भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1152

[ 8/190-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

जड़-दार्शनिकोंके अनुभवकी वस्तु नहीं है। तो भी, पूर्वोक्त विचारका अवलम्बन करनेसे ही केवलाद्वैतवादके स्थानपर शुद्धाद्वैतवादियोंका मत स्थापित हो सकता है। शुद्धाद्वैतवादी कहते हैं, — द्वैतजगत्में जो निकृष्टता है, उसके विपरीत जिस काल्पनिक अद्वयज्ञानको निर्देश किया जाता है, उसमें प्रेम-विलासका अभाव है। जड़-विवर्त्तवादी “ना सो रमण, ना हाम रमणी” इस पद्यकी व्याख्या विपरीत रूपसे करनेपर विषय-आश्रय-राहित्यरूपी कैवलाद्वैत-सिद्धिको 'अद्वयज्ञान' कहते हैं। ऐसी व्याख्या उन्हें पुनः जड़ीय-विवर्त्तमें ही धकेल देती है। इस विषयमें शुद्धाद्वैतवादी कहते हैं, — “ना सो रमण, ना हाम रमणी”—इस वाक्यमें वास्तव सत्यको ध्वंस नहीं किया गया है, किन्तु वस्तुमें वस्तु-शक्तिके परिचयसे जो अशुद्धाद्वैत-आशङ्का प्रवर्त्तित हुई है, उसका खण्डन ही उद्दिष्ट हुआ है। विशिष्टाद्वैतवादियोंकी भाषामें यह बात इस प्रकार है, — वस्तुका परिचय दुर्ज्ञेय है, किन्तु शक्ति और शक्तिमान्‌को अभिन्न माननेसे शक्तिके परिचयसे ही वस्तुकी जानकारी प्राप्त होती है। जो वस्तुकी शक्तिको वस्तुसे अलग करके, 'रमण' और 'रमणी', — दो वस्तुओंकी कल्पना करते हैं, उनके विचारसे श्रीरामानन्दकी यह उक्ति केवल जड़ीय-शक्तिमान् और जड़ीय-शक्तिके भेदका खण्डन करनेवाली है।

जड़भोक्ता रमणके साथ जड़भोग्या रमणीका भेद है, ऐसा समझकर प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायके लोग अशुद्ध द्वैत विचारका आदर करते हैं। उससे बचनेके लिये चिन्त्यद्वैताद्वैत विचार प्रवर्तित हुआ है। इस विचारसे श्रीरामानन्दका अथवा श्रीगौरसुन्दरका अचिन्त्यभेदाभेद-विचार थोड़ा पृथक् है। शुद्धाद्वैत-विचार और अचिन्त्यभेदाभेद-विचारको इस स्थानपर एक ही तात्पर्यमय समझना चाहिये। शुद्धाद्वैतवादियोंके विचार, शुद्धद्वैतवादियोंके विचार, चिन्त्य-द्वैताद्वैतवादियोंके विचार, विशिष्टाद्वैतवादियोंके विचारसे अचिन्त्यभेदाभेद-विचार पृथक् है, इसीको अचिन्त्यभेदाभेद-आचार्य स्वयं अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दन (श्रीचैतन्यदेव)ने अप्राकृत-साहजिक श्रीरामानन्द रायके श्रीमुखसे इस बातका प्रचार किया है। इन श्रीरामानन्दके विषयमें ही श्रीगौरसुन्दरने कहा है, — “सम्पूर्ण दक्षिण देश (भारत)में तुम्हारे समान अप्राकृत-सहज-धर्मावलम्बी मैंने नहीं देखा है; मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो। इसलिये तुम और मैं एक समान हैं॥” यह बात कहकर श्रीगौरसुन्दरने अचिन्त्यभेदाभेद विचारका प्रदर्शन किया है, इसलिये श्रीजीवपादने अपनी 'सर्वसम्वादिनी'में गौड़ीयके वेदान्त दर्शनको ही 'अचिन्त्यभेदाभेद' कहकर स्वीकार किया है। अचिन्त्यभेदाभेद-विचारके विषयमें प्राकृत-साहजिक सम्प्रदाय जिस 'तेल लगायी हुई देहसे गंगा-स्नान'की कहानीका उदाहरण देते हैं, वह जड़जगत्का विवर्त्तमात्र है। इस उदाहरणके द्वारा भेदाभेदप्रकाश-तत्त्व नहीं जाना जा सकता।

शक्ति-शक्तिमान्-तत्त्वके अभेदके प्रतिपादनमें विषयका आश्रयके लिये उद्दीपन और आश्रयका विषयके लिये उद्दीपन-भाव सुन्दर रूपसे समझानेके लिये ही श्रीरामानन्दके गीतमें रमण-रमणीका परस्परके स्वरूप-ज्ञानका यथायथ भाव है। अहंग्रहोपासना-चिन्मात्रवादियोंकी मूढ़ता एवं चिद्-विलासका वैपरीत्य मात्र है। 'अद्वयज्ञानवस्तुमें आश्रयजातीय भावका अभाव है', जो ऐसा विचार रखते हैं, उनके लिये ही गोलोकमें स्थित औदार्यमय-प्रकोष्ठमें श्रीकृष्णकी नित्य गौरलीला प्रपञ्चमें अवतीर्ण (प्रकट) हुई है। प्रपञ्चमें अवतीर्ण गौरलीला कभी भी जड़सम्भोगवादी गौरनागरी वालोंकी भोगकी वस्तु नहीं है, इसीको बतानेके लिये ही यह प्रेम-विलास-विवर्त्तकी उदाहरण-लीला है। 'काञ्चना' आदि काल्पनिक दूतियोंकी अप्राकृत प्रेम विलासकी आवश्यकता नहीं है। प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायमें अपने-आपको शुद्ध भक्तोंके समान प्रकाशित करनेकी वासना है। इसलिये श्रीकृष्ण-भजन रसकी कथाको श्रीकृष्णकथाके अकालमय जगत्में प्रचार करनेकी इच्छा करनेपर वे नानामतवाद-विवर्त्तमें पतित हो सकते हैं, ऐसा जानकर यह सब व्याख्या शुद्धभक्तिमान् लोगोंके लिये ही संरक्षित हुई है॥ 190-192॥

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