भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2428, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2428

[ 16/116-119 सोलहवाँ अध्याय 411 महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :- प्रेमावेशे महाप्रभु यबे आज्ञा दिला। रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥ 116 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने प्रेममें आविष्ट होकर जब श्रीरामानन्द रायको श्लोक सुनानेके लिये आदेश दिया, तब उन्होंने यह श्लोक पढ़ा ॥ 116 ॥ गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरामृतकी याचना (चित्रजल्प) :- श्रीमद्भागवत (10/31/14)में - सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठुचुम्बितम्। इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥ 117 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे वीर, तुम्हारे प्रेमको वर्धित करनेवाला, जगत्के शोकका नाश करनेवाला, स्वरयुक्त वेणुके द्वारा सुन्दररूपसे चुम्बित और चित्तसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंके प्रति रागको भुला देनेवाला तुम्हारा जो अधरामृत है, उसे हमें प्रदान करो॥ 117॥ अनुभाष्य-रासलीलाके समय कृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेसे कृष्णमें ही अपने प्राणोंको अर्पित करनेवाली गोपियाँ कृष्णके विरहमें अत्यन्त कातर होकर रासस्थलीसे यमुनातटपर आकर इस प्रकार विलाप कर रही हैं- हे वीर (दानवीर,) सुरतवर्धनं (सम्भोगेच्छां वर्धयति यत्तत्) शोकनाशनं (अप्राप्तिजन्यदुःखध्वंसकं) स्वरितवेणुना (स्वरितेन नादितेन वेणुना) सुष्ठुचुम्बितं (नादामृत-वासितं) नृणाम् इतररागविस्मारणम् (इतरेषु कृष्णेतर-विषयसुखेषु यः रागः इच्छा, तत् विस्मारयति विलोपयति इति तथा तत्) ते (तव) अधरामृतम् (अधर एव अमृतं) नः (अस्माकं) वितर (देहि)। श्लोक-भावानुवाद-हे दानवीर, सम्भोग इच्छाको वर्धित करनेवाले, तुम्हारी अप्राप्तिसे उत्पन्न दुःखको ध्वंस करनेवाले, नादयुक्त वेणुके द्वारा नादामृतसे सुवासित, मनुष्योंको अपनेसे (कृष्णसे) अतिरिक्त विषयसुखोंकी इच्छाओंको विलुप्त कर देनेवाले अपने अधरामृतको हमें प्रदान करो ॥ 117 ॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा उसीके सूचक श्लोकका पाठ :- श्लोक शुनि' महाप्रभु महातुष्ट हैला। राधार उत्कण्ठा-श्लोक पड़िते लागिला ॥ 118 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके मुखसे श्लोक सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए। तब वे स्वयं श्रीराधाके द्वारा उत्कण्ठाकी अवस्थामें कथित श्लोकका पाठ करने लगे ॥ 118 ॥ श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख चित्-जिह्वाके लोभको वर्धित करनेवाला श्रीकृष्ण-फेला-लवामृत :- गोविन्दलीलामृत (8/8)में विशाखाके प्रति श्रीराधाके वचन- व्रजातुलकुलाङ्गनेतर-रसालितृष्णाहर- प्रदीव्यदधरामृतः सुकृतिलभ्य-फेलालवः। सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः स मे मदनमोहनः सखि तनोति जिह्वा-स्पृहाम् ॥ 119 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि, जिनका अधरामृत-व्रजकी अतुलनीया कुलाङ्गनाओंके अन्यान्य रससमूहोंमें तृष्णाका हरण करनेवाला है, जिनका फेलाकण-सुकृतिसे ही प्राप्त होता है, अमृतको भी पराजित करनेवाले ताम्बुलका चर्वण करनेवाले वे मदनमोहन मेरी जिह्वाकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं ॥ 119 ॥ अनुभाष्य- हे सखि, यः व्रजातुलकुलाङ्गनेतररसालितृष्णाहरप्रदीव्यदधरामृतः (व्रजे याः अतुलाः निरुपमाः कुलाङ्गनाः ब्रजवध्वः तासाम् इतरेषु रसालिषु या तृष्णा तां हर्तुं शीलं यस्य तत् प्रदीव्यत् प्रकृष्टरूपेण सर्वोपरि शोभमानम् अधरामृतं यस्य सः) सुकृतिलभ्य-फेला-लवः (सुकृतिभिः सौभाग्यवद्भिः लभ्यः प्राप्यः फेलायाः अधरसुधायाः लवः स्वल्पांशः यस्य सः) सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः (सुधाजित् अमृतनिन्दितं तथा अहिवल्लिका ताम्बुलवल्ली तस्यां सुदलैः शोभनपत्रैः निर्मिता याः वीटिकाः तासां चर्वितं चर्वणं यस्य सः) मदनमोहनः [स्व-फेलया] जिह्वा-स्पृहां (सेवोन्मुखी-जिह्वालोल्यं) तनोति (वर्धयति)।

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