भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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नाटकको देखकर स्थिर रह सके? मेरे मुखसे आप ही वक्ता हैं और आप ही श्रोता बने हुए हैं। आप इस अत्यन्त रहस्यमय साधनके विषयमें सुनिये। श्रीराधाकृष्णकी यह लीला अति रहस्यमयी है। दास्य, सख्य, वात्सल्यादि भावाश्रित परिकरोंके द्वारा भी यह नहीं समझी जा सकती। एकमात्र श्रीराधाजीकी सखियोंका ही इस लीलामें अधिकार है और सखियोंसे ही लीलाका विस्तार होता है। सखियोंके बिना लीलाकी पुष्टि नहीं होती। सखियाँ ही इस लीलाका विस्तार करती हैं और वे ही इसका आस्वादन करती हैं। सखीके अतिरिक्त अन्य किसीका इस लीलामें प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है। जो सखीभावसे सखीका आनुगत्य करता है, वही श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जसेवारूप साध्य-वस्तुकी प्राप्ति कर सकता है—इसके अतिरिक्त इस साध्यकी प्राप्तिका और कोई उपाय नहीं है ॥ 197–204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने इतना श्रवण करके कहा,—साध्यवस्तुके विषयमें सब कुछ कहना हो गया, अब इस चरमसाध्य-वस्तुको प्राप्त करनेका जो साधन अथवा उपाय है, उसे कहो। श्रीराय रामानन्दने उसके उत्तरमें कहा,—दास्य-वात्सल्यादि रसोंमें यह गूढ़तत्त्व प्राप्त नहीं होता, व्रजसखीके बिना इस लीलामें दूसरोंका प्रवेश असम्भव है; व्रजसखीका भाव ग्रहण करके सखीके आनुगत्यमें साधन कर पानेसे श्रीराधाकृष्ण- कुञ्जसेवारूप साध्यवस्तु प्राप्त होती है, इसको पानेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ 202–204 ॥ अनुभाष्य—'सखी',—उज्ज्वलनीलमणिमें जैसे— “प्रेमलीलाविहारिणां सम्यग्विस्तारिका सखी। विश्रम्भरत्नपेटी च॥” श्रीकृष्णकी प्रेमलीला और विहारादिका सम्पूर्णरूपसे विस्तार करनेवालीको 'सखी' कहते हैं। सखियाँ—श्रीकृष्णकी विश्वासरूपी रत्नोंकी पेटीस्वरूपा हैं। सखियोंकी वृत्ति— “मिथः प्रेमगुणोत्कीर्त्तिस्तयोरासक्तिकारिता। अभिसारो द्वयोरेव सख्याः कृष्णे समर्पणम्। नर्माश्वासन-नेपथ्यं हृदयोद्घाटनपाटवम्। छिद्रसंवृत्तिरेतस्याः पत्यादेः परिवञ्चना। शिक्षा सङ्गमनं काले सेवनं व्यजनादिभिः। तयोर्द्वयोरापालम्भः सन्देशप्रेषणं तथा। नायिकाप्राणसंरक्षा प्रयत्नाद्याः सखीक्रियाः॥” (1) नायक और नायिकाके परस्परके प्रेम-गुणोंका कीर्त्तन, (2) एककी दूसरेके प्रति आसक्तिको वर्धित करना, (3) दोनोंको अभिसार कराना, (4) कृष्णके प्रति सखीको समर्पित करना, (5) परिहास, (6) आश्वासन-प्रदान, (7) नेपथ्य अर्थात् नायक-नायिकाकी वेशरचना या उनका शृङ्गार, (8) हृदयके भावोंको प्रकाशित करनेकी निपुणता, (9) नायिकाके दोषोंको छिपाना, (10) पति आदिकी वञ्चना, (11) शिक्षा, (12) उचित कालमें नायक-नायिकाका मिलन कराना, (13) चामर आदि डुलाना, (14) आवश्यक होनेपर दोनोंके प्रति तिरस्कार, (15) संवाद भेजना, (16) नायिकाके प्राणोंकी रक्षाके लिये यत्न करना। आदिलीला 4/211, 217-218 संख्या देखें। 'सखीभेकी' और 'गौरनागरी' आदि प्राकृत सहजिया सम्प्रदायके लोग देहात्म-बुद्धि होनेके कारण इस जड़ शरीर, जो मरनेके बाद कुत्ते-सियारका भोजन बन जायेगा, उसकी और चमड़ीकी शोभा बढ़ाकर श्रीकृष्णको आनन्द देना चाहते हैं, परन्तु श्रीकृष्णसे इतर ये सब कृत्रिम चेष्टाएँ जड़ेन्द्रियोंकी ही तृप्ति करनेवाली हैं, इसलिये श्रीकृष्ण उनका उपभोग करके आनन्द प्राप्त नहीं करते। चिन्मयी श्रीराधा और उनकी सखियोंकी देह, गेह, वेश-भूषणादि तथा सभी क्रियाएँ अथवा चेष्टाएँ चिन्मय हैं, वे कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकर और श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाली हैं। वे देवीधामके अन्तर्गत चौदह भुवनोंकी कोई क्रिया अथवा वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण भुवनमोहन होनेपर भी वे (गोपियाँ) भुवनमोहिनी नहीं, भुवनमोहन-मनोमोहनी हैं। भोगपरायण मनोधर्मके वशीभूत होकर अपनी । 309

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