भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2422

[ 16/61-73 सोलहवाँ अध्याय 405 इसके द्वारा श्रीकृष्णकी कृपा मिलती है, इसके साक्षी श्रीकालिदास हैं। महाप्रभु नीलाचलमें इस प्रकार रहते हुए लीलाएँ कर रहे थे और उन्होंने अलक्षित रूपमें श्रीकालिदासपर महाकृपा की॥ 61-64 ॥ रथ-यात्राके उपलक्ष्यमें श्रीशिवानन्दका परमानन्दपुरीदास नामक पुत्रके साथ पुरीमें जाना :- से वत्सर शिवानन्द पत्नी लइया आइला। 'पुरीदास'-छोटपुत्रे सङ्गेते आनिला ॥ 65 ॥ अनुवाद-उस वर्ष श्रीशिवानन्द सेन अपने साथ अपनी पत्नी और अपने छोटे पुत्र पुरीदासको भी लाये ॥ 65 ॥ पुरीदासका महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम :- पुत्रसङ्गे लञा तैंहो आइला प्रभु-स्थाने। पुत्रेरे कराइला प्रभुर चरण वन्दने ॥ 66 ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेन अपने पुत्रको साथ लेकर महाप्रभुके वासस्थानपर आये। उन्होंने अपने पुत्रसे महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना करवायी॥ 66 ॥ उस बालकको श्रीकृष्ण-नामोच्चारणके लिये आदेश, बालकका मौनभाव :- 'कृष्ण कह' बलि' प्रभु बलेन बार बार। तबु कृष्णनाम बालक ना करे उच्चार ॥ 67 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस बालकसे बार-बार 'कृष्ण बोलो', 'कृष्ण बोलो' कहा, किन्तु तब भी बालकने कृष्णनामका उच्चारण नहीं किया॥ 67 ॥ उसके लिये श्रीशिवानन्दके द्वारा व्यर्थ प्रयत्न :- शिवानन्द बालकेरे बहु यत्न करिला। तबु सेइ बालक कृष्णनाम ना कहिला ॥ 68 ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने भी अपने बालकके मुखसे कृष्णनाम कहलवानेके लिये बहुत प्रयत्न किया, तब भी उस बालकने मुखसे कृष्णनाम नहीं कहा॥ 68 ॥ ऐसा देखकर स्वयं महाप्रभुकी विस्मययुक्त उक्ति :- प्रभु कहे,-"आमि नाम जगते लओयाइलूँ। स्थावरे पर्यन्त कृष्णनाम कहाइलूँ ॥ 69 ॥ इहारे नारिलूँ कृष्णनाम कहाइते!" शुनिया स्वरूप गोसाञि लागिला कहिते ॥ 70 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा पुरीदासके मौन रहनेके तात्पर्यकी व्याख्या :- "तुमि कृष्णनाम-मन्त्र कैला उपदेशे। मन्त्र पाञा कार आगे ना करे प्रकाशे ॥ 71 ॥ मने मने जपे, मुखे ना करे आख्यान। एइ इहार मनःकथा करि अनुमान ॥" 72 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैंने सारे जगत्को कृष्णनाम लेनेके लिये प्रेरित किया है, यहाँ तक कि मैंने स्थावर जीवोंसे भी कृष्णनाम करवाया है, किन्तु मैं इस बालकके मुखसे कृष्णनाम नहीं बुलवा पाया!" महाप्रभुके वचनोंको सुनकर श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने कहा,-"आपने इस बालकको कृष्णनाम मन्त्रका उपदेश दिया है। यह आपसे मन्त्र प्राप्त करके किसीके भी आगे उसे प्रकाशित नहीं कर रहा है। यह मन-ही-मनमें कृष्णनाम मन्त्रका जप कर रहा है, केवल मुखसे ही उसका उच्चारण नहीं कर रहा है। मैं इसके मनकी बातका यही अनुमान लगा रहा हूँ॥" 69-72 ॥ अनुभाष्य-श्रीगुरुदेवसे प्राप्त मन्त्रको अन्यके सामने प्रकाशित करनेसे मन्त्रका बल नहीं रहता; श्रीगदाधर पण्डितकी कथासे हमने पहले ही यह जाना है॥ 71 ॥ अन्यदिन महाप्रभुके आदेशसे बालक पुरीदासका मौनभङ्ग और श्लोक-पठन :- आर दिन कहेन प्रभु,-"पड़, पुरीदास।" एइ श्लोक करि' तैंहो करिला प्रकाश ॥ 73 ॥ अनुवाद-अन्य एक दिन महाप्रभुने उस बालकसे कहा,-"पुरीदास! कुछ पढ़कर सुनाओ।" तब पुरीदासने एक श्लोककी रचना करके सबके सामने सुनाया॥ 73 ॥