भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1163

आठवाँ अध्याय 8/219-223 ] गोपीदेहसे [अपने सिद्धदेहसे] व्रजेन्द्रनन्दनका भजन किया था॥219-222॥ अनुभाष्य—‘रागानुग-मार्ग’—आदिलीला 4/167-169, 175 संख्या तथा मध्यलीला 22/145-162 संख्या देखें॥220-222॥ गोपियोंके आनुगत्यमें श्रुतियोंको श्रीकृष्णकी मधुर सेवाकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (10/87/23)— निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजो हृदि य- न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्। स्त्रिय उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्त-धियो वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाः॥223॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥223॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुनि लोगोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्‌के सभी शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें प्रवेश किया था। व्रजस्त्रियोंने श्रीकृष्णके सर्प-शरीरतुल्य भुजाओंके सौन्दर्यरूप तीव्र विषके द्वारा हतबुद्धि होकर उनके चरणकमलोंकी सुधाको प्राप्त किया था। हमने भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके गोपीभावसे उनके चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है॥223॥ अनुभाष्य—जनलोकमें ब्रह्मसत्र-यज्ञमें श्रोता ऋषियोंको सनन्दनका श्रुतियोंके द्वारा किये गये भगवान्‌के स्तवका वर्णन— निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजः (मरुत् प्राणश्च मनः च अक्षाणि इन्द्रियाणि च निभृतानि संयमितानि यैः ते संयतवायुहृदयैन्द्रियाः, दृढ़योगं युञ्जन्तीति दृढ़योगयुजश्च ते तथाभूताः अविचलितपरानुरक्ताः) मुनयः यत् (तत्त्वं) हृदि उपासते (अनुभवन्ति), तत् अरयः (कृष्णविद्वेषिणः) अपि [तव] स्मरणात् (वैरभावेन चिन्तनात्) ययुः (निर्विशेषतां प्रापुः); उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्तधियः (उरगेन्द्रस्य सर्पस्य भोगः देहः तत्तुल्ययोर्भुजदण्डयोः विषक्ता धीः यासां ताः) स्त्रियः, वयम् अपि समाः (गोपीकायव्यूहेन तत्तुल्यरूपाः) समदृशः (तद्भावानुगत-भावमयाः) ते (तव) अङ्घ्रिसरोजसुधाः (पादपद्मं सुष्ठु धारयन्त्यः सत्यः) [तत् त्वद्रूपं तत्त्वं ययिमिति शेषः]। श्लोक-भावानुवाद—मुनि लोगोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके अविचलित अनुरक्त हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्‌के सभी शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें प्रवेश किया था। श्रीकृष्णके सर्प-शरीरतुल्य भुजाओंके सौन्दर्यमें आसक्त जिन गोपियोंकी बुद्धि है, हमने भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके उन गोपियोंके भावोंके अनुगत होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुष्ठु रूपसे [हृदयपर] धारण किया है। [श्रीकृष्णके ऐसे रूपकी हम शरणागति ग्रहण करती हैं।]॥223॥ अमृतानुकणिका—“जिन श्रुतियोंने गोपी बनकर श्रीकृष्णको प्राप्त किया, वे स्वयं ही श्रीमद्भागवतमें श्रुति-स्तवमें अपने साधनका वर्णन कर रही हैं। श्रुतिमन्त्र श्रीकृष्णके मुखारविन्द या उनकी श्वाससे निकले हैं; वे चेतन हैं, आत्मभूत हैं अर्थात् कृष्णने ही उनके रूपमें अवतार लिया है। इन श्रुतिचरी गोपियोंका प्रमाण श्रीबृहद्वामनपुराणके श्रुति-स्तवमें उल्लिखित है—उन्होंने श्रीकृष्णके कोटि कन्दर्पके लावण्यको विजय करनेवाले रूपके दर्शनसे कामिनी भावमें विभावित होकर गोपीभावसे कृष्णको पानेकी तीव्र अभिलाषा की थी। ‘निभृतमरुन्मनो’—मुनिजन और श्रीकृष्णके शत्रुओंने श्रीकृष्णके निर्विशेष भावको प्राप्त किया। उन्हीं श्रीकृष्णको गोपियोंने उरगेन्द्रके अर्थात् श्रेष्ठ सर्पके तुल्य भुजाओंके सौन्दर्यके द्वारा अत्यधिक रूपमें आकर्षित होकर प्राप्त किया। सर्पका सुचिक्कण, सुशीतल और सुगोल होता है। गोपियाँ कहती हैं—‘कृष्णकी भुजाएँ भी ऐसी ही सुगोल, सुशीतल और कोमल हैं। इन सर्पाकार भुजाओंका आलिङ्गन-पाश कामनाओंका प्रवाह उत्पन्न करता है। जिस प्रकार सर्पका विष अति तीव्र होता है, इन भुजाओंके सौन्दर्यने तीव्र विषके समान कार्य । 315