भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2431

414 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/121-140 ] कृष्णफेलाके लव अथवा कणको प्राप्त करते हैं। कृष्णके द्वारा चबाये गये ताम्बुल (पान)-प्रसादके उद्गारको 'अमृतसार' कहते हैं; गोपियोंका मुख—उसे रखनेकी आलवाटी अर्थात् पीकदानीके समान है। अतएव हे श्याम, तुम अपनी इस कुटीनाटीकी परिपाटीका (कुशलताका) परित्याग करो; वेणुके द्वारा गोपियोंके प्राणोंका नाश मत करो; तुम हँसते-हँसते नारियोंके वधके भागीदार मत बनो, हमें अपना अधरामृत दान करो। 'आपणार हासि लागि',—प्रथम अर्थ यह है कि नारीके वधके भागीदार होनेके कारण आपकी ही निन्दा होगी, वैसा नहीं करके अपना अधरामृत दो; दूसरा अर्थ यह है कि अपने कौतुकके लिये नारीका वध मत करो ॥ 121-133 ॥ अनुभाष्य—'भार विनाशय',—पाठान्तरमें 'भाव विलास्य' और 'भाव-विनाशय'। 'धृष्ट-राय',—प्रगल्भ अथवा उद्धत- प्रधान। 'नीवि',—कटिबन्ध, वस्त्रको बाँधनेवाला नाड़ा; 'खसाय',—खोल देता है। 'मेला',—मिलन। 'पातिआय',—प्रतीति होती है। 'आलबाटी',—लारकी कटोरी, पीकदानी। 'कुटिनाटि',—कपटता; 'परिपाटी',—कारीगिरि, निपुणता, कुशलता ॥ 121-133 ॥ महाप्रभुकी उत्कण्ठा :— कहिते कहिते प्रभुर मन फिरि' गेल। क्रोध मन शान्त हैल, उत्कण्ठा बाड़िल ॥ 134 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कहते-कहते श्रीगौरहरिका मन बदल गया। उनके मनका क्रोध शान्त हो गया और उत्कण्ठा बढ़ गयी॥ 134 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण-अधरामृतकी परम-महिमाका कीर्तन :— “परम दुर्लभ एइ कृष्णाधरामृत। ताहा येइ पाय, तार सफल जीवित ॥ 135 ॥ योग्य हञा केह करिते ना पाय पान। तथापि से निर्लज्ज, वृथा धरे प्राण ॥ 136 ॥ अयोग्य हञा ताहा केह सदा पान करे। योग्य जन नाहि पाय, लोभे मात्र मरे ॥ 137 ॥ ताते जानि,—कोन तपस्यार आछे बल। अयोग्येरे देओयाय कृष्णाधरामृत-फल ॥ 138 ॥ महाप्रभुके आदेशसे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :— कह राम राय, किछु शुनिते हय मन।” भाव जानि' पड़े राय गोपीर वचन ॥ 139 ॥ अनुवाद—महाप्रभु आगे कहने लगे,—“श्रीकृष्णका अधरामृत परम दुर्लभ है, उसे जो प्राप्त करता है, उसीका जन्म सफल है। यदि कोई व्यक्ति योग्य होनेपर भी उस अधरामृतको पान नहीं कर पाता, तो वह निर्लज्ज व्यर्थ ही अपने प्राणोंको धारण करता है। और ऐसे भी व्यक्ति हैं जो अयोग्य होनेपर भी उस अधरामृतका सदैव पान करते हैं। कुछ योग्य व्यक्ति उसे नहीं पाकर उसकी लालसामें ही मरते हैं। इससे यह जाना जाता है कि अयोग्य दिखलायी देनेवालेमें भी किसी तपस्याका बल है, जो उसे कृष्ण-अधरामृतरूपी फल प्रदान कराता है। हे रामानन्द राय! मेरा कुछ श्रवण करनेका मन है।” महाप्रभुके भावको जानकर श्रीरायने गोपियोंके वचनका पाठ किया॥ 135-139॥ गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरके स्पर्शसे सुखी वेणुकी प्रशंसा :— श्रीमद्भागवत (10/21/9) में— गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु- र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्। भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्यो हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः॥ 140 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[किसी एक गोपीने अन्य गोपियोंसे कहा,—] हे गोपियों, इस वेणुने क्या सुकृति की थी कि