श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/219-225 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करके हमारी विचार-विवेक बुद्धिको कुण्ठित कर दिया है।' रासके समय नृत्य करते हुए श्रीकृष्ण ये हस्तकमल गोपियोंके गलेमें डाल देते हैं, अपने पीताम्बरसे गोपियोंके मुखारविन्दपर नृत्य-परिश्रमके द्वारा आये स्वेद-कणोंको पोंछ देते हैं। गोपियाँ दिवा-रात्रि इसी मिलनकी चिन्ता करती हैं। श्रीकृष्णके हस्त एवं चरणकमल ब्रह्मादिके ध्यानमें भी नहीं आते और गोपियाँ इन्हें साक्षात् रूपमें प्राप्त करती हैं। वे श्रीकृष्णको परब्रह्म नहीं, अपने प्राणप्रियतमके रूपमें जानती हैं और उनके पद्मके समान सुगन्धित हाथोंको अपने शीशपर धारण करना चाहती हैं। भागवत (10/31/5)-'शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्' अर्थात् अपने कमनीय और कामप्रद करकमल हमारे सिरपर अर्पण करो। गोपियाँ इन सर्पाकार भुजाओंके प्रति अत्यन्त आसक्त हैं और उनकी सेवा करती हैं। 'वयमपि ते समाः समदृशः'-इन्हीं गोपियोंके भावोंके अनुगत होकर हम वेदमन्त्रकी ऋचाओंने गोपीदेह प्राप्तकर गोपीभावसे आपके 'अंघ्रिसरोजसुधाः' अर्थात् आपके चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है। ये श्रुतिचरी गोपियाँ साधन-सिद्धा हैं। इन्होंने एकान्त निर्जन स्थानमें गोपाल-मन्त्र और कामगायत्रीके द्वारा कठोर तपस्या की। तब श्रीकृष्णने आकाशवाणीके द्वारा पूछा,-'तुम लोग क्या चाहती हों? वर माँगो। मैं तुम्हारा अभीष्ट पूर्ण करूँगा।' श्रुतियोंने कहा-'हे कृष्ण! कोटि-कोटि कामदेवोंके लावण्यपर विजय प्राप्त करनेवाले आपके सौन्दर्यके कारण हमारा मन कामिनी भावमें विभावित होकर निश्चय ही कामसे मोहित हो रहा है। गोकुलवासिनी गोपरमणियाँ जिस प्रकार आपको 'रमण' समझकर आपका भजन करती हैं, हम भी आपको उसी भावसे पानेके लिए तीव्र वासनाका पोषण कर रही हैं।' तब श्रीकृष्णने कहा-'हे श्रुतियों! तुम्हारा मनोरथ उत्तम है। यद्यपि तुम्हारी वासना अत्यन्त दुर्लभ और दुर्घट है, तथापि मेरे अनुमोदनसे यह भली-भाँति फलीभूत होगी। अब तुम लोग गोपियोंका भाव ग्रहण करो और उस भावसे भजन करो।' इन श्रुतिचरी गोपियोंने इसी प्रकार गोपियोंका आश्रय ग्रहण करके भजन किया, तब उनकी स्वरूप-सिद्धि हुई। इसके बाद वस्तु-सिद्धि होनेपर उनको प्रकट ब्रजमें जन्म प्राप्त हुआ, जहाँ उन्हें नित्य-सिद्ध गोपियोंका सङ्ग मिला और उनके आनुगत्यमें उन्हें श्रीकृष्ण-सेवाकी शिक्षा मिली तथा वे गोपी बनकर सेवा करने लगीं। श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंमें नित्य-सिद्ध गोपियोंका नित्य-सिद्धत्त्व अष्टादशाक्षर मन्त्रादिमें प्रकाशित है। इस मन्त्रमें 'गोपीजनवल्लभ' पदसे नित्य-सिद्धा श्रीराधिका आदि गोपियोंके साथ एकत्र भावसे ही श्रीकृष्णकी आराधनाका अनादि कालसे विधान है और यही विधि प्रचलित है।"-श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 219-223 ॥ श्लोकमें वर्णित शब्दोंका अर्थ :- 'समदृशः'-शब्दे कहे 'सेइ भावे अनुगति'। 'समाः'-शब्दे कहे श्रुतिर गोपीदेह-प्राप्ति ॥ 224 ॥ 'अङिघ्रपद्मसुधाय' कहे 'कृष्णसङ्गआनन्द'। विधिमार्गे ना पाइये व्रजे कृष्णचन्द्र ॥ 225 ॥ अनुवाद-उपरोक्त श्लोकमें 'समदृशः' शब्दका तात्पर्य गोपियोंके भावोंके आनुगत्य होकर। 'समाः' शब्द श्रुतियोंके द्वारा गोपी देहकी प्राप्तिको सूचित करता है। तथा 'अङ्घ्रि-पद्मसुधा'का तात्पर्य है-श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंका अमृत अर्थात् श्रीकृष्णसङ्ग और श्रीकृष्णसेवाजनित आनन्द। विधिमार्गसे कभी भी ब्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको नहीं पाया जा सकता ॥ 224-225 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्लोकके चौथे पादमें 'समदृशः'- शब्दसे 'गोपीभावमें आनुगत्य' की व्याख्या की है और 'समाः'-शब्दसे श्रुतियोंकी 'गोपीदेह-प्राप्ति' की व्याख्या है। 'अङ्घ्रिसरोजसुधा'-शब्दसे 'कृष्णसङ्ग-आनन्द' की व्याख्या है ॥ 224-225 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 9/133-134 संख्या देखें ॥ 223-225 ॥ 316 ।