श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/202–205 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काल्पनिक सिद्धदेहमें अपनेको 'सखी' मानकर अभिमान करना भी अहंग्रहोपासना ही हो जाता है; फलस्वरूप, कल्पनाकारीका देवीधाममें (इस संसारमें) ही वास होता है (भगवद्धामकी प्राप्ति नहीं होती)। श्रील जीवगोस्वामी प्रभुने प्राकृत-जीवोंको इस विषयमें सतर्क भी किया है—जैसे, भः रः सिः पूर्व विभाग द्वितीय लहरी— “लुब्धैर्वात्सलसख्यादौ”—श्लोककी 'दुर्गमसङ्गमनी' टीका— 'न तु व्रजेन्द्रादित्वाभिमानेनापीत्यर्थः। पितृत्वाद्यभिमानो हि द्विधा सम्भवति—स्वतन्त्रत्वेन, तत्पित्रादिभिरभेदभावनया च। तत्रान्त्यमनुचितं भगवदभेदोपासनावत्तेषु भगवद्वदेव नित्यत्वेन प्रतिपादयिष्यमाणेषु तदनौचित्यात्; तथा तत्परिकरेषु तदुचितभावना-विशेषेणापराधापातात्॥' श्रील जीवगोस्वामीने 'दुर्गम-सङ्गमनी'-टीकामें कहा है,—'वात्सल्य-सख्यादिभावोंसे लुब्ध साधकगण किन्तु व्रजराज श्रीनन्दादि-अभिमानके द्वारा भक्ति साधन नहीं करेंगे, यह अर्थ है। पिता होनेका अभिमान दो प्रकारका होता है—स्वतन्त्ररूपसे और श्रीकृष्णके पिता श्रीनन्दादिके साथ अभेद-भावनारूपसे। इनमेंसे बादमें कहा गया अभिमान अनुचित है, क्योंकि भगवान्के साथ अभेद होनेके लिये उपासनाके जैसे ही भगवान्के सदृश ही नित्यत्वरूपसे (श्रीनन्दादि नित्यसिद्धरूपसे) प्रतिपादन करेंगे, इस प्रकारका अभिमान अनुचित है। परन्तु [स्वतन्त्ररूपसे] भगवान्के पिता-सखादिरूप परिकर-अभिमानसे उसके उपयोगी विशेष भावनाके द्वारा अपराध नहीं होता।' इसलिये ही (भःरःसिः, पूःविः, 2लः)में श्रील रूप गोस्वामी प्रभुने कहा है,— “कृष्णं स्मरन् जनञ्चास्य प्रेष्ठं निज-समीहितम्। तत्तत्कथारतश्चासौ कुर्याद्वासं व्रजे सदा। सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः॥” इस श्लोककी दुर्गमसङ्गमनी टीका— “व्रजलोकास्त्वत्र कृष्णप्रेष्ठजनास्तदनुगताश्च तदनुसारतः॥” श्लोकार्थ,—'श्रीकृष्णको और निज-अभीष्ट श्रीकृष्णप्रेष्ठ-जनको स्मरण करते-करते उन-उन कथामें रत होकर सर्वदा व्रजमें वास करेंगे। इस भावके लोभीगण साधकरूपमें और अन्तश्चिन्तित सिद्ध-स्वरूपसे व्रजवासियोंके अनुगामी होकर सेवा करेंगे।' दुर्गमसङ्गमनी टीकाार्थ,—'यहाँपर 'व्रजवासियों' अर्थात् श्रीकृष्णप्रेष्ठजन और उनके अनुगतगण,—उनके अनुसरणके द्वारा, यह अर्थ है।' मध्यलीला 22/155 और 157 संख्या देखें॥ 202–204॥ सखियोंके द्वारा शृङ्गार-रसकी पुष्टि :— श्रीगोविन्द-लीलामृत (10/17)— विभुरपि सुखरूपः स्वप्रकाशोऽपि भावः क्षणमपि न हि राधाकृष्णयोर्या ऋते स्वाः। प्रवहति रसपुष्टिं चिद्विभूतीरिवेशः श्रयति न पदमासां कः सखीनां रसज्ञः॥ 205॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 205॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राधा-कृष्णका भाव स्वप्रकाश होनेपर भी और सुख विभु अर्थात् अनन्त होनेपर भी सखियोंके बिना एक क्षणके लिये भी रसपुष्टि लाभ नहीं कर सकता, जिस प्रकार ईश्वरकी चिद्-विभूतिके बिना ईश्वरत्व पुष्टि प्राप्त नहीं करता, उसी प्रकार। इसलिये उसमें प्रविष्ट कौन रसज्ञ सखियोंका पदाश्रय नहीं करेगा?॥ 205॥ अनुभाष्य— राधाकृष्णयोः (व्रजनवयुवद्वन्द्वयोः) भावः (चिद्विलासः) विभुः (परममहान्) अपि, सुखरूपः (सच्चिदानन्दमयः) स्वप्रकाशः (स्वयंप्रकाशरूपः) अपि स्वाः (निजसम्बन्धिन्यः कायव्यूह- स्वरूपिण्यः याः सखीः) ऋते (बिना) रसपुष्टिं न हि प्रवहति; यथा ईशः (ईश्वरः) चिद्विभूतीः इव, [सच्चिदानन्दः ईश्वरः यथा निजनित्यचिदैश्वर्यादिकं बिना पुष्टिं न प्राप्नोति, तथेत्यर्थः अतः कारणात्] कः रसज्ञः (कृष्णतत्त्ववित् कृति) आसां सखीनां पदं न श्रयति? (आश्रयति? सर्वे सनिपुणाः मधुररसज्ञाः भक्ताः सखीपदं आश्रयन्तीत्यर्थः)। 310 ।