श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1161, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/200-217 ] अर्थात् जितने भी रस लोलुप रसिक भक्त हैं, वे करेंगे ही, क्योंकि उन्हें कुञ्जसेवा प्राप्तिका लोभ हो गया है। यही लोभ कुञ्जसेवा प्राप्तिका प्रथम सोपान है। 'सखीर स्वभाव एक अकथ्य-कथन'—सखियोंका एक ऐसा सुन्दर, मधुर और रहस्यपूर्ण स्वभाव है, जो अकथ्य कथन है, जिसे कहना उचित नहीं है। परन्तु महाप्रभु श्रीरामानन्दके श्रीमुखसे यह इसलिये कहलवा रहे हैं कि नहीं कहनेसे यह विद्या ही लोप हो जायेगी और जो इसके लिए योग्य व्यक्ति हैं, वे वञ्चित रह जायेंगे। भागवतमें लिखा है—'कर्मण्या एव दुःख....' सभी व्यक्ति अपने दुःखको दूर करनेके लिये और सुखको पानेके लिये कार्य करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवा भी एक महत्-स्वार्थके लिये करते हैं, स्वर्गसे ऊपर दो प्रकारकी मुक्तियाँ हैं—सुखैश्वर्य-उत्तरा और प्रेमसेवा-उत्तरा। सुखैश्वर्य-उत्तरा मुक्ति भी दुःखोंसे परे निजसुखके लिये ही है। मुखसे कहनेपर कि वे श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये भजन कर रहे हैं, तो भी सब लोग श्रीकृष्णका भजन करके श्रीकृष्णको ही प्राप्त करना चाहते हैं जिससे उन्हें सुख मिलेगा। अभी उन्हें श्रीकृष्णके सुखकी अनुभूति नहीं है, वे अपने ही सुखके लिये ही सब कुछ करते हैं। परन्तु इन सखियोंकी श्रीकृष्णसे मिलन करनेकी कोई कामना नहीं है, वे तो श्रीकृष्णके साथ श्रीराधाका मिलन करानेमें निज मिलनसे कोटि गुणा सुख पाती हैं—यही अकथ्य कथन है। इनका शरीर, मन और वाणी सदा श्रीकृष्णको सुखी करनेमें तत्पर है, इसलिये वे उनके सुखको भली प्रकार समझती और आस्वादन करती हैं। श्रीराधाकृष्ण-युगलके सुखका अनुभव करके इनमें भाव-विकार उदय हो जाते हैं। श्रीराधाका सुख इन लोगोंका स्वाभाविक सुख है। स्वर्ण कल्पलता श्रीराधाको ये सखियाँ श्रीकृष्ण लीला कथासे सींचती हैं। श्रीरूप मञ्जरी श्रीराधाका शृङ्गार कर रही हैं, गलेमें स्यमन्तक मणि पहना रही हैं और साथ ही कह रही हैं—'कौस्तुभ मणि इसका मित्र है। वह प्रतिक्षण स्यमन्तक मणिसे मिलनेके लिये लालायित रहता है। ये मिलते ही दोनों तरल हो जाते हैं। देखो, इसपर श्रीकृष्णकी प्रतिच्छवि पड़ती है और उनके कौस्तुभमें तुम्हारी छवि पड़ती है। फिर ये दोनों गर्वसे गर्वित होकर इतना वाद-विवाद करते हैं, जैसे तुम दोनों करते हो।' श्रीराधा श्रीकृष्ण-प्रसङ्ग सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होती हैं। सखियाँ शृङ्गार करते समय उसका पूर्वलीलासे सम्बन्ध स्मरण करवाकर श्रीराधाके कानोंमें अमृत-सिंचन करती हैं। श्रीराधाकी श्रीकृष्णसे मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा हो जाती है और अनेकों-अनेकों मधुर स्मृतियाँ छा जाती हैं। यही लताको सींचना है। इसके द्वारा पत्र-पुष्प-मञ्जरी सभी आनन्दित हो जाते हैं और पुष्ट होते हैं। इसीसे लता भी पुष्ट होती है। इसलिये सखियोंके बिना लीला नहीं हो सकती, रास नहीं हो सकता। वे ही रसकी पुष्टि करती हैं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 200-213 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/285) गौतमीय तन्त्र वाक्य :- प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। इत्युद्धवादयोऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ॥ 215 ॥ निजेन्द्रिय-सुखहेतु कामेर तात्पर्य। कृष्णसुख-तात्पर्य गोपीभाव-वर्य ॥ 216 ॥ निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छा नाहि गोपीकार। कृष्णे सुख दिते करे सङ्गम-विहार ॥ 217 ॥ अनुवाद-गोपियोंके शुद्धप्रेमको ही 'काम' नामसे अभिहित करनेकी प्रथा हुई है। भगवद्भक्त उद्धवादि भी इस प्रेमके पिपासु हैं। अपनी इन्द्रियको सुखी करना ही कामका तात्पर्य है। गोपियोंका जो श्रेष्ठ भाव अर्थात् प्रेम है, उसका तात्पर्य केवलमात्र श्रीकृष्णका सुख है। गोपियोंमें अपनी इन्द्रियोंको सुखी करनेकी कोई वाञ्छा कभी नहीं होती है। उनका श्रीकृष्णके साथ सङ्गम और विहार भी श्रीकृष्णको सुख प्रदान करनेके लिये ही होता है॥ 215-217 ॥ । 313