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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1156

[ 8/190–204 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

वह सब प्रेम कहानी भूल गये हैं?' 'न खोंजलुँ दूती, न खोंजलुँ आन' अर्थात् हे सखी! तुम उनसे कहना कि हमारे मिलनके समय दूती केवल हमारी दृष्टि थी, कन्दर्पके पाँच बाणोंने ही हमारी मध्यस्थता की थी, किन्तु अब मैं बड़ी विचित्र बात देख रही हूँ कि वे सब भूल गये हैं। उसीको याद दिलानेके लिये मैं तुम्हें भेज रही हूँ। 'अब् सोहि विराग', यहाँ श्रीराधामें अधिरूढ़ महाभाव उदित हुआ है। पहले मिलनमें कन्दर्प मध्यस्थ था, अब विरहमें अधिरूढ़ भाव दूती बन गया। श्रीराधा उसीको 'सखी' कहकर सम्बोधित कर रही हैं और कह रही हैं-'क्या सुपुरुषके प्रेमकी ऐसी ही गति होती है, जिससे प्रेम किया उसीको भूल जाना?' यह सब वार्तालाप वे स्वयंसे कर रही हैं। उनके कर-कमलोंमें कोई पत्र भी नहीं है, वे तो प्रेमकी चरमावस्थामें हैं-यही प्रेम-विलास विवर्त्त है। यह सब श्रवणकर महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दके मुखको अपने हस्तकमलसे ढक दिया और कहा—'साध्य वस्तु यही है और आगे मत कहो।' महाप्रभुको अपने कृष्ण-स्वरूपका स्मरण हो आया और श्रीरामानन्दके आगे कहनेसे उनका कृष्ण-स्वरूप प्रकट हो जायेगा, इसलिये महाप्रभु उन्हें आगे कहने नहीं दिया। यह अन्तरङ्ग कारण है और इसका बहिरङ्ग कारण यह है कि इस गूढ़ रहस्यको जगत्में प्रकाशित नहीं किया जा सकता। इसे सुनने और समझनेवाले इस जगत्में विरले ही हैं।"–श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 190–194॥

यहाँ तक साध्यकी सीमा :- प्रभु कहे, —“'साध्यवस्तुर अवधि' एइ हय। तोमार प्रसादे इहा जानिलुँ निश्चय ॥ 195 ॥

साधनके द्वारा ही साध्यकी प्राप्ति :- 'साध्यवस्तु' 'साधन'-बिना केह नाहि पाय। कृपा करि' कह, राय, पावार उपाय ॥" 196 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “यही साध्य वस्तुकी अन्तिम सीमा है। तुम्हारी कृपासे मैंने इस साध्य वस्तुके तारतम्यको समझा है। किन्तु ऐसी दुर्लभ साध्य वस्तुकी उपलब्धि, बिना साधनके नहीं हो सकती। इसलिये कृपा करके इस साध्य वस्तुकी प्राप्तिका उपाय भी बतलाइये॥" 195–196 ॥

महाप्रभुकी इच्छासे श्रीराय वशीभूत :- राय कहे, —“येइ कहाओ, सेइ कहि वाणी। कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥ 197 ॥

त्रिभुवन-मध्ये ऐछे हय कोन् धीर। ये तोमार माया-नाटे हइबेक स्थिर ॥ 198 ॥

श्रीरायके मुखसे महाप्रभु स्वयं ही वक्ता, स्वयं ही श्रोता :- मोर मुखे वक्ता तुमि, तुमि हओ श्रोता। अत्यन्त रहस्य, शुन, साधनेर कथा ॥ 199 ॥

साधनके रहस्यका वर्णन; केवल मधुर-रसमें 'कान्तभाव'की प्राप्ति :- राधाकृष्णेर लीला एइ अति गूढ़तर। दास्य-वात्सल्यादि-भावे ना हय गोचर ॥ 200 ॥

अनुगत सखियोंके द्वारा ही राधाकृष्णविलासकी पुष्टि :- सबे एक सखीगणेर इँहा अधिकार। सखी हैते हय एइ लीलार विस्तार ॥ 201 ॥

सखी बिना एइ लीला पुष्ट नाहि हय। सखी लीला विस्तारिया, सखी आस्वादय ॥ 202 ॥

सखी बिना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति। सखीभावे ये ताँरे करे अनुगति ॥ 203 ॥

राधाकृष्ण-कुञ्जसेवा साध्य सेइ पाय। सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय ॥ 204 ॥

अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने विनम्र भावसे कहा, – “जो आप मेरी वाणीसे कहलवा रहे हैं, मैं वही कहता जा रहा हूँ। इसमें क्या अच्छा है और क्या बुरा-इस विषयमें मैं कुछ नहीं जानता। इन तीन लोकोंमें कौन ऐसा धैर्यवान् पुरुष है, जो आपकी इस मायाके

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