श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1159, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/205-210 ] [बायाँ स्तम्भ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (यथा केवलाद्वैतवादिनां कल्पनाङ्गितविग्रहः अज्ञान- समष्ट्यधिष्ठातृदेव ईश्वरः अज्ञान-व्यष्ट्यधिष्ठातृ-मलिनसत्त्व- विकाराख्य-जीवादि-विभूतिमयोऽपि षण्ढवत् नित्यसत्यविलास-रहितः, विशिष्टाद्वैतवादिनामाराध्यो नित्यसच्चिदानन्दविग्रह ईश्वरो नित्यचिदानन्दमयः स्वगत-सजातीय-विजातीय-नित्यविशेष- विभूतिभिः शान्त-दास्य-सख्य-सार्द्धद्वय-रसपुष्टिं करोति, तथा परिपूर्णौ सुखरूपौ श्रीवार्षभानवी-व्रजेन्द्रनन्दनौ स्वयं-प्रकाशरूपौ सन्तावपि सखीभिः नित्यरसपुष्टिं कुरुत इति भावः।) केवलाद्वैतवादियोंके कल्पना-निर्मित-विग्रह 'अज्ञान-समष्टि'के अधिष्ठातारूप ईश्वर हैं—'अज्ञान- व्यष्टि'के अधिष्ठाता और मलिन-सत्त्वके विकाररूप जीव आदि विभूतियुक्त होनेपर भी वे क्लीववत् नित्य-सत्य-विलाससहित हैं। विशिष्टाद्वैतवादिगणोंके आराध्य नित्य सच्चिदानन्दविग्रह ईश्वर—नित्य चिदानन्दमय और स्वगत-सजातीय-विजातीय नित्य-सविशेष समस्त विभूतियोंके साथ शान्त, दास्य और आधे सख्यकी (अड़ाई) रस पुष्टि करते हैं। परिपूर्ण-सुखस्वरूप श्रीवृषभानुनन्दिनी और श्रीव्रजेन्द्रनन्दन स्वयं प्रकाशित रूप होनेपर भी (अर्थात् अन्य-अपेक्षारहित होनेपर भी) सखियोंके साथ नित्यरसकी पुष्टि करते रहते हैं,—यही अर्थ है॥205॥ सखियोंका श्रीराधाप्रेम :— सखीर स्वभाव एक अकथ्य-कथन। कृष्ण-सह निजलीलाय नाहि सखीर मन॥ 206 ॥ कृष्णसह राधिकार लीला ये कराय। निज-सुख हैते ताते कोटि सुख पाय॥ 207 ॥ अनुवाद—सखियोंका स्वभाव अपूर्व और अवर्णनीय है। वे स्वयं कभी भी श्रीकृष्णके सङ्गरूपी सुखको प्राप्त करनेकी अभिलाषा नहीं करतीं। श्रीकृष्णके साथ श्रीराधिकाकी लीलाएँ करानेमें उनको जिस सुखकी अनुभूति होती है, उस सुखको वे स्वयं श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ाविलास करनेसे भी कोटि गुणा अधिक मानती हैं॥ 206-207 ॥ [दायाँ स्तम्भ] राधा और सखियोंका परस्परका प्रेम-सम्बन्ध :— राधार स्वरूप—कृष्णप्रेम-कल्पलता। सखीगण हय तार पल्लव-पुष्प-पाता॥ 208 ॥ कृष्णलीलामृत यदि लताके सिञ्चय। निज-सुख हैते पलवाद्येर कोटि-सुख हय॥ 209 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 208-209 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी प्रेम-कल्पलतास्वरूपा हैं और सखियाँ उस लताके पल्लव, पुष्प एवं पत्र हैं। लतारूप श्रीराधिकाका पदाश्रय लेकर लताका जलसे सिञ्चन करनेपर पल्लवादि अत्यन्त प्रफुल्लित हो जाते हैं। पल्लवादिमें जल देनेसे जैसे पल्लवादि प्रफुल्लित नहीं होते, उसी प्रकार गोपियोंको श्रीकृष्ण-मिलन सुखसे भी श्रीराधाकृष्ण-मिलनके द्वारा ही अधिक सुख होता है॥ 208-209 ॥ श्रीगोविन्द-लीलामृत (10/16) :— सख्यः श्रीराधिकाया व्रजकुमुदविधोर्ह्लादिनी-नामशक्तेः सारांश-प्रेमवल्याः किशलयदलपुष्पादितुल्याः स्वतुल्याः। सिक्तायाः कृष्णलीलामृतरसनिचयैरूल्लसन्त्याममुष्यां जातोल्लासां स्वसेकाच्छतगुणमधिकं सन्ति यत्तन्न चित्रम्॥ 210 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 210 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजकी सखियाँ श्रीराधाके तुल्य और व्रजकुमुदचन्द्रकी ह्लादिनी नामक शक्तिस्वरूपा श्रीराधिकाकी सारांश-प्रेमलताके कोंपल, पत्र, पुष्पादि स्वरूप हैं। श्रीकृष्णलीलामृतरस-समूहके द्वारा परमोल्लासमयी श्रीराधिकाके सिञ्चित होनेपर ही सखियाँ अपने सिञ्चनसे सौ गुणा अधिक उल्लसित होती हैं—यह कोई विचित्र बात नहीं है॥ 210 ॥ अनुभाष्य— व्रजकुमुदविधोः (व्रजवासिकुमुदानन्दकृष्णचन्द्रस्य) ह्लादिनीनामशक्तेः (ह्लादिन्याख्यशक्तेः) श्रीराधिकायाः सारांश-प्रेमवल्याः (सारांशः यः प्रेमा सः एव वल्ली लता तस्याः) किशलय-दल-पुष्पादितुल्याः । 311