भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1153

आठवाँ अध्याय 8/193 ] श्रीराय रामानन्दका स्वकृत गान :- गीत “पहिलेहि राग नयनभङ्गे भेल। अनुदिन बाढ़ल, अवधि ना गेल॥ ना सो रमण, ना हाम रमणी। दुँहु-मन मनोभव पेषल जानि'॥ ए सखि, से-सब प्रेमकहिनि। कानुठामे कहबि बिछुरल जानि'॥ ना खोंजलुँ दूती, ना खोंजलुँ आन। दुँहुको मिलने मध्ये पाँचबाण॥ अब् सोहि विराग, तुँहु भेलि दूति। सु-पुरुष-प्रेमक ऐछन रीति॥”193॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥193॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“आहा, मिलनके पूर्वरागके समय परस्परके नयन-ईक्षणसे 'राग' नामक एक भावका उदय होता है; वही राग बढ़ते-बढ़ते 'अवधि' अथवा चरम सीमाको प्राप्त नहीं हुआ; वह राग-हम दोनोंके स्वभावसे ही उत्पन्न हुआ है। रमणस्वरूप कृष्ण ही उसके कारण हैं, ऐसा नहीं है, अथवा रमणीस्वरूपा मैं ही उसका कारण हूँ, वैसा भी नहीं है। परस्पर दर्शनसे जो 'राग' उदित हुआ, वही मनोभव अर्थात् मदन हुआ और उसने हमारे मनको पीसकर एक कर दिया था। अब विरहके समय, वे सब प्रेमकी बातें, हे सखी! कृष्ण यदि भूल भी गये हों, तुम तो यह समझ सकती हो, इसलिये उनको कहना, - मिलनके समय हमने किसी दूतीको नहीं ढूँढ़ा था, अथवा और किसीसे भी कोई अनुरोध नहीं किया था, अनङ्गरूपी पाँच बाण ही हमारे मिलनके मध्यस्थ थे। और, अब विरहके समय वही राग 'विराग' होकर अर्थात् विशिष्टराग अथवा विच्छेदगत-राग अथवा अधिरूढ़भावरूपमें, हे सखि, तुम दूतीके रूपमें कार्य कर रही हो! सुन्दर-पुरुषके प्रेममें यही रीति सर्वत्र देखोगी।' तात्पर्य यह है कि, - सम्भोगके समय 'राग' जैसे अनङ्गरूपमें मध्यस्थ होता है, विप्रलम्भके समय वह (राग) उसी प्रकार प्रेमविलास-विवर्त्तमें अधिरूढ़-भावयुक्त दूती होता है अर्थात् विप्रलम्भमें सम्भोग-स्फूर्ति कार्यमें दूतीस्वरूप बननेपर उसको श्रीमती 'सखी' कहकर सम्बोधन करते हुए यह बात कह रही हैं। मूल तात्पर्य यह है कि, - प्रेमविलास-सम्भोगमें भी जैसा आनन्द है, विप्रलम्भमें भी वैसा ही है; विशेषतः विप्रलम्भमें (सेवाकी पराकाष्ठासे कृष्णमें तन्मयभावके कारण) सर्पमें रस्सीके भ्रमके समान तमालवृक्षादिमें श्रीकृष्णभ्रमजनित विवर्त्त-भावयुक्त अधिरूढ़-महाभावरूपी एक प्रकारका सम्भोग उदित होता है॥193॥ अनुभाष्य- 'पहिलेहि'- सर्वप्रथम। 'राग'- पूर्वराग। “रतियाॅ सङ्गमात् पूर्वं दर्शनश्रवणादिजा। तयोरुन्मीलति प्राज्ञैः पूर्वरागः स उच्यते॥” (उःनीः 15/5) “नायक और नायिकाके मिलनसे पूर्व दर्शन, श्रवणादिसे उत्पन्न जिस रतिका आविर्भाव होता है, उसे पूर्वराग कहते हैं।” 'नयन-भङ्गे'-परस्पर दर्शन-विनिमयसे; नयन-भङ्गीसे अर्थात् अपाङ्गदर्शनसे परस्परके चित्तवृत्ति-संयोजक इशारेसे। 'अनुदिन बाढ़ल'- दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। 'अवधि ना गेल'-सीमा नहीं रही। 'प्रौढ़ा समर्था-रति'में लालसा, उद्वेग, जागर्य (निद्राका अभाव), तानव (शरीरकी कृशता, दुर्बलता), जड़ता, व्यग्रता, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु; अर्थात् चिन्ता, जागर, उद्वेग, अमर, मलिनाङ्गता, प्रलाप, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु-ये दस दशाएँ हैं। 'समञ्जसा-रति'में अभिलाष, चिन्ता, स्मृति, गुण-कीर्तन, उद्वेग, सविलाप उन्माद,-ये छह प्रकारकी दशाएँ हैं। 'साधारणी-रति'में सोलह प्रकारकी दशाएँ अर्थात् प्रौढ़ा समर्था-रति और समञ्जसा-रतिके सविलाप उन्माद तक। '(उज्ज्वलनीलमणि पृः 828 से 852 देखें)। 'सो'-वे रमण श्रीकृष्ण; 'हाम'-मैं राधिका रमणी; । 305