भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1154, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1154

[ 8/190-194 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हम दोनों ही उसके कारण नहीं हैं अथवा हमारी पार्थक्य-बुद्धि नहीं है अर्थात् हम दो हैं—ऐसी बुद्धि नहीं है। 'मनोभव'—अर्थात् कन्दर्पने इसे जानकर, रमण और रमणी, दोनोंके मनको पीसकर एक कर दिया। प्रेम-काहिनी'—प्रेमविलाससमूह। 'कानुठामे'—कृष्णके स्थानमें या निकटमें। 'कहबि'—बोलना। 'विछुरल'—भूल गये हैं। 'जानि'—जानकर। 'खौजलुँ'—ढूँढ़ा था। 'दूती'—जो मध्यस्थ होकर नायक और नायिकाका मिलन कराती है; दूती दो प्रकारकी हैं—'स्वयं-दूती' और 'आप्तदूती'। 'स्वयं-दूती'—कटाक्ष और वंशीध्वनि है; 'आप्तदूती'—वीरा, वृन्दा आदि हैं। 'साधारण-दूती'—शिल्पकारिणी, दैवज्ञा, लिङ्गिनी आदि। 'ना खौजलुँ आन्'—और किसीको भी अनुरोध अथवा अन्वेषण नहीं किया। 'दुहुँके'—श्रीराधा और कृष्ण, इन दोनोंके। 'मिलने'—दोनोंके मिलनसे; 'मध्ये पाँचबाण'—रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शसे प्रकटित पाँच बाण। 'अबु'—इस समय। 'सोहि'—वही राग, 'विराग'—विप्रलम्भमें अधिरूढ़-महाभाव। 'तुहुँ'—तुम। 'भेलि'—होनेपर। 'सु-पुरुख'—उत्तम-नायकके। 'प्रेमक'—प्रेमके। 'ऐछन'—इस प्रकार॥ 193॥ परस्परके भेद-भ्रम-दूरीभूत अवस्था :— उज्ज्वलनीलमणि (14/155)— राधाया भवतश्च चित्तजतुनी स्वेदैर्विलाप्य क्रमाद्- युञ्जन्नद्रि-निकुञ्ज-कुञ्जरपते निर्धूत-भेदभ्रमम्। चित्राय स्वयमन्वरञ्जयदिह ब्रह्माण्डहर्म्योदरे भूयोभिर्नव-राग-हिङ्गुलभरैः शृङ्गार-कारुकृती॥ 194॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 194॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोवर्धनपर्वत-निकुञ्जवासि- गजराज, शृङ्गारशिल्प-शास्त्रमें निपुण विधाताने राधिका और तुम्हारे चित्तरूपी लाक्षाको सात्त्विक-विकाररूपी धर्मके द्वारा द्रवीभूत करके [धीरे-धीरे दोनोंको एकत्रकर] भेदभ्रमको दूर करके ब्रह्माण्डरूप देवगृहमें नवराग-कुङ्कुमके द्वारा स्वयं जगत्के आश्चर्यको सम्वर्धित करनेके उद्देश्यसे दोनोंके उन दो चित्तोंको अतिशय रञ्जित किया है॥ 194॥ अनुभाष्य— हे अद्रिनिकुञ्जकुञ्जरपते, (गिरि-गोवर्धन-निकुञ्जारण्य-गजपते, गोवर्धनकुञ्जविहारिन्), शृङ्गार-कारुकृति (शृङ्गार-कारुकर्मणि सुनिपुणः) राधायाः भवतश्च चित्तजतुनी (चित्ते एव जतुनी लाक्षे) स्वेदैः (अन्तर्बहिर्द्रवरूपैः विकारैः अग्नितापैर्वा) क्रमात् (शनैः शनैः) विलाप्य (द्रवीकृत्य) निर्धूतभेदभ्रमं (भेद एव भ्रमः, तं निर्धूतं दूरीभूतं) युञ्जन् (कुर्वन्) इह ब्रह्माण्ड- हर्म्योदरे (ब्रह्माण्डमेव हर्म्यं तस्योदरे) चित्राय (चित्रार्थं, विस्मयवर्द्धनार्थं) भूयोभिः (नानाविधैः) नवराग-हिङ्गुलभरैः (नवानुरागरूप-हिङ्गुल-रञ्जनैः) स्वयम् अन्वरञ्जयत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 194॥ अमृतानुकणिका—"महाप्रभु श्रीराय रामानन्दसे श्रीराधाकृष्णके विलासकी महिमाको श्रवण करना चाहते हैं। श्रीरायने कहा कि श्रीकृष्ण 'धीर-ललित' नायक हैं और उसी रूपमें विलास करते हैं। धीर-ललित नायक नवयौवनयुक्त, विदग्ध अर्थात् चतुर, परिहास-पटु अर्थात् परिहास करनेमें अत्यन्त कुशल, निश्चिन्त और अपनी प्रेयसीके वशीभूत होता है। 'परिहास-विशारद'— श्रीकृष्णने शरद पूर्णिमाकी रात्रिमें वंशी बजाकर गोपियोंको बुलाया और जब वे सब कुछ त्यागकर वहाँ आयीं, तो श्रीकृष्ण कहने लगे—'आपका स्वागत है। मैं आपका कौनसा प्रिय कार्य करूँ? आप कैसे पधारीं? ओह! लगता है, आप सब पूर्णिमामें वनकी शोभा और यमुनाका सौन्दर्य देखने आयी हैं? अब आपने यह सब देख लिया है, इसलिये वापिस लौट जाओ, क्योंकि रात्रिके समय स्त्रियोंका वनमें आना उचित नहीं है। वनमें हिंसक प्राणी हैं और यह घोर रात्रि है। आप अपने-अपने घरोंको लौट जाओ। घरमें जाकर पति-सास- ससुर-बच्चोंकी सेवा करो, अन्यथा जघन्य अपराध, पाप होगा और समाजमें निन्दा भी होगी।' पहले तो गोपियाँ कृष्णके आन्तरिक मन्तव्यको समझनेके लिये चुप रहीं, अन्तमें गोपियोंने उनके इस परिहासका उत्तर दिया और रास आरम्भ हुआ। रासके मध्य भी श्रीकृष्ण 306

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