श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 16/140-149 सोलहवाँ अध्याय 415 यह गोपियोंको प्राप्त होनेवाले कृष्णकी अधरसुधाका भोग कर रहा है? आर्य व्यक्ति जिस प्रकार (किसी भगवद्भक्त) श्रेष्ठ सन्तानका (जन्म देखकर उसके लिये आनन्दमें अश्रु विसर्जित) करता है, उसी प्रकार यह वेणु जिन (सब नदियोंके) जलसे पुष्ट हुआ है, (वे सब नदियाँ अपने-अपने ऊपरी भागमें स्थित विकसित कमलसमूहरूपी रोमसमूहके द्वारा प्रसन्न हो रही हैं) एवं जिस वृक्षसे इसका जन्म हुआ है, उसी जातिके समस्त वृक्ष ही आनन्दवशतः मधुधारारूपी अश्रु बहा रहे हैं॥ 140॥ अनुभाष्य—व्रजमें शरत्कालके उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा वनमें गोचारण करते हुए वंशीकी ध्वनि करनेपर गोपियाँ कृष्णसङ्गके लिये कामातुर होकर कृष्णकी मनोहर गुणावलीका गान करके इधर-उधर भ्रमण करते करते कृष्णके वेणुके सौभाग्यका वर्णन कर रही हैं— अन्या अन्या ऊचुः—हे गोप्यः, अयं वेणुः किं कुशलं (पुण्यम्) आचरत् (अनुष्ठितवान्) स्म, यत् (यस्मात्) गोपिकानाम् (एव भोग्यां सतीमपि) दामोदराधरासुधां (कृष्णाधरामृतं) स्वयं (स्वातन्त्र्येण) अवशिष्टरसं (केवलमवशिष्टरसमात्रं यथा भवति, तथा) भुङ्क्ते; ह्रदिन्यः (यासां पयसा पुष्टः ताः मातृतुल्याः नद्यः) हृष्यत्त्वचः (जात-रोमहर्षाः विकसितकमलवन-मिषेण रोमाञ्चिताः) [लक्ष्यन्ते]; आर्याः (कुलवृद्धाः) यथा [स्ववंशे भगवत्सेवकं दृष्ट्वा पुलकिताः सन्तः अश्रु मुञ्चन्ति, तद्वत्] तरवः (येषां वंशे स जातः ते) अश्रु (मधुधारा-मिषेण आनन्दाश्रु) मुमुचुः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140॥ महाप्रभुके द्वारा भावावेशमें प्रलाप-व्याख्या :- एइ श्लोक शुनि' प्रभु भावाविष्ट हञा। उत्कण्ठाते अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 141॥ अनुवाद—इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु भावाविष्ट हो गये और उत्कण्ठित होकर प्रलाप करते हुए उस श्लोकका अर्थ प्रकाशित करने लगे॥ 141॥ श्लोकका अर्थ; वेणुके द्वारा श्रीकृष्णके अधरामृतके पानके सौभाग्यको देखकर गोपियोंमें ईर्ष्या तथापि स्तुतिपूर्ण वचन (चित्रजल्प) :- “अहो, व्रजेन्द्रनन्दन, व्रजेर कोन कन्यागण, अवश्य करिब परिणय। से-सम्बन्धे गोपीगण, यारे जाने निजधन, से सुधा अन्येर लभ्य नय॥ 142॥ गोपीगण, कह सब करिया विचारे। कोन तीर्थ, कोन तप, कोन सिद्धमन्त्र-जप, एइ वेणु कैल जन्मान्तरे??143॥ ध्रु॥ हेन कृष्णाधर-सुधा, ये कैल अमृत मुदा, यार आशाय गोपी धरे प्राण। एइ वेणु अयोग्य अति, स्थावर 'पुरुषजाति', सेइ सुधा सदा करे पान॥ 144॥ यार धन, ना कहे तारे, पान करे बलात्कारे, पिते तारे डाकिया जानाय। तार तपस्यार फल, देख इहार भाग्य-बल, इहार उच्छिष्ट महाजने खाय॥ 145॥ मानसगङ्गा, कालिन्दी, भुवन-पावनी नदी, कृष्ण यदि ताते करे स्नान। वेणु-झुटाधर-रस, हञा लोभे परवश, सेइकाले हर्षे करे पान॥ 146॥ एत नदी रहु दूरे, वृक्ष सब तार तीरे, तप करे पर-उपकारी। नदीर शेष-रस पाञा, मूलद्वारे आकर्षिया, केने पिये, बुझिते ना पारि॥ 147॥ निजाङ्कुरे पुलकित, पुष्पे हास्य विकसित, मधु-मिषे बहे अश्रुधार। वेणुरे मानि' निज जाति, आर्येर येन पुत्र-नाति, 'वैष्णव' हैले आनन्द-विकार॥ 148॥ वेणुर तप जानि यबे, सेइ तप करि तबे, ए-अयोग्य, आमरा-योग्या नारी। याहा ना पाञा दुःखे मरि, अयोग्य पिये सइते नारि,