श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें404 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/55–64 ] अनुवाद—श्रीकालिदास महाप्रभुके वासस्थानके बाहर द्वारपर मनमें कुछ आशा लेकर खड़े थे। महाप्रभु उनके हृदयकी बातको जानते थे, इसलिये उन्होंने सङ्केतसे श्रीगोविन्दसे कुछ कहा॥ 55 ॥ अनुभाष्य—'ठारे',—इशारेसे, सङ्केतसे ॥ 55 ॥ प्रभुर इङ्गिते गोविन्द सब जाने। कालिदासेरे दिल प्रभुर शेषपात्र दाने॥ 56 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके सङ्केतोंको श्रीगोविन्द भली-भाँति समझते थे, इसलिये उन्होंने श्रीकालिदासको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रदान किया ॥ 56 ॥ महाप्रभुकी चरम कृपा प्राप्तिका एकमात्र कारण :— वैष्णवेर शेष-भक्षणेर एतेक महिमा। कालिदासे पाओयाइल प्रभुर कृपा-सीमा ॥ 57 ॥ अनुवाद—वैष्णवोंके उच्छिष्टको खानेकी इतनी महिमा है कि उसीने श्रीकालिदासको महाप्रभुकी चरम कृपाको प्राप्त करवाया॥ 57 ॥ सभी साधकोंको ग्रन्थकारका उपदेश :— ताते 'वैष्णवेर झूटा' खाओ छोड़ि' घृणा-लाज। याहा हैते पाइबा वाञ्छित सब काज ॥ 58 ॥ अनुवाद—इसलिये आप घृणा और लज्जाका त्याग करके वैष्णवोंका जूठा खाओ, जिसके द्वारा आपकी समस्त वाञ्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी ॥ 58 ॥ कृष्णके उच्छिष्ट और भक्तके उच्छिष्टकी संज्ञा :— कृष्णेर उच्छिष्ट हय 'महाप्रसाद'–नाम। 'भक्तशेष' हैले महा–महाप्रसादाख्यान ॥ 59 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके उच्छिष्टका नाम 'महाप्रसाद' होता है। उस महाप्रसादको भक्तोंके द्वारा ग्रहण करनेके पश्चात् उनका उच्छिष्ट महा-महाप्रसाद कहलाता है॥ 59 ॥ साधकको चित्-बल प्रदान करनेवाली तीन अप्राकृत वस्तुएँ :— भक्तपदधूलि आर भक्तपद-जल। भक्तभुक्त-शेष,–एइ तिन साधनेर बल ॥ 60 ॥ अनुवाद—भक्तोंके चरणोंकी धूलि, भक्तोंके चरणोंका जल और भक्तोंका उच्छिष्ट—ये तीन भक्तिसाधनके बल हैं ॥ 60 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तिन साधनेर बल',—भक्तकी चरणधूलिको ग्रहण करना, भक्तोंके चरणोंके जलको ग्रहण करना और भक्तोंके अधरामृतको ग्रहण करना—ये तीनों ही समस्त साधनोंके बलस्वरूप हैं॥ 60 ॥ उपरोक्त तीन वस्तुओंका सेवन ही परमपुरुषार्थरूपी प्रयोजनकी प्राप्तिका सर्वशास्त्र-सम्मत एकमात्र उपाय :— एइ तिन-सेवा हैते कृष्णप्रेमा हय। पुनः पुनः सर्वशास्त्रे फुकारिया कय ॥ 61 ॥ परमपुरुषार्थ प्रेमको प्राप्त करनेके इच्छुक समस्त साधकोंको ग्रन्थकारके द्वारा अनुरोधपूर्वक उपदेश :— ताते बार बार कहि,–शुन, भक्तगण। विश्वास करिया कर ए तिन-सेवन ॥ 62 ॥ उक्त तीनों साधन ही श्रीकृष्णनाम-प्रेम-कृपाको प्राप्त करवानेके एकमात्र उपाय :— तिन हैते कृष्णनाम-प्रेमेर उल्लास। कृष्णेर प्रसाद, ताते 'साक्षी' कालिदास ॥ 63 ॥ भक्तोंके उच्छिष्टमें विश्वासके कारण ही श्रीकालिदासको पुरीमें भगवान्की कृपाकी प्राप्ति :— नीलाचले महाप्रभु रहे एइमते। कालिदासे महाकृपा कैला अलक्षिते ॥ 64 ॥ अनुवाद—उपरोक्त तीन वस्तुओंके सेवनसे कृष्णप्रेमकी प्राप्ति होती है, सभी शास्त्र पुनः पुनः इसकी उच्च स्वरसे घोषणा करते हैं। इसलिये हे भक्तों, सुनो! मैं बार बार कह रहा हूँ कि आप विश्वास करके इन तीनों वस्तुओंका सेवन करो। इनके सेवनसे शुद्धकृष्णनाम और उसके द्वारा परम पुरुषार्थ प्रेमकी प्राप्ति होती है।