भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2425

408 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/89-98 ] जगन्नाथके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुको महाप्रसाद-प्रदान :- भोग सरिले जगन्नाथेर सेवकगण। प्रसाद लञा प्रभु-ठाञि कैल आगमन ॥89॥ माला पराञा प्रसाद दिल प्रभुर हाते। आस्वाद रहु, यार गन्धे मन माते ॥90॥ महाप्रभुको प्रसाद-ग्रहण करवानेके लिये पण्डोंके द्वारा प्रयत्न :- बहुमूल्य प्रसाद सेइ वस्तु सर्वोत्तम। तार अल्प खाओयाइते सेवक करिल यतन ॥91॥ अनुवाद-भोगके बाद श्रीजगन्नाथके सेवक प्रसाद लेकर महाप्रभुके पास आये। उन्होंने महाप्रभुको माला पहनाकर उनके हाथमें श्रीजगन्नाथका प्रसाद दिया। उस प्रसादके आस्वादनकी बात तो बहुत दूर, उसकी सुगन्धसे ही मन मतवाला हो उठता। बहुमूल्य द्रव्योंसे बना हुआ वह सर्वोत्तम प्रसाद था, इसलिये श्रीजगन्नाथके सेवकोंने महाप्रभुको उसमेंसे थोड़ा-सा अपने समक्ष खिलानेका प्रयत्न किया॥89-91॥ महाप्रभुके द्वारा थोड़ासा महाप्रसाद-ग्रहण :- तार अल्प लञा प्रभु जिह्वाते यदि दिला। आर सब गोविन्देर आँचले बान्धिला ॥92॥ महाप्रसादके आस्वादनसे महाप्रभुमें विस्मय और सात्त्विक विकार :- कोटिअमृत-स्वाद पाञा प्रभुर चमत्कार। सर्वाङ्गे पुलक, नेत्रे बहे अश्रुधार ॥93॥ श्रीकृष्णका अधरामृत जानकर प्रेमावेश; ऐश्वर्याश्रित सेवकोंके दर्शनसे सङ्कोपन :- 'एइ द्रव्ये एत स्वाद काहाँ हैते आइल? कृष्णेर अधरामृत इथे सञ्चारिल ॥'94॥ एइ बुद्धये महाप्रभुर प्रेमावेश हैल। जगन्नाथेर सेवक देखि' सम्वरण कैल ॥95॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस प्रसादमें-से थोड़ा-सा लेकर अपनी जिह्वापर रखा और बाकी प्रसाद उन्होंने श्रीगोविन्दके आँचलमें बाँध दिया। वे उस अल्प प्रसादमें करोड़ों अमृतका आस्वादन प्राप्त करके आश्चर्यचकित हो उठे। उनके समस्त अङ्गोंमें पुलक उदित हो गये और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी अविरल धारा प्रवाहित होने लगी। 'इस प्रसादमें इतना स्वाद कहाँसे आया ? अवश्य ही इसमें कृष्णका अधरामृत सञ्चारित हुआ है।'-ऐसा विचार मनमें आनेसे वे प्रेमाविष्ट हो गये, किन्तु श्रीजगन्नाथके सेवकोंको अपने सामने देखकर उन्होंने अपने भावोंको सम्वरण कर लिया॥92-95॥ भक्ति-उन्मुखी महासुकृतिके फलसे महाप्रसादकी प्राप्ति; अज्ञ जगन्नाथके सेवकोंके द्वारा प्रश्न :- “सुकृति-लभ्य फेला-लव” बलेन बारबार। ईश्वर-सेवक पुछे,-“कि अर्थ इहार ?? ”96॥ अनुवाद-महाप्रभु बार बार कहने लगे,-“फेलाका लेशमात्र [भक्ति-उन्मुखी] महासुकृतिसे प्राप्त होता है।” इसे सुनकर श्रीजगन्नाथदेवके सेवक पूछने लगे,-“इसका क्या अर्थ है?”96॥ अनुभाष्य-महाभारतमें और स्कन्दपुराणके उत्कल खण्डमें वर्णन आता है- “महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे। स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते॥” [अर्थात् “हे राजन्! अल्प सुकृतिवान् व्यक्तिका महाप्रसाद, गोविन्द, भगवन्नाम और वैष्णव-इन चार वस्तुओंमें विश्वास नहीं होता।”]॥96॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अथवा महाप्रसादके माहात्म्यकी व्याख्या :- प्रभु कहे,-“एइ ये दिला कृष्णाधरामृत। ब्रह्मादि-दुर्लभ एइ निन्दये ‘अमृत’ ! ! 97॥ फेला अथवा महाप्रसादकी संज्ञा :- कृष्णेर ये भुक्त-शेष, तार ‘फेला’-नाम। तार एक ‘लव’ ये पाय, सेइ भाग्यवान् ॥98॥ कर्म-उन्मुखी और भक्ति-उन्मुखी-सुकृतिके फलके वैशिष्ट्यका वर्णन :-