श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1162, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/214–222 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'काम'—यह सम्बिद्विग्रह-श्रीकृष्णकी सेवापरायण वृत्ति नहीं है, अपितु श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुका सुख इसका लक्ष्य है। 'प्रेम'—यह केवलमात्र श्रीकृष्णके सुखतात्पर्य और श्रीकृष्ण-सेवामय होता है। गोपियोंके कामका नाम ही 'प्रेम' है, क्योंकि गोपियाँ अपनी इन्द्रियोंका सुख नहीं चाहतीं, केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये सजातीय-सखीके द्वारा सेवा करवाकर एवं वैसी सखीके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होकर मात्र श्रीकृष्ण-काम स्वीकार करती हैं। आदिलीला 4/161-166 संख्या देखें ॥ 214-217 ॥ श्रीमद्भागवत(10/31/19) :- यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥ 218 ॥ अनुवाद—विरहणी गोपियाँ विलाप करती हुई कह रही हैं—"हे प्रिय ! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥" 218 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें ॥ 218 ॥ रागानुगा भक्तिका परिचय :- सेइ गोपीभावामृते याँर लोभ हय। वेदधर्म त्यजि' से कृष्णके भजय ॥ 219 ॥ रागानुग-मार्गे ताँरे भजे येइ जन। सेइ जन पाय व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 220 ॥ व्रजलोकेर कोन भाव लञा येइ भजे। भावयोग्य देह पाञा कृष्ण पाय व्रजे ॥ 221 ॥ रागमार्गके द्वारा श्रुतियोंकी कृष्णप्राप्ति :- ताहाते दृष्टान्त—उपनिषद् श्रुतिगण। रागमार्गे भजि' पाइल व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 222 ॥ अनुवाद—जिन्हें पूर्वकथित गोपीभावामृत प्राप्त करनेका लोभ होता है, वे वेद-धर्मका (इहलोक और परलोकके सुखकी कामनाका) सम्पूर्ण रूपसे त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं। जो रागानुग-मार्गमें भजन करते हैं, वे ही व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको प्राप्त करते हैं। जो व्रजमण्डलके परिकरोंके किसी एक विशेष भावको लेकर भजन करते हैं, वे भाव योग्य सिद्धदेहकी प्राप्ति करके व्रजमें श्रीकृष्णकी सेवा प्राप्त करते हैं। इसका दृष्टान्त उपनिषद् अथवा श्रुतियाँ हैं, जिन्होंने रागमार्गमें भजन करके श्रीव्रजेन्द्रनन्दनकी सेवा प्राप्त की थी ॥ 219-222 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—विधि-मार्गमें भजनके चौंसठ अङ्ग हैं, निर्मल श्रद्धाके साथ इन अङ्गोंका पालन करनेपर ही भक्तिमें अधिकार उत्पन्न होता है। परन्तु व्रजवासियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो स्वाभाविक राग है, उसे देखकर जिन्हें उस मार्गपर चलनेके लिये लोभ होता है, उन्हें वही गोपीभावामृत-लोभ ही रागानुग-मार्गमें अधिकार प्रदान करता है। रागानुगमार्गमें प्रवेशकर भजन करनेसे वर्णाश्रमादि-वैदिकधर्ममें आसक्तिका सहज ही त्याग हो जाता है। व्रजमें रक्तक-पत्रकादि श्रीकृष्णके दास, श्रीदाम-सुबलादि श्रीकृष्णके सखा, श्रीनन्द-यशोदादि श्रीकृष्णके पिता-माता,—ये सब अपने-अपने रसके अनुसार श्रीकृष्णका भजन अर्थात् उनकी सेवा करते हैं। व्रजरसके भजनमें प्रवृत्ति होनेपर उक्त किसी विशेष रसमें जिन्हें लोभ होता है, वे उस भावके योग्य चित्स्वरूप प्राप्त करके सिद्धिकालमें श्रीकृष्णको प्राप्त होते हैं;—उपनिषद् अथवा श्रुतियाँ ही इसका दृष्टान्त हैं। श्रुतियोंने देखा कि गोपियोंका आनुगत्य नहीं करनेसे व्रजमें श्रीकृष्ण भजनका अधिकार प्राप्त नहीं होता, तब उन्होंने गोपियोंके आनुगत्यको ग्रहण करके रागमार्गमें 314 ।