॥ 60 ॥ उपरोक्त तीन वस्तुओंका सेवन ही परमपुरुषार्थरूपी प्रयोजनकी प्राप्तिका सर्वशास्त्र-सम्मत एकमात्र उपाय :— एइ तिन-सेवा हैते कृष्णप्रेमा हय। पुनः पुनः सर्वशास्त्रे फुकारिया कय ॥ 61 ॥ परमपुरुषार्थ प्रेमको प्राप्त करनेके इच्छुक समस्त साधकोंको ग्रन्थकारके द्वारा अनुरोधपूर्वक उपदेश :— ताते बार बार कहि,–शुन, भक्तगण। विश्वास करिया कर ए तिन-सेवन ॥ 62 ॥ उक्त तीनों साधन ही श्रीकृष्णनाम-प्रेम-कृपाको प्राप्त करवानेके एकमात्र उपाय :— तिन हैते कृष्णनाम-प्रेमेर उल्लास। कृष्णेर प्रसाद, ताते 'साक्षी' कालिदास ॥ 63 ॥ भक्तोंके उच्छिष्टमें विश्वासके कारण ही श्रीकालिदासको पुरीमें भगवान्की कृपाकी प्राप्ति :— नीलाचले महाप्रभु रहे एइमते। कालिदासे महाकृपा कैला अलक्षिते ॥ 64 ॥ अनुवाद—उपरोक्त तीन वस्तुओंके सेवनसे कृष्णप्रेमकी प्राप्ति होती है, सभी शास्त्र पुनः पुनः इसकी उच्च स्वरसे घोषणा करते हैं। इसलिये हे भक्तों, सुनो! मैं बार बार कह रहा हूँ कि आप विश्वास करके इन तीनों वस्तुओंका सेवन करो। इनके सेवनसे शुद्धकृष्णनाम और उसके द्वारा परम पुरुषार्थ प्रेमकी प्राप्ति होती है।
[ 16/61-73 सोलहवाँ अध्याय 405 इसके द्वारा श्रीकृष्णकी कृपा मिलती है, इसके साक्षी श्रीकालिदास हैं। महाप्रभु नीलाचलमें इस प्रकार रहते हुए लीलाएँ कर रहे थे और उन्होंने अलक्षित रूपमें श्रीकालिदासपर महाकृपा की॥ 61-64 ॥ रथ-यात्राके उपलक्ष्यमें श्रीशिवानन्दका परमानन्दपुरीदास नामक पुत्रके साथ पुरीमें जाना :- से वत्सर शिवानन्द पत्नी लइया आइला। 'पुरीदास'-छोटपुत्रे सङ्गेते आनिला ॥ 65 ॥ अनुवाद-उस वर्ष श्रीशिवानन्द सेन अपने साथ अपनी पत्नी और अपने छोटे पुत्र पुरीदासको भी लाये ॥ 65 ॥ पुरीदासका महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम :- पुत्रसङ्गे लञा तैंहो आइला प्रभु-स्थाने। पुत्रेरे कराइला प्रभुर चरण वन्दने ॥ 66 ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेन अपने पुत्रको साथ लेकर महाप्रभुके वासस्थानपर आये। उन्होंने अपने पुत्रसे महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना करवायी॥ 66 ॥ उस बालकको श्रीकृष्ण-नामोच्चारणके लिये आदेश, बालकका मौनभाव :- 'कृष्ण कह' बलि' प्रभु बलेन बार बार। तबु कृष्णनाम बालक ना करे उच्चार ॥ 67 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस बालकसे बार-बार 'कृष्ण बोलो', 'कृष्ण बोलो' कहा, किन्तु तब भी बालकने कृष्णनामका उच्चारण नहीं किया॥ 67 ॥ उसके लिये श्रीशिवानन्दके द्वारा व्यर्थ प्रयत्न :- शिवानन्द बालकेरे बहु यत्न करिला। तबु सेइ बालक कृष्णनाम ना कहिला ॥ 68 ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने भी अपने बालकके मुखसे कृष्णनाम कहलवानेके लिये बहुत प्रयत्न किया, तब भी उस बालकने मुखसे कृष्णनाम नहीं कहा॥ 68 ॥ ऐसा देखकर स्वयं महाप्रभुकी विस्मययुक्त उक्ति :- प्रभु कहे,-"आमि नाम जगते लओयाइलूँ। स्थावरे पर्यन्त कृष्णनाम कहाइलूँ ॥ 69 ॥ इहारे नारिलूँ कृष्णनाम कहाइते!" शुनिया स्वरूप गोसाञि लागिला कहिते ॥ 70 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा पुरीदासके मौन रहनेके तात्पर्यकी व्याख्या :- "तुमि कृष्णनाम-मन्त्र कैला उपदेशे। मन्त्र पाञा कार आगे ना करे प्रकाशे ॥ 71 ॥ मने मने जपे, मुखे ना करे आख्यान। एइ इहार मनःकथा करि अनुमान ॥" 72 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैंने सारे जगत्को कृष्णनाम लेनेके लिये प्रेरित किया है, यहाँ तक कि मैंने स्थावर जीवोंसे भी कृष्णनाम करवाया है, किन्तु मैं इस बालकके मुखसे कृष्णनाम नहीं बुलवा पाया!" महाप्रभुके वचनोंको सुनकर श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने कहा,-"आपने इस बालकको कृष्णनाम मन्त्रका उपदेश दिया है। यह आपसे मन्त्र प्राप्त करके किसीके भी आगे उसे प्रकाशित नहीं कर रहा है। यह मन-ही-मनमें कृष्णनाम मन्त्रका जप कर रहा है, केवल मुखसे ही उसका उच्चारण नहीं कर रहा है। मैं इसके मनकी बातका यही अनुमान लगा रहा हूँ॥" 69-72 ॥ अनुभाष्य-श्रीगुरुदेवसे प्राप्त मन्त्रको अन्यके सामने प्रकाशित करनेसे मन्त्रका बल नहीं रहता; श्रीगदाधर पण्डितकी कथासे हमने पहले ही यह जाना है॥ 71 ॥ अन्यदिन महाप्रभुके आदेशसे बालक पुरीदासका मौनभङ्ग और श्लोक-पठन :- आर दिन कहेन प्रभु,-"पड़, पुरीदास।" एइ श्लोक करि' तैंहो करिला प्रकाश ॥ 73 ॥ अनुवाद-अन्य एक दिन महाप्रभुने उस बालकसे कहा,-"पुरीदास! कुछ पढ़कर सुनाओ।" तब पुरीदासने एक श्लोककी रचना करके सबके सामने सुनाया॥ 73 ॥
406 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/74-81 ] गोपीहृदय-भूषण श्रीकृष्णकी जय :- कविकर्णपूर-कृत आर्यशतकका प्रथम श्लोक- श्रवसोः कुवलयमक्षणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम। वृन्दावनरमणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ 74 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो-श्रवणयुगल (दोनों कानों) के नीलकमल हैं, नेत्रोंके अञ्जन हैं, वक्षःस्थलके महेन्द्र मणिमाला हैं, वृन्दावनकी रमणियोंके अखिल-भूषण हैं, वे हरि जययुक्त हो रहे हैं ॥ 74 ॥ अनुभाष्य- श्रवसोः (कर्णयोः) कुवलयः (नीलोत्पलं) तथा अक्षणोः (चक्षुषोः) अञ्जनं (कज्ज्वलशोभनम्) उरसः (वक्षसः) महेन्द्रमणिदाम (इन्द्रनीलमणिमाला) वृन्दावनरमणीनां (व्रजललनानाम्) अखिलं (सर्वविधं) मण्डनम् (अलङ्काररूपः) हरिः जयति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ बालकके द्वारा श्लोककी रचना करनेसे सभीको विस्मय :- सात वत्सरेर शिशु, नाहि अध्ययन। ऐछे श्लोक करे,—लोके चमत्कार मन ॥ 75 ॥ अनुवाद-सात वर्षका बालक जिसने अभी तक कुछ अध्ययन भी नहीं किया था, उसने ऐसे श्लोककी रचना की—इससे लोगोंके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 75 ॥ महाप्रभुकी कृपाके माहात्म्यका वर्णन :- चैतन्यप्रभुर एइ कृपार महिमा। ब्रह्मादि-देव यार नाहि पाय सीमा ॥ 76 ॥ अनुवाद-यह श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाकी ही महिमा है, ब्रह्मादि देवता भी इसका पार नहीं पा सकते ॥ 76 ॥ गौड़ीय भक्तोंको गौड़ जानेका आदेश :- भक्तगण प्रभुसङ्गे रहे चारिमासे। प्रभु आज्ञा दिला सबे गेला गौड़देशे ॥ 77 ॥ अनुवाद-गौड़देशसे आये भक्त महाप्रभुके साथ चार मास तक रहे, महाप्रभुके द्वारा आज्ञा देनेपर सभी गौड़देशमें लौट गये ॥ 77 ॥ गौड़ीय भक्तोंके साथ बाह्यदशामें किये गये श्रीकृष्णकथाकीर्तन-प्रचारके अतिरिक्त अन्तर्दशामें श्रीकृष्णविरहिणी गोपीभावमें उन्माद :- ताँ-सबार सङ्गे प्रभुर छिल बाह्यज्ञान। ताँरा गेले पुनः हैला उन्माद प्रधान ॥ 78 ॥ अनुवाद-जब तक गौड़देशसे आये भक्त श्रीजगन्नाथपुरीमें महाप्रभुके साथ थे, तब तक महाप्रभुको बाह्यज्ञान रहता था। उनके गौड़देशमें लौट जानेपर महाप्रभुकी पुनः उन्माद दशा ही प्रधान हो गयी ॥ 78 ॥ निरन्तर श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णसङ्गकी अनुभूति अथवा स्फूर्ति :- रात्रि दिने स्फुरे कृष्णेर रूप-गन्ध-रस। साक्षादनुभवे,—येन कृष्ण-उपस्पर्श ॥ 79 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको रात-दिन श्रीकृष्णके रूप, सुगन्ध और रसकी स्फूर्ति होती रहती और वे साक्षात् रूपसे अनुभव करते जैसे वे श्रीकृष्णको स्पर्श कर रहे हों ॥ 79 ॥ महाप्रभुकी उद्घूर्णा-उक्ति और श्रीजगन्नाथरूपी श्यामसुन्दरका दर्शन :- एक दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने। सिंहद्वारे दलइ आसि' करिल वन्दने ॥ 80 ॥ अनुवाद-एक दिन जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये जा रहे थे, तब सिंहद्वारके द्वारपालने आकर महाप्रभुकी वन्दना की ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'दलइ', -द्वारपाल ॥ 80 ॥ तारे बले,—“कोथा कृष्ण, मोर प्राणनाथ? मोरे कृष्ण देखाओ” बलि' धरे तार हात ॥ 81 ॥
[ 16/81-88 सोलहवाँ अध्याय 407
अनुवाद—महाप्रभुने उस द्वारपालसे कहा,—“मेरे प्राणनाथ श्रीकृष्ण कहाँ हैं? मुझे श्रीकृष्णके दर्शन करवाओ।” ऐसा कहकर महाप्रभुने उसका हाथ पकड़ लिया॥81॥ सेह कहे,—“इँहा हय व्रजेन्द्रनन्दन। आइस तुमि मोर सङ्गे, कराङ दरशन॥” 82॥ अनुवाद—द्वारपालने कहा,—“श्रीव्रजेन्द्रनन्दन यहींपर हैं। आप मेरे साथ चलिये, मैं आपको उनके दर्शन करवाता हूँ॥” 82॥ अनुभाष्य—‘इँहा हय’,—यहाँ हैं॥82॥ “तुमि मोर सखा, देखाह,—काँहा प्राणनाथ?” एत बलि’ जगमोहन गेला धरि’ तार हात॥ 83॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम मेरे सखा हो, मुझे दिखाओ मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं?” यह कहकर महाप्रभु उसका हाथ पकड़कर श्रीजगन्नाथ मन्दिरके जगमोहनमें (नाट्य-मन्दिरमें) गये॥83॥ सेह बले,—“एइ देख श्रीपुरुषोत्तम। नेत्र भरिया तुमि करह दरशन॥” 84॥ अनुवाद—द्वारपालने महाप्रभुसे कहा,—“देखिये, ये श्रीपुरुषोत्तम हैं। आप इनका दर्शन करके अपने नेत्रोंको पूर्ण सन्तुष्ट कर लीजिये॥”84॥ गरुड़ेर पाछे रहि’ करेन दरशन। देखेन,—जगन्नाथ हय मुरलीवदन॥ 85॥ अनुवाद—महाप्रभु गरुड़ स्तम्भके पीछे खड़े होकर दर्शन करने लगे, उन्होंने देखा कि श्रीजगन्नाथ तो मुखपर मुरली धारण किये व्रजेन्द्रनन्दन हैं॥85॥ श्रीरघुनाथके द्वारा अपने ग्रन्थमें महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ-दर्शन वर्णित :- एइ लीला निज-ग्रन्थे रघुनाथ दास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश॥ 86॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने अपने ग्रन्थ चैतन्यस्तवकल्पवृक्षमें इस लीलाका वर्णन किया है॥86॥ स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका (7) श्लोक— क्व मे कान्तः कृष्णस्त्वरितमिह तं लोकय सखे। त्वमेवेति द्वाराधिपमभिवदन्नुन्मद इव। द्रुतः गच्छन् द्रष्टुं प्रियमिति तदुक्तेन धृत तद्- भुजान्तर्गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति॥ 87॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥87॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हे सखे द्वारपाल, मेरे प्राणनाथ कृष्ण कहाँ हैं? शीघ्र ही तुम उन्हें यहाँ दिखलाओ',—जो द्वारपालको उन्मत्तकी भाँति इस प्रकार कहकर, उसके हाथको पकड़कर कृष्णको देखनेके लिये द्रुतगतिसे चले थे, ऐसे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं॥87॥ अनुभाष्य— हे सखे, मे (मम) कान्तः (कृष्णः) क्व (कुत्र)? त्वम् एव इह (अस्मिन् स्थाने समये वा) तं (कान्तं कृष्णं) त्वरितं (शीघ्रं) लोकय (दर्शय) इति (एवम्भूतेन वाक्येन) उन्मदः (उन्मत्तः) इव द्वाराधिपम् अभिवदन् (कथयन्) प्रियं (कृष्णं) द्रष्टुं द्रुतं गच्छ (आगच्छ) तदुक्तेन (द्वाराधिप-वाक्येन) धृततद्भुजान्तः (धृतः तद्भुजान्तं तस्य करप्रान्तं येन सः) गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥87॥ जगन्नाथका बाल्य-भोग :- हेनकाले ‘गोपाल-वल्लभ’-भोग लागइल। शङ्ख-घण्टा आदि सह आरति बाजिल॥ 88॥ अनुवाद—उसी समय श्रीजगन्नाथको उनके सेवकोंने 'गोपाल-वल्लभ' भोग लगाया और शङ्ख, घण्टा आदिकी ध्वनिके साथ आरती होने लगी॥88॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वल्लभ-भोग',—जिसे इस प्रदेश अर्थात् बङ्गालमें 'बालभोग' कहते हैं॥88॥
408 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/89-98 ] जगन्नाथके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुको महाप्रसाद-प्रदान :- भोग सरिले जगन्नाथेर सेवकगण। प्रसाद लञा प्रभु-ठाञि कैल आगमन ॥89॥ माला पराञा प्रसाद दिल प्रभुर हाते। आस्वाद रहु, यार गन्धे मन माते ॥90॥ महाप्रभुको प्रसाद-ग्रहण करवानेके लिये पण्डोंके द्वारा प्रयत्न :- बहुमूल्य प्रसाद सेइ वस्तु सर्वोत्तम। तार अल्प खाओयाइते सेवक करिल यतन ॥91॥ अनुवाद-भोगके बाद श्रीजगन्नाथके सेवक प्रसाद लेकर महाप्रभुके पास आये। उन्होंने महाप्रभुको माला पहनाकर उनके हाथमें श्रीजगन्नाथका प्रसाद दिया। उस प्रसादके आस्वादनकी बात तो बहुत दूर, उसकी सुगन्धसे ही मन मतवाला हो उठता। बहुमूल्य द्रव्योंसे बना हुआ वह सर्वोत्तम प्रसाद था, इसलिये श्रीजगन्नाथके सेवकोंने महाप्रभुको उसमेंसे थोड़ा-सा अपने समक्ष खिलानेका प्रयत्न किया॥89-91॥ महाप्रभुके द्वारा थोड़ासा महाप्रसाद-ग्रहण :- तार अल्प लञा प्रभु जिह्वाते यदि दिला। आर सब गोविन्देर आँचले बान्धिला ॥92॥ महाप्रसादके आस्वादनसे महाप्रभुमें विस्मय और सात्त्विक विकार :- कोटिअमृत-स्वाद पाञा प्रभुर चमत्कार। सर्वाङ्गे पुलक, नेत्रे बहे अश्रुधार ॥93॥ श्रीकृष्णका अधरामृत जानकर प्रेमावेश; ऐश्वर्याश्रित सेवकोंके दर्शनसे सङ्कोपन :- 'एइ द्रव्ये एत स्वाद काहाँ हैते आइल? कृष्णेर अधरामृत इथे सञ्चारिल ॥'94॥ एइ बुद्धये महाप्रभुर प्रेमावेश हैल। जगन्नाथेर सेवक देखि' सम्वरण कैल ॥95॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस प्रसादमें-से थोड़ा-सा लेकर अपनी जिह्वापर रखा और बाकी प्रसाद उन्होंने श्रीगोविन्दके आँचलमें बाँध दिया। वे उस अल्प प्रसादमें करोड़ों अमृतका आस्वादन प्राप्त करके आश्चर्यचकित हो उठे। उनके समस्त अङ्गोंमें पुलक उदित हो गये और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी अविरल धारा प्रवाहित होने लगी। 'इस प्रसादमें इतना स्वाद कहाँसे आया ? अवश्य ही इसमें कृष्णका अधरामृत सञ्चारित हुआ है।'-ऐसा विचार मनमें आनेसे वे प्रेमाविष्ट हो गये, किन्तु श्रीजगन्नाथके सेवकोंको अपने सामने देखकर उन्होंने अपने भावोंको सम्वरण कर लिया॥92-95॥ भक्ति-उन्मुखी महासुकृतिके फलसे महाप्रसादकी प्राप्ति; अज्ञ जगन्नाथके सेवकोंके द्वारा प्रश्न :- “सुकृति-लभ्य फेला-लव” बलेन बारबार। ईश्वर-सेवक पुछे,-“कि अर्थ इहार ?? ”96॥ अनुवाद-महाप्रभु बार बार कहने लगे,-“फेलाका लेशमात्र [भक्ति-उन्मुखी] महासुकृतिसे प्राप्त होता है।” इसे सुनकर श्रीजगन्नाथदेवके सेवक पूछने लगे,-“इसका क्या अर्थ है?”96॥ अनुभाष्य-महाभारतमें और स्कन्दपुराणके उत्कल खण्डमें वर्णन आता है- “महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे। स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते॥” [अर्थात् “हे राजन्! अल्प सुकृतिवान् व्यक्तिका महाप्रसाद, गोविन्द, भगवन्नाम और वैष्णव-इन चार वस्तुओंमें विश्वास नहीं होता।”]॥96॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अथवा महाप्रसादके माहात्म्यकी व्याख्या :- प्रभु कहे,-“एइ ये दिला कृष्णाधरामृत। ब्रह्मादि-दुर्लभ एइ निन्दये ‘अमृत’ ! ! 97॥ फेला अथवा महाप्रसादकी संज्ञा :- कृष्णेर ये भुक्त-शेष, तार ‘फेला’-नाम। तार एक ‘लव’ ये पाय, सेइ भाग्यवान् ॥98॥ कर्म-उन्मुखी और भक्ति-उन्मुखी-सुकृतिके फलके वैशिष्ट्यका वर्णन :-
[ 16/97-106 सोलहवाँ अध्याय 409 सामान्य भाग्य हैते तार प्राप्ति नाहि हय। कृष्णेर याँते पूर्ण कृपा, सेइ ताहा पाय॥99॥ (भक्ति-उन्मुखी) सुकृति-शब्दका अर्थ :- ‘सुकृति’-शब्दे कहे ‘कृष्णकृपा-हेतु पुण्य’। सेइ याँर हय, ‘फेला’ पाय सेइ धन्य॥"100॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“आप लोगोंने मुझे जो श्रीकृष्णका अधरामृत प्रदान किया है, वह ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ और 'अमृत'के माधुर्यको भी पराभूत करनेवाला है! श्रीकृष्णके द्वारा भुक्त भोगके उच्छिष्टका नाम ही 'फेला' है। जो उसके एक कणको भी प्राप्त करता है, वह भाग्यवान् है। सामान्य भाग्य होनेपर उस फेलाकी प्राप्ति नहीं होती, जिनपर श्रीकृष्णकी पूर्ण कृपा होती है, वे ही इसे प्राप्त करते हैं। सुकृति शब्दका अर्थ 'श्रीकृष्णकी कृपाको प्राप्त करने हेतु पुण्य' है, जिसकी ऐसी सुकृति होती है, वह धन्य व्यक्ति ही 'फेला'को प्राप्त करता है॥"97-100॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस पवित्र कर्मसे कृष्णकृपा उत्पन्न होती है, उसे (भक्ति-उन्मुखी) 'सुकृति' कहते हैं॥100॥ अनुभाष्य–'सामान्य भाग्य',-कर्मफलसे उत्पन्न सौभाग्य॥99॥ उपलभोग देखनेके बाद महाप्रभुका अपने वासस्थानपर आगमन :- एत बलि' प्रभु ता-सबारे विदाय दिला। उपल-भोग देखिया प्रभु निज-वासा आइला॥101॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने उन सबको विदायी दी। महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके उपल-भोगको देखनेके पश्चात् अपने वासस्थानपर आ गये॥101॥ श्रीकृष्णके उच्छिष्टके माधुर्यकी स्मृति :- मध्याह्न करिया कैला भिक्षा निर्वाहण। कृष्णाधरामृत सदा अन्तरे स्मरण॥102॥ अनुवाद-महाप्रभुने मध्याह्न कृत्य करनेके पश्चात् भोजन ग्रहण किया, किन्तु उनके हृदयमें निरन्तर श्रीकृष्णके अधरामृतकी स्मृति बनी रही॥102॥ प्रेमावेश और कठिनाईसे उसका सम्वरण :- बाह्य-कृत्य करेन, प्रेमे गर-गर मन। कष्टे सम्वरण करेन, आवेश सघन॥103॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु बाहरके तो सब कार्य कर रहे थे, किन्तु उनका मन प्रेममें गद्गद हो रहा था। महाप्रभु अपने मनको बहुत कठिनाईसे सम्वरण करनेका प्रयास कर रहे थे, किन्तु वह प्रबल आवेशके अधीन हो रहा था॥103॥ सन्ध्याके बाद भक्तोंके साथ श्रीकृष्ण-कथाका आलाप :- सन्ध्या-कृत्य करि' पुनः निजगण-सङ्गे। निभृते बसिला नाना कृष्णकथा-रङ्गे॥104॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने सन्ध्या-कृत्य करके एकान्तमें बैठकर अपने भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक कृष्णकथाकी चर्चा करने लगे॥104॥ श्रीपुरी, श्रीभारती, श्रीस्वरूप, श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यादि भक्तगणोंको श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रसाद प्रदान :- प्रभुर इङ्गिते गोविन्द प्रसाद आनिला। पुरी-भारतीरे प्रभु किछु पाठाइला॥105॥ अनुवाद-महाप्रभुके सङ्केतसे श्रीगोविन्द गोपाल-वल्लभ प्रसाद लेकर आये। महाप्रभुने उसमेंसे कुछ प्रसाद श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारतीके पास भेजा॥105॥ रामानन्द-सार्वभौम-स्वरूपादि-गणे। सबारे प्रसाद दिल करिया बन्ट्ने॥106॥ अनुवाद-बाकी प्रसादको महाप्रभुने श्रीरामानन्द राय, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंमें बाँट दिया॥106॥
410 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/107-115 ] अलौकिक प्रसादके आस्वादनसे सभीका विस्मय :- प्रसादेर सौरभ्य-माधुर्य करि' आस्वादन। अलौकिक आस्वादे सबार विस्मय हैल मन ॥ 107 ॥ अनुवाद-प्रसादकी सुगन्ध और मधुरताका आस्वादन करके उसके अलौकिक स्वादसे उनके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ 107 ॥ महाप्रभुके द्वारा बद्धजीवके प्राकृत भोग्य-द्रव्य और श्रीकृष्णके चित्-इन्द्रिय-भोग्य अप्राकृत चित्-उपकरण नैवेद्यमें गुण-भेदका वर्णन :- प्रभु कहे,—“एइ सब हय प्राकृत द्रव्य। ऐक्षव, कर्पूर, मरिच, एलाइच, लवङ्ग, गव्य ॥ 108 ॥ रसवास, गुड़त्वक-आदि यत सब। 'प्राकृत' वस्तुर स्वाद सबार अनुभव ॥ 109 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“गुड़, कर्पूर, काली मिर्च, इलाइची, लौंग, घी, सुगन्धित रसयुक्त इलायची और दालचीनी आदि सब द्रव्य तो प्राकृत हैं। सभीको ही प्राकृत-वस्तुओंके स्वादका अनुभव है ॥ 108-109 ॥ अनुभाष्य–'ऐक्षव',-गन्नेसे बना गुड़ अथवा चीनी; 'गव्य'-दूध, घी आदि ॥ 108 ॥ अनुभाष्य- 'रसवास',-सुगन्ध और रसयुक्त इलायची और लौंग; 'गुड़त्वक',-दालचीनी; 'प्राकृत',-बद्धजीवके स्व-सुख-विधानकी इच्छापर आधारित जो सब वस्तुएँ उनकी इन्द्रियोंके भोगके लिये हैं, – वे सब खण्ड (अपूर्ण), सीमित, नश्वर अथवा कालके साथ नष्ट होनेवाले जड़ीय द्रव्य हैं ॥ 109 ॥ एइ द्रव्ये एत आस्वाद, गन्ध लोकातीत। आस्वाद करिया देख, – सबार प्रतीत ॥ 110 ॥ श्रीकृष्णके उच्छिष्ट महाप्रसादका चिद्बल :- आस्वाद दूरे रहु, गन्धे माते मन। आपना बिना अन्य माधुर्य कराय विस्मरण ॥ 111 ॥ श्रीकृष्णके अधरके स्पर्शकी महिमा :- ताते एइ द्रव्ये कृष्णाधरस्पर्श हैल। अधरेर गुण सब इहाते सञ्चारिल ॥ 112 ॥ श्रीकृष्णके ओष्ठसे स्पर्श हुए चित्-उपकरण- भक्तोंकी चित्-इन्द्रियोंके उन्मादक :- अलौकिक-गन्ध-स्वाद अन्य-विस्मारण। महा-मादक हय एइ कृष्णाधरेर गुण ॥ 113 ॥ सभीको अप्राकृत श्रद्धाके साथ प्रसादका सम्मान करनेका आदेश :- अनेक 'सुकृते' इहा हञाछे सम्प्राप्ति। सबे एइ आस्वाद कर करि' महाभक्ति ॥”114 ॥ अनुवाद-किन्तु इन्हीं (प्राकृत) द्रव्योंसे युक्त श्रीजगन्नाथके प्रसादका ऐसा अद्भुत स्वाद और अलौकिक सुगन्ध है। इसका आस्वादन करके देखो, आपको स्वयं ही इस बातका अनुभव होगा। इस प्रसादके आस्वादनकी बात तो दूर रहे, इसकी सुगन्धसे ही मन मतवाला हो जाता है। यह प्रसाद अपने अतिरिक्त अन्य सब वस्तुओंकी मधुरताको सम्पूर्ण रूपमें भुला देता है। इसीसे प्रमाणित होता है कि इन द्रव्योंसे श्रीकृष्णके अधरोंका स्पर्श हुआ है और श्रीकृष्णके अधरोंके समस्त गुण इस प्रसादमें सञ्चारित हो गये हैं। अलौकिक सुगन्ध और स्वादका महा-मादक होना जो अन्य वस्तुओंके स्वादको विस्मृत करवा दे, वास्तवमें वह श्रीकृष्णके अधरोंका ही गुण है। अनेक सुकृतियोंके फलसे इस गोपाल-वल्लभ महाप्रसादकी प्राप्ति हुई है। आप सभी महा-भक्तिपूर्वक इस प्रसादका आस्वादन करो॥”110-114 ॥ श्रीकृष्णके अधरामृतके आस्वादनसे सभीमें प्रेमावेश :- हरिध्वनि करि' सबे कैला आस्वादन। आस्वादिते प्रेमे मत्त हइल सबार मन ॥ 115 ॥ अनुवाद-उच्च स्वरसे हरिध्वनि करते हुए सभीने उस प्रसादका आस्वादन किया। प्रसादका आस्वादन करते ही सभी भक्तोंका मन प्रेममें मत्त हो उठा ॥ 115 ॥
[ 16/116-119 सोलहवाँ अध्याय 411 महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :- प्रेमावेशे महाप्रभु यबे आज्ञा दिला। रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥ 116 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने प्रेममें आविष्ट होकर जब श्रीरामानन्द रायको श्लोक सुनानेके लिये आदेश दिया, तब उन्होंने यह श्लोक पढ़ा ॥ 116 ॥ गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरामृतकी याचना (चित्रजल्प) :- श्रीमद्भागवत (10/31/14)में - सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठुचुम्बितम्। इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥ 117 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे वीर, तुम्हारे प्रेमको वर्धित करनेवाला, जगत्के शोकका नाश करनेवाला, स्वरयुक्त वेणुके द्वारा सुन्दररूपसे चुम्बित और चित्तसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंके प्रति रागको भुला देनेवाला तुम्हारा जो अधरामृत है, उसे हमें प्रदान करो॥ 117॥ अनुभाष्य-रासलीलाके समय कृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेसे कृष्णमें ही अपने प्राणोंको अर्पित करनेवाली गोपियाँ कृष्णके विरहमें अत्यन्त कातर होकर रासस्थलीसे यमुनातटपर आकर इस प्रकार विलाप कर रही हैं- हे वीर (दानवीर,) सुरतवर्धनं (सम्भोगेच्छां वर्धयति यत्तत्) शोकनाशनं (अप्राप्तिजन्यदुःखध्वंसकं) स्वरितवेणुना (स्वरितेन नादितेन वेणुना) सुष्ठुचुम्बितं (नादामृत-वासितं) नृणाम् इतररागविस्मारणम् (इतरेषु कृष्णेतर-विषयसुखेषु यः रागः इच्छा, तत् विस्मारयति विलोपयति इति तथा तत्) ते (तव) अधरामृतम् (अधर एव अमृतं) नः (अस्माकं) वितर (देहि)। श्लोक-भावानुवाद-हे दानवीर, सम्भोग इच्छाको वर्धित करनेवाले, तुम्हारी अप्राप्तिसे उत्पन्न दुःखको ध्वंस करनेवाले, नादयुक्त वेणुके द्वारा नादामृतसे सुवासित, मनुष्योंको अपनेसे (कृष्णसे) अतिरिक्त विषयसुखोंकी इच्छाओंको विलुप्त कर देनेवाले अपने अधरामृतको हमें प्रदान करो ॥ 117 ॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा उसीके सूचक श्लोकका पाठ :- श्लोक शुनि' महाप्रभु महातुष्ट हैला। राधार उत्कण्ठा-श्लोक पड़िते लागिला ॥ 118 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके मुखसे श्लोक सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए। तब वे स्वयं श्रीराधाके द्वारा उत्कण्ठाकी अवस्थामें कथित श्लोकका पाठ करने लगे ॥ 118 ॥ श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख चित्-जिह्वाके लोभको वर्धित करनेवाला श्रीकृष्ण-फेला-लवामृत :- गोविन्दलीलामृत (8/8)में विशाखाके प्रति श्रीराधाके वचन- व्रजातुलकुलाङ्गनेतर-रसालितृष्णाहर- प्रदीव्यदधरामृतः सुकृतिलभ्य-फेलालवः। सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः स मे मदनमोहनः सखि तनोति जिह्वा-स्पृहाम् ॥ 119 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि, जिनका अधरामृत-व्रजकी अतुलनीया कुलाङ्गनाओंके अन्यान्य रससमूहोंमें तृष्णाका हरण करनेवाला है, जिनका फेलाकण-सुकृतिसे ही प्राप्त होता है, अमृतको भी पराजित करनेवाले ताम्बुलका चर्वण करनेवाले वे मदनमोहन मेरी जिह्वाकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं ॥ 119 ॥ अनुभाष्य- हे सखि, यः व्रजातुलकुलाङ्गनेतररसालितृष्णाहरप्रदीव्यदधरामृतः (व्रजे याः अतुलाः निरुपमाः कुलाङ्गनाः ब्रजवध्वः तासाम् इतरेषु रसालिषु या तृष्णा तां हर्तुं शीलं यस्य तत् प्रदीव्यत् प्रकृष्टरूपेण सर्वोपरि शोभमानम् अधरामृतं यस्य सः) सुकृतिलभ्य-फेला-लवः (सुकृतिभिः सौभाग्यवद्भिः लभ्यः प्राप्यः फेलायाः अधरसुधायाः लवः स्वल्पांशः यस्य सः) सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः (सुधाजित् अमृतनिन्दितं तथा अहिवल्लिका ताम्बुलवल्ली तस्यां सुदलैः शोभनपत्रैः निर्मिता याः वीटिकाः तासां चर्वितं चर्वणं यस्य सः) मदनमोहनः [स्व-फेलया] जिह्वा-स्पृहां (सेवोन्मुखी-जिह्वालोल्यं) तनोति (वर्धयति)।
412 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/119–132 ] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119॥ तबे मोरे क्रोध करि', लज्जा, भय, धर्म छाड़ि', छाड़ि' दिमु, कर आसि' पान। महाप्रभुके द्वारा दोनों श्लोकोंकी व्याख्या :- एत कहि' गौरप्रभु भावाविष्ट हञा। नहे पिमु निरन्तर, तोमाय मोर नाहिक डर, दुइ श्लोकेर अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 120॥ अन्ये देखों तृणेर समान॥' 126॥ वेणु और अधरामृतके सम्मिलित अनुवाद—यह कहकर श्रीगौराङ्ग महाप्रभु भावाविष्ट बलके प्रयोगका फल :- होकर प्रलाप करते हुए उपरोक्त दोनों श्लोकोंका अर्थ अधरामृत निज-स्वरे, सञ्चारिया सेइ बले, करने लगे॥ 120॥ आकर्षय त्रिजगत्-जन। आमरा धर्मे भय करि', रहि यदि धैर्य धरि', प्रथम श्लोककी व्याख्या; तबे आमाय करे विड़म्बन॥ 127॥ श्रीकृष्णधरामृतके चिद्बलका वर्णन :- यथा राग— नीवि खसाय गुरु-आगे, लज्जा-धर्म कराय त्यागे, “तनु-मन कराय क्षोभ, बाड़ाय सुरत-लोभ, केशे धरि' येन लञा याय। हर्ष-शोकादि-भार विनाशय। आनि' कथाय तोमार दासी, शुनि' लोक करे हासि, पासराय अन्य रस, जगत् करे आत्मवश, एइ मत नारीरे नाचाय॥ 128॥ लज्जा, धर्म, धैर्य करे क्षय॥ 121॥ श्रीराधा आदिका मौन-भाव :- नागर, शुन तोमार अधर-चरित। शुष्क बाँशेर लाठिखान, एत करे अपमान, माताय नारीर मन, जिह्वा करे आकर्षण, एइ दशा करिल गोसाञि। विचारिते सब विपरीत॥ 122॥ ध्रु॥ ना सहिं' कि करिते पारि, ताहे रहि मौन धरि', आछुक नारीर काय, कहिते वासिये लाज, चोरार माके डाकि' कान्दिते नाइ॥ 129॥ तोमार अधर बड़ धृष्ट-राय। पुरुषे करे आकर्षण, आपना पियाइते मन, द्वितीय श्लोककी व्याख्या; श्रीकृष्णके अधरामृतके माहात्म्यका वर्णन :- अन्यरस सब पासराय॥ 123॥ अधरेर एइ रीति, आर शुन श्रीकृष्णके वेणुके प्रति श्रीराधाकी ईर्ष्या :- कुनीति, सचेतन रहु दूरे, अचेतन सचेतन करे, से अधर-सने यार मेला। तोमार अधर—बड़ बाजिकर। सेइ भक्ष्य-भोज्य-पान, हय अमृत-समान, तोमार वेणु शुष्केन्धन, तार जन्माय इन्द्रिय-मन, नाम तार हय 'कृष्ण-फेला'॥ 130॥ तारे आपना पियाय निरन्तर॥ 124॥ से फेलार एक लव, ना पाय देवता सब, वेणु धृष्ट-पुरुष हञा, पुरुषाधर पिया पिया, ए दम्भे केबा पातियाय? गोपीगणे जानाय निज-पान। बहु जन्म पुण्य करे, तार 'सुकृति' नाम धरे, 'ओहे, शुन, गोपीगण, बले पिउने तोमार धन, से 'सुकृते' तार लव पाय॥ 131॥ तोमार यदि थाके अभिमान॥ 125॥ कृष्ण ये खाय ताम्बुल, कहे तार नाहि मूल,
[ 16/121-133 सोलहवाँ अध्याय 413 ताहे आर दम्भ-परिपाटी। तार येबा उद्गार, तारे कय 'अमृत-सार', गोपीर मुख करे 'आलबाटी' ॥ 132 ॥ एसब—तोमार कुटिनाटि, छाड़ एइ परिपाटी, वेणुद्वारे काँहे हर प्राण। आपनार हासि लागि', नह नारीर वधभागी, देह' निजाधरामृत दान ॥" 133 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 121–133 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे नागर, तुम्हारे अधरके चरित्रका वर्णन कर रही हूँ, तुम सुनो। वह लोगोंके तन और मनको क्षोभित करता है, कन्दर्पके लोभकी वृद्धि करता है, हर्ष-शोक आदिके भारका विनाश करता है, अन्य रसोंको भुला देता है, जगत्को अपने वशमें कर लेता है, लज्जा, धर्म और धैर्यका क्षय कर देता है, नारियोंके मनको मत्त कर देता है और जिह्वाकी लालसा वर्धित कराकर उसका आकर्षण करता है, विचार करनेपर मैं उसका सबकुछ ही विपरीत देखती हूँ। हे कृष्ण,—तुम पुरुष हो, तुम्हारा अधरामृत नारियोंका मन आकर्षित करेगा,—यही नियम है; किन्तु वह पुरुषरूपी वेणुको आकर्षित करके स्वयंको पान करवाकर अन्य समस्त रसोंको भुला देता है; सचेतनकी तो बात दूर रहे, अचेतनको भी सचेतन कर देता है, अतएव तुम्हारा अधर—एक महा-जादूगर है। और भी विपरीत बात देखो,—तुम्हारा जो वेणु है, वह—सूखी लकड़ी मात्र है; तुम्हारा अधरामृत वेणुको निरन्तर स्वयंका पान करवाकर उसकी इन्द्रियों और मनको प्रस्तुत करके (चेतनवृत्तिसे युक्त करके) उसे सुख देता है। वह वेणु धृष्ट पुरुषके रूपमें स्वयं पुरुषाधरका (पुनः पुनः) पान करके अपने पीनेकी घोषणा करता है और ऐसा कहता है,—'ओहे गोपियों, तुममें यदि 'स्त्री' होनेका अभिमान हो, तो फिर पुरुषके अधरामृतरूपी अपने निज-धनका पान करो।' राधिका कह रही हैं,—“वह वेणु मेरे प्रति क्रोध करते हुए कहता है, तुम लज्जा-भयको छोड़कर इसका पान करो, तभी मैं (तुम्हारे लिये यह अधर) छोड़ दूँगा; और यदि तुम लज्जा-भयको नहीं छोड़ोगी, तब मैं ही निरन्तर पान करूँगा; कृष्ण-अधरामृतमें तुम्हारा विशेष अधिकार देखकर मुझे थोड़ा भय होता है; अन्य सभीको तो मैं तृणके समान देखता हूँ।” वह वेणु अपने स्वरमें अधरामृतका सञ्चार करके अर्थात् उसके साथ मिलकर (एकसाथ बल लगाकर) इस प्रकार त्रिजगत्को आकर्षित करता है। हम गोपियाँ यदि धर्मका भय करके धैर्य धारण करती हैं, तब फिर हमारा उपहास करता है; यहाँ तक कि हमारा लज्जा-धर्म छुड़वाकर हमारे गुरुजनोंके सामने ही हमारी नीवि अर्थात् हमारे कमरके नाड़ेको नीचे खिसका देता है,—हमें जैसे केशोंसे पकड़कर ले जाता है,—हमें तुम्हारी दासी बना देता है; लोग इसे सुनकर हास्य किया करते हैं (इस प्रकार गोपियोंको अपनी इच्छानुसार चलाता है)। वेणु सूखी बाँसकी लकड़ी मात्र होनेपर भी (प्रभुरूपमें) हमारा अपमान करके हमारी ऐसी दशा कर देता है। हम इसे सहन करनेके अतिरिक्त और कर भी क्या सकती हैं? चोरको दण्ड देनेपर उसकी माँ जिस प्रकार (रक्षा अथवा निरपेक्ष विचारके लिये अन्य व्यक्तियोंको) बुलाकर चीत्कार करते हुए रो नहीं सकती (अर्थात् उसके लिये अन्य लोगोंको बुलाकर रोना उचित नहीं है,) मैं भी उसी प्रकार मौन धारण करके रहती हूँ,—अधरकी ऐसी ही रीति है। अधरके साथ जिसका मिलन है, उसकी कुनीतिका पुनः श्रवण करो;—उस अधरसे स्पर्श हुआ भक्ष्य [दाँतके द्वारा खण्डित होनेवाले चना आदि], भोज्य [चावल आदि] और पीनेवाले द्रव्य अमृतके समान होनेके कारण 'कृष्णफेला' नाम धारण करते हैं। देवता आराधना करके भी उस फेलाका एक-कण भी प्राप्त नहीं कर पाते। उसपर, फेलाका ऐसा दम्भ है कि उसपर साधारण लोग विश्वास नहीं कर सकते; क्योंकि, बहुत जन्मोंके पुण्योंके फलस्वरूप जो भक्ति-उन्मुखी सुकृति प्राप्त होती है, उसी 'सुकृति'के बलसे ही सेवक
414 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/121-140 ] कृष्णफेलाके लव अथवा कणको प्राप्त करते हैं। कृष्णके द्वारा चबाये गये ताम्बुल (पान)-प्रसादके उद्गारको 'अमृतसार' कहते हैं; गोपियोंका मुख—उसे रखनेकी आलवाटी अर्थात् पीकदानीके समान है। अतएव हे श्याम, तुम अपनी इस कुटीनाटीकी परिपाटीका (कुशलताका) परित्याग करो; वेणुके द्वारा गोपियोंके प्राणोंका नाश मत करो; तुम हँसते-हँसते नारियोंके वधके भागीदार मत बनो, हमें अपना अधरामृत दान करो। 'आपणार हासि लागि',—प्रथम अर्थ यह है कि नारीके वधके भागीदार होनेके कारण आपकी ही निन्दा होगी, वैसा नहीं करके अपना अधरामृत दो; दूसरा अर्थ यह है कि अपने कौतुकके लिये नारीका वध मत करो ॥ 121-133 ॥ अनुभाष्य—'भार विनाशय',—पाठान्तरमें 'भाव विलास्य' और 'भाव-विनाशय'। 'धृष्ट-राय',—प्रगल्भ अथवा उद्धत- प्रधान। 'नीवि',—कटिबन्ध, वस्त्रको बाँधनेवाला नाड़ा; 'खसाय',—खोल देता है। 'मेला',—मिलन। 'पातिआय',—प्रतीति होती है। 'आलबाटी',—लारकी कटोरी, पीकदानी। 'कुटिनाटि',—कपटता; 'परिपाटी',—कारीगिरि, निपुणता, कुशलता ॥ 121-133 ॥ महाप्रभुकी उत्कण्ठा :— कहिते कहिते प्रभुर मन फिरि' गेल। क्रोध मन शान्त हैल, उत्कण्ठा बाड़िल ॥ 134 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कहते-कहते श्रीगौरहरिका मन बदल गया। उनके मनका क्रोध शान्त हो गया और उत्कण्ठा बढ़ गयी॥ 134 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण-अधरामृतकी परम-महिमाका कीर्तन :— “परम दुर्लभ एइ कृष्णाधरामृत। ताहा येइ पाय, तार सफल जीवित ॥ 135 ॥ योग्य हञा केह करिते ना पाय पान। तथापि से निर्लज्ज, वृथा धरे प्राण ॥ 136 ॥ अयोग्य हञा ताहा केह सदा पान करे। योग्य जन नाहि पाय, लोभे मात्र मरे ॥ 137 ॥ ताते जानि,—कोन तपस्यार आछे बल। अयोग्येरे देओयाय कृष्णाधरामृत-फल ॥ 138 ॥ महाप्रभुके आदेशसे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :— कह राम राय, किछु शुनिते हय मन।” भाव जानि' पड़े राय गोपीर वचन ॥ 139 ॥ अनुवाद—महाप्रभु आगे कहने लगे,—“श्रीकृष्णका अधरामृत परम दुर्लभ है, उसे जो प्राप्त करता है, उसीका जन्म सफल है। यदि कोई व्यक्ति योग्य होनेपर भी उस अधरामृतको पान नहीं कर पाता, तो वह निर्लज्ज व्यर्थ ही अपने प्राणोंको धारण करता है। और ऐसे भी व्यक्ति हैं जो अयोग्य होनेपर भी उस अधरामृतका सदैव पान करते हैं। कुछ योग्य व्यक्ति उसे नहीं पाकर उसकी लालसामें ही मरते हैं। इससे यह जाना जाता है कि अयोग्य दिखलायी देनेवालेमें भी किसी तपस्याका बल है, जो उसे कृष्ण-अधरामृतरूपी फल प्रदान कराता है। हे रामानन्द राय! मेरा कुछ श्रवण करनेका मन है।” महाप्रभुके भावको जानकर श्रीरायने गोपियोंके वचनका पाठ किया॥ 135-139॥ गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरके स्पर्शसे सुखी वेणुकी प्रशंसा :— श्रीमद्भागवत (10/21/9) में— गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु- र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्। भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्यो हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः॥ 140 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[किसी एक गोपीने अन्य गोपियोंसे कहा,—] हे गोपियों, इस वेणुने क्या सुकृति की थी कि
[ 16/140-149 सोलहवाँ अध्याय 415 यह गोपियोंको प्राप्त होनेवाले कृष्णकी अधरसुधाका भोग कर रहा है? आर्य व्यक्ति जिस प्रकार (किसी भगवद्भक्त) श्रेष्ठ सन्तानका (जन्म देखकर उसके लिये आनन्दमें अश्रु विसर्जित) करता है, उसी प्रकार यह वेणु जिन (सब नदियोंके) जलसे पुष्ट हुआ है, (वे सब नदियाँ अपने-अपने ऊपरी भागमें स्थित विकसित कमलसमूहरूपी रोमसमूहके द्वारा प्रसन्न हो रही हैं) एवं जिस वृक्षसे इसका जन्म हुआ है, उसी जातिके समस्त वृक्ष ही आनन्दवशतः मधुधारारूपी अश्रु बहा रहे हैं॥ 140॥ अनुभाष्य—व्रजमें शरत्कालके उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा वनमें गोचारण करते हुए वंशीकी ध्वनि करनेपर गोपियाँ कृष्णसङ्गके लिये कामातुर होकर कृष्णकी मनोहर गुणावलीका गान करके इधर-उधर भ्रमण करते करते कृष्णके वेणुके सौभाग्यका वर्णन कर रही हैं— अन्या अन्या ऊचुः—हे गोप्यः, अयं वेणुः किं कुशलं (पुण्यम्) आचरत् (अनुष्ठितवान्) स्म, यत् (यस्मात्) गोपिकानाम् (एव भोग्यां सतीमपि) दामोदराधरासुधां (कृष्णाधरामृतं) स्वयं (स्वातन्त्र्येण) अवशिष्टरसं (केवलमवशिष्टरसमात्रं यथा भवति, तथा) भुङ्क्ते; ह्रदिन्यः (यासां पयसा पुष्टः ताः मातृतुल्याः नद्यः) हृष्यत्त्वचः (जात-रोमहर्षाः विकसितकमलवन-मिषेण रोमाञ्चिताः) [लक्ष्यन्ते]; आर्याः (कुलवृद्धाः) यथा [स्ववंशे भगवत्सेवकं दृष्ट्वा पुलकिताः सन्तः अश्रु मुञ्चन्ति, तद्वत्] तरवः (येषां वंशे स जातः ते) अश्रु (मधुधारा-मिषेण आनन्दाश्रु) मुमुचुः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140॥ महाप्रभुके द्वारा भावावेशमें प्रलाप-व्याख्या :- एइ श्लोक शुनि' प्रभु भावाविष्ट हञा। उत्कण्ठाते अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 141॥ अनुवाद—इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु भावाविष्ट हो गये और उत्कण्ठित होकर प्रलाप करते हुए उस श्लोकका अर्थ प्रकाशित करने लगे॥ 141॥ श्लोकका अर्थ; वेणुके द्वारा श्रीकृष्णके अधरामृतके पानके सौभाग्यको देखकर गोपियोंमें ईर्ष्या तथापि स्तुतिपूर्ण वचन (चित्रजल्प) :- “अहो, व्रजेन्द्रनन्दन, व्रजेर कोन कन्यागण, अवश्य करिब परिणय। से-सम्बन्धे गोपीगण, यारे जाने निजधन, से सुधा अन्येर लभ्य नय॥ 142॥ गोपीगण, कह सब करिया विचारे। कोन तीर्थ, कोन तप, कोन सिद्धमन्त्र-जप, एइ वेणु कैल जन्मान्तरे??143॥ ध्रु॥ हेन कृष्णाधर-सुधा, ये कैल अमृत मुदा, यार आशाय गोपी धरे प्राण। एइ वेणु अयोग्य अति, स्थावर 'पुरुषजाति', सेइ सुधा सदा करे पान॥ 144॥ यार धन, ना कहे तारे, पान करे बलात्कारे, पिते तारे डाकिया जानाय। तार तपस्यार फल, देख इहार भाग्य-बल, इहार उच्छिष्ट महाजने खाय॥ 145॥ मानसगङ्गा, कालिन्दी, भुवन-पावनी नदी, कृष्ण यदि ताते करे स्नान। वेणु-झुटाधर-रस, हञा लोभे परवश, सेइकाले हर्षे करे पान॥ 146॥ एत नदी रहु दूरे, वृक्ष सब तार तीरे, तप करे पर-उपकारी। नदीर शेष-रस पाञा, मूलद्वारे आकर्षिया, केने पिये, बुझिते ना पारि॥ 147॥ निजाङ्कुरे पुलकित, पुष्पे हास्य विकसित, मधु-मिषे बहे अश्रुधार। वेणुरे मानि' निज जाति, आर्येर येन पुत्र-नाति, 'वैष्णव' हैले आनन्द-विकार॥ 148॥ वेणुर तप जानि यबे, सेइ तप करि तबे, ए-अयोग्य, आमरा-योग्या नारी। याहा ना पाञा दुःखे मरि, अयोग्य पिये सइते नारि,
416 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/142-149 ] ताहा लागि' तपस्या विचारि॥" 149॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142-149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कोई गोपी अन्य गोपियोंसे कह रही है,—'देखो, व्रजेन्द्रनन्दनकी यह कैसी आश्चर्यमय लीला है। यह अवश्य ही ब्रजकी कन्याओंसे विवाह करेगा, अतएव गोपियाँ जानती हैं कि कृष्णका अधरामृत—उन्हींका निजधन है एवं वह अधरामृत अन्योंका प्राप्य नहीं है।' हे गोपीगण, विचार करके देखो कि कृष्णके इस वेणुने अपने किसी अन्य जन्ममें अवश्य ही कोई तीर्थाटन, कोई तप अथवा किसी सिद्धमन्त्रका जप किया था, जिसके द्वारा उसने इस प्रकार कृष्णकी अधरसुधाको, — जिसके लिये गोपियाँ प्राण धारण कर रही हैं, उसे—अपनी ‘अमृत मुद्रा (धन)’ बना लिया है। यह वेणु—अतिशय अयोग्य है, स्थावर वंशमें उत्पन्न हुआ है; उसपर भी 'पुरुषजाति'का होकर कृष्णकी अधरसुधाका सर्वदा पान किया करता है। यह गोपियोंका अपना धन होनेपर भी वेणु उन्हें नहीं बतलाकर उसे बलपूर्वक पान करता है एवं गोपियोंको उच्च स्वरसे पान करते हुए आह्वान करता है। पुनः, इस वेणुकी तपस्याका फल और भाग्यका बल देखो, — इसका उच्छिष्ट महाजन तक खा रहे हैं, कृष्ण जब भुवनपावनी कलिन्द-नन्दिनी और मानसगङ्गामें स्नान करते हैं, तब वे (यमुना एवं मानस-गङ्गारूपी महाजन) लोभके वशीभूत होकर वेणुके उच्छिष्ट अधररसका प्रसन्नतापूर्वक पान करती हैं। नदीकी बात दूर रहे, उस नदीके तटपर लगे तापस [जिसके बेरसे औषधीय तेल बनता है]—जैसे परोपकारी वृक्ष भी किसलिये जड़के द्वारा नदीके उपभुक्त बचे हुए रसको आकर्षित करके पान करते हैं, मैं उसे नहीं समझ पा रही हूँ। वे सब वृक्ष अपने-अपने अङ्कुरसे पुलकित और पुष्प-विकासके रूपमें हास्यसे विकसित होकर 'मधुमिषे' अर्थात् मधुके छलसे अश्रुधाराको बहाते हैं; ऐसा लगता है, आर्यपुरुष अपने पुत्र-पौत्रके वैष्णव होनेपर जिस प्रकार आनन्द-विकारको प्राप्त करते हैं, वृक्षगण स्व-वंशीय वृक्षजातिरूपी वेणुको वैसा मानकर कार्य कर रहे हैं। अब बात यह है कि, वेणु—अत्यन्त अयोग्य है, किन्तु हम—योग्य नारियाँ हैं; वेणुने ऐसी कौन-सी तपस्या की है, उसे जाननेपर हम भी वैसी ही तपस्या करेंगी। हमारे मनकी बात यह है कि अयोग्य वेणुको कृष्ण-अधरामृतका पान करते देखकर हम दुःखसे मर रही हैं; इसलिये ही वेणुकी तपस्याका
[ 16/142-151 सोलहवाँ अध्याय 417
विचार कर रही हैं। 'महाजने',—मानस-गङ्गा और यमुना; ये पुण्य-नदियाँ होनेके कारण 'महाजन' हैं। पवित्र नदी होनेपर भी यह—नदी है, इसलिये उसके द्वारा यही कार्य (अर्थात् वेणुके उच्छिष्ट कृष्णके अधरामृतके रसका पान) सम्भव हो सकता है। 'ए अयोग्य',—यह वेणु स्थावर-वस्तु है, इसलिये कृष्णके अधरामृतको प्राप्त करनेके अयोग्य है॥ 142-149॥
सोलहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—किसी-किसीके मतानुसार, 'ये कैल अमृतमुदा',—अमृतको भी जो स्वमाधुर्यके बलसे आच्छादन (पराजित) करता है। 'मधु-मिषे',—मधुधाराके छलसे (श्रीधरस्वामि-टीका देखें) ॥ 144-148 ॥
सोलहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुका गोपीभावमें श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद :— एतेक विलाप करि', प्रेमावेशे गौरहरि, सङ्गे लञा स्वरूप-रामराय। कभु नाचे, कभु गाय, भावावेशे मूर्च्छा याय, एइरूपे रात्रि-दिन याय ॥ 150 ॥
अनुवाद—श्रीगौरहरिने इस प्रकार प्रेमावेशमें विलाप किया। महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराम force श्रीरामानन्द रायको साथमें लेकर कभी नृत्य करते, कभी गीत गाते और कभी भावावेशमें मूर्च्छित हो जाते। इस प्रकार महाप्रभुके दिन-रात व्यतीत होते ॥ 150 ॥
स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण, शिरे धरि' करि यार आश। चैतन्यचरितामृत, अमृत हैते परामृत, गाय दीनहीन कृष्णदास ॥ 151 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलापो नाम षोड़शः परिच्छेदः।
अनुवाद—मैं, दीनहीन कृष्णदास, कृपाकी अभिलाषा करते हुए श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके श्रीचरणोंको अपने सिरपर धारण करके अमृतसे भी अत्यधिक श्रेष्ठ अमृत श्रीचैतन्यचरितामृतका गान कर रहा हूँ॥ 151 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलाप नामक सोलहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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