श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/190–192 ]
उनके मुखको ढक दिया। गीत-विरहकालमें श्रीमतीजीकी उक्ति है, इसलिये विप्रलम्भदशामें सम्भोगकी स्फूर्ति हुई॥ 190–192 ॥
अनुभाष्य- “व्यतीत्य भावनावर्त्म यश्चमत्कार-भारभूः। हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वदते स रसो मतः॥”
विशुद्ध-सत्त्वसे उज्ज्वल चित्तमें ही 'रस'का आस्वादन होता है। वह बाह्य-जगत् या अन्तर्जगत्के स्थूल-सूक्ष्म-उपाधियुक्त देह और मनके आस्वादन योग्य कार्य नहीं है। गौण स्थूल-सूक्ष्म-जगत्में जो अस्मिताका आभास लक्षित होता है, उसे अनात्म 'बुद्धि' और 'मनः' कहा जाता है। रसमय विषय रससे परिपूर्ण इन्द्रियोंके द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। रसपूर्ण-इन्द्रियाँ रसमय-दर्शन-स्पर्शनादिके द्वारा रसिकशेखर, रसस्रोत, विषयविग्रह श्रीनन्दनन्दनकी प्रेममय सेवा करती हैं। यह निर्विशेषवादियोंकी प्राकृत-जगत्से परे जड़रहित अवस्था मात्र नहीं है, इसलिये 'रस'की संज्ञामें भावनावथका विशेष रूपसे अतिक्रमण लिखा गया है। भौतिकवादी लोग जड़जगत्में इन्द्रियभोगसे जो अनुभूति प्राप्त करते हैं, वे केवल उसके विपरीत भावका चिन्तन कर सकते हैं, परन्तु इस प्रकारके विचारोंसे वे अप्राकृत रसको नहीं समझ सकते। देह और मनके धर्मोंसे जो चमत्कारिता उत्पन्न होती है, वह असम्पूर्ण, लघु और नश्वर है, इसलिये ही कहा गया है कि चिन्मय-रस चमत्कारके गुरुत्वको प्रकाशित करता है। प्रेमा-शुद्ध और चिन्मय वस्तु है। अचित् वस्तुओंमें प्रीति-नश्वर है। तुच्छ-धर्म काममें ही अवस्थित है। जड़जगत्में इन्द्रियसुखमें बाधा होनेसे जो दुःख आता है, वह जड़-प्रीतिका 'विवर्त्त' है। दूसरी ओर प्रेमविलास और विलास-विवर्त्त किसी भी प्रकारका अभाव, निकृष्टता और अमङ्गल उत्पन्न नहीं करते। अप्राकृत-रस-रसिक श्रीरायरामानन्दने स्व-रचित जिस गीतका कीर्तन किया है, वह श्रीगौरसुन्दरके द्वारा अनुमोदित है या नहीं, ऐसी लीलाका अभिनय करते हुए उन्होंने प्रेम-विलास-विवर्त्तका वर्णन किया।
भक्तदास बाउल-कृत 'विवर्त्तविलास' ग्रन्थ—श्रीजगदानन्दके 'प्रेमविवर्त्त' और श्रीरामानन्दके प्रेमविलास-विवर्त्तसे सम्पूर्ण विपरीत ग्रन्थ है। आजकलके शिक्षित-अभिमानी व्यक्ति प्रेमविलास-विवर्त्तके विपरीत बुद्धि रखते हुए जड़ीय 'विवर्त्तविलास'के विचारोंका अनुसरण करके 'प्राकृत विद्यामन्दिर' (सांसारिक शिक्षा संस्थानों) से प्राकृत विद्यासागरगणों (सांसारिक विद्वानों) से 'पी.एच.डी.' की उपाधि प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु 'परविद्यामन्दिर' (अप्राकृत शिक्षा संस्थान) से 'पी.एच. डी.' की उपाधि प्राप्त करनेके लिये जड़ीय-अहङ्कारको छोड़कर अपने नित्य स्वरूपमें अवस्थित होना पड़ेगा। मनुष्योंके द्वारा रचित धर्मशास्त्र और अप्राकृत दर्शन-शास्त्रमें आकाश-पातालका भेद है। इस भेदको श्रीमन्मध्वाचार्यने परम आदरणीय विचारोंके द्वारा सुन्दर रूपसे दिखाया है। जड़-दार्शनिक लोग जड़ीय-धारणामें ही अवस्थित हैं, इसलिये वे प्रेम-विवर्त्तको अपनी मनघड़न्त अनुभूतिके द्वारा समझनेमें समर्थ नहीं होंगे। थालीके बीचमें जिस प्रकार हाथी नहीं बैठ सकता, उसी प्रकार आरोहवादी कितना भी प्रयास कर लें, उनमें सामर्थ्य नहीं होनेके कारण उनके लिये अप्राकृत अनुभूति असम्भव है।
श्रीरामानन्द रायकी उक्तिसे जिस 'प्रेम-वैचित्त्य'के अन्तर्गत 'मोहन-मादनादि अधिरूढ़ महाभावका विलास-वैचित्र्य और विलास-विवर्त्त कहा गया है, उसको समझनेमें प्राकृत-सहजिया असमर्थ हैं। प्राकृत सहजिया श्रीरामानन्दके गीतका निर्विशेषवादी अर्थ करनेमें लगे रहेंगे, किन्तु वह (निर्विशेषवाद) न तो श्रीरामानन्दके कहनेका और न ही श्रीगौरसुन्दरके श्रवणका विषय था। आजकलके जड़ीय दार्शनिक समाजमें भजनकी निगूढ़ चमत्कारिता और अपूर्वताका प्रचार अविधिपूर्वक है, ऐसा विचार करके ही श्रीगौरसुन्दरने अपने हाथसे श्रीरामानन्दके श्रीकृष्णगानमें रत मुखकमलको ढक दिया था। इसके द्वारा यह स्थापित हुआ है कि यह गीत
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