भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2426

[ 16/97-106 सोलहवाँ अध्याय 409 सामान्य भाग्य हैते तार प्राप्ति नाहि हय। कृष्णेर याँते पूर्ण कृपा, सेइ ताहा पाय॥99॥ (भक्ति-उन्मुखी) सुकृति-शब्दका अर्थ :- ‘सुकृति’-शब्दे कहे ‘कृष्णकृपा-हेतु पुण्य’। सेइ याँर हय, ‘फेला’ पाय सेइ धन्य॥"100॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“आप लोगोंने मुझे जो श्रीकृष्णका अधरामृत प्रदान किया है, वह ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ और 'अमृत'के माधुर्यको भी पराभूत करनेवाला है! श्रीकृष्णके द्वारा भुक्त भोगके उच्छिष्टका नाम ही 'फेला' है। जो उसके एक कणको भी प्राप्त करता है, वह भाग्यवान् है। सामान्य भाग्य होनेपर उस फेलाकी प्राप्ति नहीं होती, जिनपर श्रीकृष्णकी पूर्ण कृपा होती है, वे ही इसे प्राप्त करते हैं। सुकृति शब्दका अर्थ 'श्रीकृष्णकी कृपाको प्राप्त करने हेतु पुण्य' है, जिसकी ऐसी सुकृति होती है, वह धन्य व्यक्ति ही 'फेला'को प्राप्त करता है॥"97-100॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस पवित्र कर्मसे कृष्णकृपा उत्पन्न होती है, उसे (भक्ति-उन्मुखी) 'सुकृति' कहते हैं॥100॥ अनुभाष्य–'सामान्य भाग्य',-कर्मफलसे उत्पन्न सौभाग्य॥99॥ उपलभोग देखनेके बाद महाप्रभुका अपने वासस्थानपर आगमन :- एत बलि' प्रभु ता-सबारे विदाय दिला। उपल-भोग देखिया प्रभु निज-वासा आइला॥101॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने उन सबको विदायी दी। महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके उपल-भोगको देखनेके पश्चात् अपने वासस्थानपर आ गये॥101॥ श्रीकृष्णके उच्छिष्टके माधुर्यकी स्मृति :- मध्याह्न करिया कैला भिक्षा निर्वाहण। कृष्णाधरामृत सदा अन्तरे स्मरण॥102॥ अनुवाद-महाप्रभुने मध्याह्न कृत्य करनेके पश्चात् भोजन ग्रहण किया, किन्तु उनके हृदयमें निरन्तर श्रीकृष्णके अधरामृतकी स्मृति बनी रही॥102॥ प्रेमावेश और कठिनाईसे उसका सम्वरण :- बाह्य-कृत्य करेन, प्रेमे गर-गर मन। कष्टे सम्वरण करेन, आवेश सघन॥103॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु बाहरके तो सब कार्य कर रहे थे, किन्तु उनका मन प्रेममें गद्गद हो रहा था। महाप्रभु अपने मनको बहुत कठिनाईसे सम्वरण करनेका प्रयास कर रहे थे, किन्तु वह प्रबल आवेशके अधीन हो रहा था॥103॥ सन्ध्याके बाद भक्तोंके साथ श्रीकृष्ण-कथाका आलाप :- सन्ध्या-कृत्य करि' पुनः निजगण-सङ्गे। निभृते बसिला नाना कृष्णकथा-रङ्गे॥104॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने सन्ध्या-कृत्य करके एकान्तमें बैठकर अपने भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक कृष्णकथाकी चर्चा करने लगे॥104॥ श्रीपुरी, श्रीभारती, श्रीस्वरूप, श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यादि भक्तगणोंको श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रसाद प्रदान :- प्रभुर इङ्गिते गोविन्द प्रसाद आनिला। पुरी-भारतीरे प्रभु किछु पाठाइला॥105॥ अनुवाद-महाप्रभुके सङ्केतसे श्रीगोविन्द गोपाल-वल्लभ प्रसाद लेकर आये। महाप्रभुने उसमेंसे कुछ प्रसाद श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारतीके पास भेजा॥105॥ रामानन्द-सार्वभौम-स्वरूपादि-गणे। सबारे प्रसाद दिल करिया बन्ट्ने॥106॥ अनुवाद-बाकी प्रसादको महाप्रभुने श्रीरामानन्द राय, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंमें बाँट दिया॥106॥