श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें416 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/142-149 ] ताहा लागि' तपस्या विचारि॥" 149॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142-149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कोई गोपी अन्य गोपियोंसे कह रही है,—'देखो, व्रजेन्द्रनन्दनकी यह कैसी आश्चर्यमय लीला है। यह अवश्य ही ब्रजकी कन्याओंसे विवाह करेगा, अतएव गोपियाँ जानती हैं कि कृष्णका अधरामृत—उन्हींका निजधन है एवं वह अधरामृत अन्योंका प्राप्य नहीं है।' हे गोपीगण, विचार करके देखो कि कृष्णके इस वेणुने अपने किसी अन्य जन्ममें अवश्य ही कोई तीर्थाटन, कोई तप अथवा किसी सिद्धमन्त्रका जप किया था, जिसके द्वारा उसने इस प्रकार कृष्णकी अधरसुधाको, — जिसके लिये गोपियाँ प्राण धारण कर रही हैं, उसे—अपनी ‘अमृत मुद्रा (धन)’ बना लिया है। यह वेणु—अतिशय अयोग्य है, स्थावर वंशमें उत्पन्न हुआ है; उसपर भी 'पुरुषजाति'का होकर कृष्णकी अधरसुधाका सर्वदा पान किया करता है। यह गोपियोंका अपना धन होनेपर भी वेणु उन्हें नहीं बतलाकर उसे बलपूर्वक पान करता है एवं गोपियोंको उच्च स्वरसे पान करते हुए आह्वान करता है। पुनः, इस वेणुकी तपस्याका फल और भाग्यका बल देखो, — इसका उच्छिष्ट महाजन तक खा रहे हैं, कृष्ण जब भुवनपावनी कलिन्द-नन्दिनी और मानसगङ्गामें स्नान करते हैं, तब वे (यमुना एवं मानस-गङ्गारूपी महाजन) लोभके वशीभूत होकर वेणुके उच्छिष्ट अधररसका प्रसन्नतापूर्वक पान करती हैं। नदीकी बात दूर रहे, उस नदीके तटपर लगे तापस [जिसके बेरसे औषधीय तेल बनता है]—जैसे परोपकारी वृक्ष भी किसलिये जड़के द्वारा नदीके उपभुक्त बचे हुए रसको आकर्षित करके पान करते हैं, मैं उसे नहीं समझ पा रही हूँ। वे सब वृक्ष अपने-अपने अङ्कुरसे पुलकित और पुष्प-विकासके रूपमें हास्यसे विकसित होकर 'मधुमिषे' अर्थात् मधुके छलसे अश्रुधाराको बहाते हैं; ऐसा लगता है, आर्यपुरुष अपने पुत्र-पौत्रके वैष्णव होनेपर जिस प्रकार आनन्द-विकारको प्राप्त करते हैं, वृक्षगण स्व-वंशीय वृक्षजातिरूपी वेणुको वैसा मानकर कार्य कर रहे हैं। अब बात यह है कि, वेणु—अत्यन्त अयोग्य है, किन्तु हम—योग्य नारियाँ हैं; वेणुने ऐसी कौन-सी तपस्या की है, उसे जाननेपर हम भी वैसी ही तपस्या करेंगी। हमारे मनकी बात यह है कि अयोग्य वेणुको कृष्ण-अधरामृतका पान करते देखकर हम दुःखसे मर रही हैं; इसलिये ही वेणुकी तपस्याका