भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2424, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2424

[ 16/81-88 सोलहवाँ अध्याय 407

अनुवाद—महाप्रभुने उस द्वारपालसे कहा,—“मेरे प्राणनाथ श्रीकृष्ण कहाँ हैं? मुझे श्रीकृष्णके दर्शन करवाओ।” ऐसा कहकर महाप्रभुने उसका हाथ पकड़ लिया॥81॥ सेह कहे,—“इँहा हय व्रजेन्द्रनन्दन। आइस तुमि मोर सङ्गे, कराङ दरशन॥” 82॥ अनुवाद—द्वारपालने कहा,—“श्रीव्रजेन्द्रनन्दन यहींपर हैं। आप मेरे साथ चलिये, मैं आपको उनके दर्शन करवाता हूँ॥” 82॥ अनुभाष्य—‘इँहा हय’,—यहाँ हैं॥82॥ “तुमि मोर सखा, देखाह,—काँहा प्राणनाथ?” एत बलि’ जगमोहन गेला धरि’ तार हात॥ 83॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम मेरे सखा हो, मुझे दिखाओ मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं?” यह कहकर महाप्रभु उसका हाथ पकड़कर श्रीजगन्नाथ मन्दिरके जगमोहनमें (नाट्य-मन्दिरमें) गये॥83॥ सेह बले,—“एइ देख श्रीपुरुषोत्तम। नेत्र भरिया तुमि करह दरशन॥” 84॥ अनुवाद—द्वारपालने महाप्रभुसे कहा,—“देखिये, ये श्रीपुरुषोत्तम हैं। आप इनका दर्शन करके अपने नेत्रोंको पूर्ण सन्तुष्ट कर लीजिये॥”84॥ गरुड़ेर पाछे रहि’ करेन दरशन। देखेन,—जगन्नाथ हय मुरलीवदन॥ 85॥ अनुवाद—महाप्रभु गरुड़ स्तम्भके पीछे खड़े होकर दर्शन करने लगे, उन्होंने देखा कि श्रीजगन्नाथ तो मुखपर मुरली धारण किये व्रजेन्द्रनन्दन हैं॥85॥ श्रीरघुनाथके द्वारा अपने ग्रन्थमें महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ-दर्शन वर्णित :- एइ लीला निज-ग्रन्थे रघुनाथ दास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश॥ 86॥

अनुवाद—श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने अपने ग्रन्थ चैतन्यस्तवकल्पवृक्षमें इस लीलाका वर्णन किया है॥86॥ स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका (7) श्लोक— क्व मे कान्तः कृष्णस्त्वरितमिह तं लोकय सखे। त्वमेवेति द्वाराधिपमभिवदन्नुन्मद इव। द्रुतः गच्छन् द्रष्टुं प्रियमिति तदुक्तेन धृत तद्- भुजान्तर्गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति॥ 87॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥87॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हे सखे द्वारपाल, मेरे प्राणनाथ कृष्ण कहाँ हैं? शीघ्र ही तुम उन्हें यहाँ दिखलाओ',—जो द्वारपालको उन्मत्तकी भाँति इस प्रकार कहकर, उसके हाथको पकड़कर कृष्णको देखनेके लिये द्रुतगतिसे चले थे, ऐसे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं॥87॥ अनुभाष्य— हे सखे, मे (मम) कान्तः (कृष्णः) क्व (कुत्र)? त्वम् एव इह (अस्मिन् स्थाने समये वा) तं (कान्तं कृष्णं) त्वरितं (शीघ्रं) लोकय (दर्शय) इति (एवम्भूतेन वाक्येन) उन्मदः (उन्मत्तः) इव द्वाराधिपम् अभिवदन् (कथयन्) प्रियं (कृष्णं) द्रष्टुं द्रुतं गच्छ (आगच्छ) तदुक्तेन (द्वाराधिप-वाक्येन) धृततद्भुजान्तः (धृतः तद्भुजान्तं तस्य करप्रान्तं येन सः) गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥87॥ जगन्नाथका बाल्य-भोग :- हेनकाले ‘गोपाल-वल्लभ’-भोग लागइल। शङ्ख-घण्टा आदि सह आरति बाजिल॥ 88॥ अनुवाद—उसी समय श्रीजगन्नाथको उनके सेवकोंने 'गोपाल-वल्लभ' भोग लगाया और शङ्ख, घण्टा आदिकी ध्वनिके साथ आरती होने लगी॥88॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वल्लभ-भोग',—जिसे इस प्रदेश अर्थात् बङ्गालमें 'बालभोग' कहते हैं॥88॥

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