भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1155

आठवाँ अध्याय 8/190-194 ] गोपियोंके प्रेम-वर्धन हेतु छिप जाते हैं। यह श्रीकृष्णका प्रेमविलास-विवर्त्तमें यह ऐक्य भावगत है, वस्तुगत नहीं परिहास-कौशल और विदग्धता है। 'नवतारुण्य'— है, अर्थात् देह-मन-प्राणका पृथक् अस्तित्व बना रहता नवयौवनावस्था विलासके योग्य है। श्रीकृष्ण रात-दिन है, भाव तथा मननमें ऐक्य होता है। जिस प्रकार श्रीराधाके साथ हास-परिहास और कुञ्जोंमें विभिन्न लाखके दो टुकड़े अग्निके प्रभावसे पिघलकर एक हो प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं। वे निश्चिन्त हैं, क्योंकि जाते हैं, उसी प्रकार श्रीराधाकृष्णका मन प्रेमके प्रभावसे अत्यन्त प्रेमवशतः माता-पिताने उन्हें किसी कार्यका पिघलकर एक हो जाता है। मनका भेद मिट जानेपर दायित्व नहीं दिया। इस प्रकार वे अपनी किशोरावस्थाको दोनोंको अपने पृथक् अस्तित्वका ज्ञान नहीं रहता, सफल कर रहे हैं। धीर-ललित नायक अपनी प्रेयसीके किन्तु पृथक् अस्तित्व बना रहता है; विलास-सुख अधीन रहता है, यह उसका एक विशेष गुण है। ऐक्यताकी अनुभूति रहती है और विलास-सम्बन्धी प्रेमविलास-विवर्त्त—विवर्त्तका अर्थ है विशेष रूपसे चेष्टा भी रहती है। यही प्रेमविलासकी चरमोत्कर्ष आवर्त्त। जब प्रेम अपनी चरम अवस्थापर उपस्थित हो अवस्था है। जाता है, तब उसे प्रेम-विवर्त्त कहते हैं। अनुरागका प्रेमविलास-विवर्त्तके दो बाह्य लक्षण हैं—भ्रम और आश्रय या नींव है राग; रागकी नींव है प्रणय, जिसमें विपरीतता। तन्मयताके कारण भ्रम या आत्म-विस्मृति नायक और नायिकामें विश्रम्भभाव उदित होता है हो जाती है। इस अवस्थामें परस्परका सुख वर्धन अर्थात् दोनोंमें अपने देह-प्राणादिको एक माननेकी करनेकी चरम उत्कण्ठाके कारण उनकी चेष्टाओंमें प्रवृत्ति जन्मती है। प्रणयका विकास जब अनुरागमें होता विपरीतता आ जाती है, अर्थात् कान्ताका भाव और है, तब यह अपनी चरम सीमामें पहुँचकर 'यावदाश्रय आचरण कान्तमें और कान्तका भाव और आचरण वृत्ति' लाभ करता है। प्रेमसे लेकर महाभाव तक कान्तामें सञ्चरित होता है। किन्तु यह विपरीतता जितनी प्रकारकी आश्रय-वृत्तियाँ हैं, उनमें जब सभी अबुद्धिपूर्वक ही होती है। सात्त्विक भावादि पूर्णरूपसे सुद्दीप्त अवस्थाको प्राप्त होते श्रीराधा कह रही हैं—'पहिलहि राग नयनभङ्गे भेल' हैं, तब उस परिपक्व अवस्थाको 'यावदाश्रय वृत्ति' अर्थात् पलक गिरनेमें जितना समय लगता है, उतनी कहते हैं। इसमें आश्रय और विषय अपने प्रेमकी चरम देरमें कृष्णसे मेरा प्रथम राग हो गया। यही पूर्वराग पराकाष्ठा तक पहुँचते हैं, प्रेमका आगे बढ़नेका कोई प्रेमकी प्रथम स्थिति है। स्थान नहीं रहनेपर भी वह बढ़ता रहता है। महाभावकी विदग्धमाधवमें यह प्रसङ्ग वर्णित है—श्रीराधाने पहले दूसरी विशेषता है—उसकी स्वसंवेद्य दशा। इस अवस्थामें तो श्रीकृष्णका नाम सुना, फिर वंशी ध्वनि सुनी और मिलनमें प्रेम एक ऐसी स्थितिमें पहुँचता है जिसमें तत्पश्चात् उनका चित्रपट देखा। वे तीनोंपर ही मोहित केवल मिलनके आनन्दकी ही अनुभूति रह जाती है, हो गईं। किन्तु फिर सोचने लगीं कि 'तीन पुरुषोंमें मेरी आस्वादक और आस्वाद्यका ज्ञान लुप्त हो जाता है। रति कैसे हुई! अब मैं प्राण त्याग दूँगी।' तब ललिताने 'न सो रमण, न हाम रमणी'—अनुरागकी ऐसी अवस्थाको उन्हें समझाया कि ये तीन पुरुष नहीं हैं। जिनका नाम इङ्गित करता है जिसमें केवल रसका ही अनुभव होता कृष्ण है, उन्हींकी वंशी-ध्वनि तुमने सुनी और यह है। इस मादनाख्य भावमें अनुरागकी जो चरम पराकाष्ठा चित्र भी उन्हींका ही है। ये तीनों व्यक्ति एक (कृष्ण) है, उसमें विषय और आश्रय—दोनोंके प्राण, देह, मन ही हैं। आदिका भी ऐक्य हो जाता है, जिसका इङ्गित 'ये सब प्रेमकाहिनी कानुठामे कहबि बिछुरल 'दुहुँ-मन मनोभव पेषल जानि' में किया गया है। जानि' अर्थात् अब हम बिछुड़ गये हैं, तो क्या कृष्ण । 307