श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 16/31-41 सोलहवाँ अध्याय 401
वे उनके घरके निकट ही किसी एक स्थानपर छिप गये॥ 31-32॥ समस्त ब्राह्मणोंके गुरु झडु-ठाकुरके द्वारा मनोमयी अर्च्चाके मानस-पूजनके बाद श्रीकृष्णका उच्छिष्ट मानकर आमको खाना :- झडुठाकुर घर याइ' देखि' आम्रफल। मानसेइ कृष्णचन्द्रे अर्पिला सकल॥ 33॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने अपने घर जाकर जब श्रीकालिदासके द्वारा भेंटमें लाये आमोंको देखा, तब उन्होंने मन-ही-मन श्रीकृष्णचन्द्रको समस्त आम अर्पित किये॥ 33॥ कलार पाटुया खोला हैते आम्र निकालिया। ताँर पत्नी ताँरे देन, खायेन चुषिया॥ 34॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीने केलेके पेड़के पत्ते और छालसे बने दोनेमें-से आम निकालकर उन्हें दिये और श्रीझडु ठाकुरने उन्हें चूसकर खाया॥ 34॥ अनुभाष्य—'पाटुया-खोला',—पत्ते और छाल; 'निकालिया',—बाहर निकाल करके॥ 34॥ वैष्णव-पत्नीके द्वारा वैष्णव-पतिके उच्छिष्टका सम्मान :- चुषि' चुषि' चोषा आठि फेलिला पाटुयाते। ताँरे खाओयाञा ताँर पत्नी खाय पश्चाते॥ 35॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने आमकी गुठलियोंको भी चूस-चूसकर उसे उसी दोनेमें डाल दिया। श्रीझडु ठाकुरको आम खिलानेके बाद उनकी पत्नीने स्वयं भी आम खाये॥ 35॥ आठि-चोषा सेइ पाटुया-खोलाते भरिया। बाहिरे उच्छिष्ट-गर्त्ते फेलाइला लञा॥ 36॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीने भी आमकी गुठलियोंको उसी दोनेमें भरकर उसे अपने घरके बाहर बने जूठन फेंकनेवाले गड्ढेमें फेंक दिया॥ 36॥ महासौभाग्यवान् श्रीकालिदासके द्वारा अति आनन्दसे अप्राकृत-बुद्धिसे वैष्णव-उच्छिष्टका सम्मान :- सेइ खोला, आठि, चोकला चुषे कालिदास। चुषिते चुषिते हय प्रेमेते उल्लास॥ 37॥ अनुवाद—श्रीकालिदास उस दोनेको और उसमें पड़ी गुठलियों तथा आमके छिलकोंको चूसने लगे। चूसते-चूसते वे प्रेममें आविष्ट हो गये॥ 37॥ अनुभाष्य—'चोकला',—छिलका॥ 37॥ गौड़देशके समस्त वैष्णवोंके उच्छिष्टका सम्मान करनेवाले श्रीकालिदास :- एइमत यत वैष्णव वैसे गौड़देशे। कालिदास ऐछे सबार निला अवशेषे॥ 38॥ अनुवाद—जितने भी वैष्णव गौड़देशमें रहते थे, श्रीकालिदासने इसी प्रकार उन सबके उच्छिष्टको ग्रहण किया॥ 38॥ पुरीमें आनेपर श्रीकालिदासके प्रति महाप्रभुके द्वारा उनपर निष्कपट महाकृपा :- सेइ कालिदास यबे नीलाचले आइला। महाप्रभु ताँर उपर महाकृपा कैला॥ 39॥ अनुवाद—वे श्रीकालिदास जब श्रीजगन्नाथपुरीमें आये, तब महाप्रभुने उनके ऊपर महान कृपा की॥ 39॥ महाप्रभुके कमण्डलुके वाहक श्रीगोविन्द :- प्रतिदिन प्रभु यदि यान दरशने। जल-करङ्ग लञा गोविन्द याय प्रभु-सने॥ 40॥ अनुवाद—प्रतिदिन जब महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये जाते थे, तब श्रीगोविन्द जलसे भरे कमण्डलुको अपने हाथमें लेकर महाप्रभुके साथ-साथ चलते थे॥ 40॥ सिंहद्वारके निकट सीढ़ीके नीचे गड्ढेमें महाप्रभुके चरणोंको धुलवाना :- सिंहद्वारेर उत्तरदिके कपाटेर आड़े। बाइश 'पहाच'-तले आछे एक निम्न गाड़े॥ 41॥