श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1020, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/68-73 ] कोन् सम्प्रदाये संन्यास करयाछेन ग्रहण। कि नाम इँहार, शुनिते हय मन॥”70॥ अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्य श्रीमुकुन्द दत्तको लेकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर आये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कहने लगे,—“ये संन्यासी विनम्र स्वभावके हैं और देखनेमें भी बहुत सुन्दर हैं। उनके प्रति मेरी प्रीति बढ़ती ही जा रही है। मुझे यह सुननेकी बहुत उत्कण्ठा हो रही है कि इन्होंने किस सम्प्रदायसे संन्यास ग्रहण किया है तथा इनका नाम क्या है?”॥68-70॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने वास्तविक संन्यासीके अधिकारको ग्रहण करनेपर भी दैन्यपूर्वक संन्यासीके शिष्य 'ब्रह्मचारी'-नामसे ही अपना परिचय देना उचित समझा। वास्तविक संन्यासी होनेपर भी 'ब्रह्मचारी'-परिचय प्रदान करना स्वाभाविक विनयका आदर्श है॥69॥ श्रीगोपीनाथके द्वारा परिचय-प्रदान :- गोपीनाथ कहे,—“इँहार नाम श्रीकृष्णचैतन्य। गुरु इँहार केशव-भारती महाधन्य॥”71॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने बतलाया,—“इनका नाम श्रीकृष्णचैतन्य है और इनके संन्यास गुरु परम सौभाग्यवान् श्रीकेशव-भारती हैं॥”71॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा सम्प्रदायकी समालोचना :- सार्वभौम कहे,—“इँहार नाम सर्वोत्तम। भारती-सम्प्रदाय एइ—हयेन मध्यम॥”72॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“इनका नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' तो सर्वोत्तम है, परन्तु ये भारती-सम्प्रदायके हैं, इसलिये ये मध्यम श्रेणीके संन्यासी हैं॥”72॥ श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुके सम्प्रदायका समर्थन :- गोपीनाथ कहे,—“इँहार नाहि बाह्यापेक्षा। अतएव बड़ सम्प्रदायरे नाहिक अपेक्षा॥”73॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“ये किसी बाहरी औपचारिकचाकी आवश्यकता नहीं समझते, इसलिये इन्हें बड़े सम्प्रदायकी कोई अपेक्षा नहीं है॥”73॥ अनुभाष्य—शङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित दशनामी संन्यासियोंमें 'तीर्थ', 'आश्रम' और 'सरस्वती'—ये सर्वोच्च हैं। शृङ्गेरि मठमें 'सरस्वती'—उत्तम, 'भारती'—मध्यम और 'पुरी'—कनिष्ठ—ये तीन संन्यासियोंकी उपाधियाँ हैं। श्रीशङ्कर-सम्प्रदायकी जिस प्रकार तीर्थ आदि दशनामी संन्यासियोंकी व्याख्या प्रकाशित है, वह यह है— जो त्रिवेणी-सङ्गम तीर्थमें 'तत्त्वमसि' आदि लक्षणोंसे युक्त वाक्यके अनुसार तत्त्वका अर्थ समझकर स्नान करते हैं, वे 'तीर्थ' नामसे जाने जाते हैं। जिनका संन्यासाश्रममें रहनेका विशेष आग्रह है अथवा गुरु-गृहमें शिक्षा पूर्ण होनेपर गृहस्थ आश्रममें जानेके अनिच्छुक और सांसारिक आशाके बन्धनोंसे मुक्त एवं योनिभ्रमणमुक्त (कोई सांसारिक आसक्ति नहीं होनेके कारण जन्म-मरणके चक्रसे मुक्त) हैं, वे 'आश्रम' नामसे परिचित होते हैं। जो मनोहर निर्जनस्थान या वनमें वास करते हैं और आशाबन्धनसे मुक्त हैं, वे 'वन'-नामसे कहे जाते हैं। जो नित्यकाल अरण्यमें रहकर आनन्दरूपी नन्दनकाननमें वास करनेके लिये इस विश्वके समस्त सम्बन्धोंका त्याग करते हैं, वे 'अरण्य' हैं। जो पर्वतोंपर वनमें वास करके सदैव गीता-अध्ययनमें रत हैं, जिसकी बुद्धि पर्वतके समान गम्भीर हैं, वे 'गिरि' हैं। जिन्होंने पर्वतवासी प्राणियोंके मध्य वास करके अत्यन्त गूढ़ ज्ञान लाभ करके संसारके सार एवं असार वस्तुओंके भेदको जान लिया है, वे 'पर्वत' हैं। जो तत्त्व-सागरसे ज्ञानरूपी रत्न एकत्रित करके कभी भी मर्यादाका उल्लङ्घन नहीं करते, वे 'सागर' हैं। जो उदात्तादि अथवा षड्ज-ऋषभ आदि स्वरज्ञानकी चर्चामें रत हैं, स्वर-आलापादिमें निपुण एवं असार-संसार विनाशकारी हैं, वे 'सरस्वती' कहलाते हैं। जिन्होंने विद्यामें पूर्णता लाभ करके अविद्याके सम्पूर्ण भारका परित्याग कर दिया है और जो किसी भी प्रकारके दुःखसे दुःखी नहीं । 171