श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें406 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/74-81 ] गोपीहृदय-भूषण श्रीकृष्णकी जय :- कविकर्णपूर-कृत आर्यशतकका प्रथम श्लोक- श्रवसोः कुवलयमक्षणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम। वृन्दावनरमणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ 74 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो-श्रवणयुगल (दोनों कानों) के नीलकमल हैं, नेत्रोंके अञ्जन हैं, वक्षःस्थलके महेन्द्र मणिमाला हैं, वृन्दावनकी रमणियोंके अखिल-भूषण हैं, वे हरि जययुक्त हो रहे हैं ॥ 74 ॥ अनुभाष्य- श्रवसोः (कर्णयोः) कुवलयः (नीलोत्पलं) तथा अक्षणोः (चक्षुषोः) अञ्जनं (कज्ज्वलशोभनम्) उरसः (वक्षसः) महेन्द्रमणिदाम (इन्द्रनीलमणिमाला) वृन्दावनरमणीनां (व्रजललनानाम्) अखिलं (सर्वविधं) मण्डनम् (अलङ्काररूपः) हरिः जयति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ बालकके द्वारा श्लोककी रचना करनेसे सभीको विस्मय :- सात वत्सरेर शिशु, नाहि अध्ययन। ऐछे श्लोक करे,—लोके चमत्कार मन ॥ 75 ॥ अनुवाद-सात वर्षका बालक जिसने अभी तक कुछ अध्ययन भी नहीं किया था, उसने ऐसे श्लोककी रचना की—इससे लोगोंके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 75 ॥ महाप्रभुकी कृपाके माहात्म्यका वर्णन :- चैतन्यप्रभुर एइ कृपार महिमा। ब्रह्मादि-देव यार नाहि पाय सीमा ॥ 76 ॥ अनुवाद-यह श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाकी ही महिमा है, ब्रह्मादि देवता भी इसका पार नहीं पा सकते ॥ 76 ॥ गौड़ीय भक्तोंको गौड़ जानेका आदेश :- भक्तगण प्रभुसङ्गे रहे चारिमासे। प्रभु आज्ञा दिला सबे गेला गौड़देशे ॥ 77 ॥ अनुवाद-गौड़देशसे आये भक्त महाप्रभुके साथ चार मास तक रहे, महाप्रभुके द्वारा आज्ञा देनेपर सभी गौड़देशमें लौट गये ॥ 77 ॥ गौड़ीय भक्तोंके साथ बाह्यदशामें किये गये श्रीकृष्णकथाकीर्तन-प्रचारके अतिरिक्त अन्तर्दशामें श्रीकृष्णविरहिणी गोपीभावमें उन्माद :- ताँ-सबार सङ्गे प्रभुर छिल बाह्यज्ञान। ताँरा गेले पुनः हैला उन्माद प्रधान ॥ 78 ॥ अनुवाद-जब तक गौड़देशसे आये भक्त श्रीजगन्नाथपुरीमें महाप्रभुके साथ थे, तब तक महाप्रभुको बाह्यज्ञान रहता था। उनके गौड़देशमें लौट जानेपर महाप्रभुकी पुनः उन्माद दशा ही प्रधान हो गयी ॥ 78 ॥ निरन्तर श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णसङ्गकी अनुभूति अथवा स्फूर्ति :- रात्रि दिने स्फुरे कृष्णेर रूप-गन्ध-रस। साक्षादनुभवे,—येन कृष्ण-उपस्पर्श ॥ 79 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको रात-दिन श्रीकृष्णके रूप, सुगन्ध और रसकी स्फूर्ति होती रहती और वे साक्षात् रूपसे अनुभव करते जैसे वे श्रीकृष्णको स्पर्श कर रहे हों ॥ 79 ॥ महाप्रभुकी उद्घूर्णा-उक्ति और श्रीजगन्नाथरूपी श्यामसुन्दरका दर्शन :- एक दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने। सिंहद्वारे दलइ आसि' करिल वन्दने ॥ 80 ॥ अनुवाद-एक दिन जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये जा रहे थे, तब सिंहद्वारके द्वारपालने आकर महाप्रभुकी वन्दना की ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'दलइ', -द्वारपाल ॥ 80 ॥ तारे बले,—“कोथा कृष्ण, मोर प्राणनाथ? मोरे कृष्ण देखाओ” बलि' धरे तार हात ॥ 81 ॥