श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें412 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/119–132 ] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119॥ तबे मोरे क्रोध करि', लज्जा, भय, धर्म छाड़ि', छाड़ि' दिमु, कर आसि' पान। महाप्रभुके द्वारा दोनों श्लोकोंकी व्याख्या :- एत कहि' गौरप्रभु भावाविष्ट हञा। नहे पिमु निरन्तर, तोमाय मोर नाहिक डर, दुइ श्लोकेर अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 120॥ अन्ये देखों तृणेर समान॥' 126॥ वेणु और अधरामृतके सम्मिलित अनुवाद—यह कहकर श्रीगौराङ्ग महाप्रभु भावाविष्ट बलके प्रयोगका फल :- होकर प्रलाप करते हुए उपरोक्त दोनों श्लोकोंका अर्थ अधरामृत निज-स्वरे, सञ्चारिया सेइ बले, करने लगे॥ 120॥ आकर्षय त्रिजगत्-जन। आमरा धर्मे भय करि', रहि यदि धैर्य धरि', प्रथम श्लोककी व्याख्या; तबे आमाय करे विड़म्बन॥ 127॥ श्रीकृष्णधरामृतके चिद्बलका वर्णन :- यथा राग— नीवि खसाय गुरु-आगे, लज्जा-धर्म कराय त्यागे, “तनु-मन कराय क्षोभ, बाड़ाय सुरत-लोभ, केशे धरि' येन लञा याय। हर्ष-शोकादि-भार विनाशय। आनि' कथाय तोमार दासी, शुनि' लोक करे हासि, पासराय अन्य रस, जगत् करे आत्मवश, एइ मत नारीरे नाचाय॥ 128॥ लज्जा, धर्म, धैर्य करे क्षय॥ 121॥ श्रीराधा आदिका मौन-भाव :- नागर, शुन तोमार अधर-चरित। शुष्क बाँशेर लाठिखान, एत करे अपमान, माताय नारीर मन, जिह्वा करे आकर्षण, एइ दशा करिल गोसाञि। विचारिते सब विपरीत॥ 122॥ ध्रु॥ ना सहिं' कि करिते पारि, ताहे रहि मौन धरि', आछुक नारीर काय, कहिते वासिये लाज, चोरार माके डाकि' कान्दिते नाइ॥ 129॥ तोमार अधर बड़ धृष्ट-राय। पुरुषे करे आकर्षण, आपना पियाइते मन, द्वितीय श्लोककी व्याख्या; श्रीकृष्णके अधरामृतके माहात्म्यका वर्णन :- अन्यरस सब पासराय॥ 123॥ अधरेर एइ रीति, आर शुन श्रीकृष्णके वेणुके प्रति श्रीराधाकी ईर्ष्या :- कुनीति, सचेतन रहु दूरे, अचेतन सचेतन करे, से अधर-सने यार मेला। तोमार अधर—बड़ बाजिकर। सेइ भक्ष्य-भोज्य-पान, हय अमृत-समान, तोमार वेणु शुष्केन्धन, तार जन्माय इन्द्रिय-मन, नाम तार हय 'कृष्ण-फेला'॥ 130॥ तारे आपना पियाय निरन्तर॥ 124॥ से फेलार एक लव, ना पाय देवता सब, वेणु धृष्ट-पुरुष हञा, पुरुषाधर पिया पिया, ए दम्भे केबा पातियाय? गोपीगणे जानाय निज-पान। बहु जन्म पुण्य करे, तार 'सुकृति' नाम धरे, 'ओहे, शुन, गोपीगण, बले पिउने तोमार धन, से 'सुकृते' तार लव पाय॥ 131॥ तोमार यदि थाके अभिमान॥ 125॥ कृष्ण ये खाय ताम्बुल, कहे तार नाहि मूल,