भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1019, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1019

Here is the complete Devanagari text transcribed from the image:

[ 6/59-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुका अपनेको पाल्य और श्रीसार्वभौमको पालक मानना :- आमि बालक-संन्यासी—भाल-मन्द नाहि जानि। तोमार आश्रय निलुँ, गुरु करि' मानि ॥ 59 ॥ तोमार सङ्ग लागि' मोर इँहा आगमन। सर्वप्रकारे करिबे आमाय पालन ॥ 60 ॥ महाप्रभुके द्वारा कृतज्ञता दिखलाना :- आजि ये हैल आमार बड़इ विपत्ति। ताहा हैते कैले तुमि आमार अव्याहति ॥" 61 ॥ अनुवाद-मैं तो एक युवा संन्यासी हूँ, अपना अच्छा-बुरा कुछ नहीं जानता हूँ। इसलिये मैं आपको गुरु मानकर आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। आपका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये ही मैं यहाँ आया हूँ, आप मेरा सब प्रकारसे पालन कीजिये। आज जो मुझपर इतनी बड़ी विपत्ति आ पड़ी थी, उससे आपने ही मेरी रक्षा की थी॥" 59-61 ॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथके दर्शनसे मैं मूर्च्छित होकर संज्ञाहीन हो गया था, आपने मेरी सेवाके भारको ग्रहण करके अज्ञानको दूर करके चेतन किया है अर्थात् अन्तर्दशासे बहिर्दशामें पहुँचा दिया है॥ 61 ॥ भट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुके प्रति स्नेहपूर्ण उपदेश :- भट्टाचार्य कहे,- “एकले तुमि ना याइह दर्शने। आमार सङ्गे याबे, किंवा आमार लोक-सने ॥" 62 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - "अब आप अकेले श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये मत जाना। मेरे साथ जाना या मेरे किसी आदमीके साथ जाना ॥ "62 ॥ महाप्रभुकी सम्मतिसूचक उक्ति :- प्रभु कहे, - "मन्दिर-भितरे ना याइब। गरुड़ेर पाशे रहि' दर्शन करिब ॥ " 63 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "अब मैं मन्दिरके भीतर नहीं जाऊँगा। गरुड़-स्तम्भके पास खड़े होकर ही श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करूँगा ॥" 63 ॥ श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा अपने बहनोईको महाप्रभुकी देखरेख करनेकी प्रार्थना :- गोपीनाथाचार्यके कहे सार्वभौम। "तुमि गोसाञिरे कराइह दर्शन ॥ 64 ॥ आमार मातृस्वसा-गृह—निर्जन स्थान। ताँहा वासा देह, कर सर्व समाधान ॥"65 ॥ गोपीनाथ प्रभु लञा ताँहा वासा दिल। जलपात्र आदि सर्व समाधान कैल ॥ 66 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यको कहा, - "आप गोसाईं जीको अपने साथ ले जाकर इन्हें श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन कराना। मेरी मौसीका घर निर्जन स्थानमें है, वहाँ आप इनके रहनेकी और जो-जो आवश्यक वस्तुएँ हैं, उन सबकी व्यवस्था कर दीजिये।" तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभुको साथ ले जाकर उन्हें उनके रहनेका स्थान दिखाया। उन्होंने जलपात्र आदि सभी आवश्यक वस्तुओंकी भी व्यवस्था कर दी ॥ 64-66 ॥ श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुको श्रीजगन्नाथकी सेवाका प्रदर्शन :- आर दिन गोपीनाथ प्रभु-स्थाने गिया। शय्योत्थान दरशन कराइल लञा ॥ 67 ॥ अनुवाद-अगले दिन श्रीगोपीनाथाचार्य महाप्रभुके स्थानपर गये और उन्हें श्रीजगन्नाथदेवके शय्योत्थान दर्शन कराये ॥ 67 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'शय्योत्थान' - श्रीजगन्नाथदेवका शय्यासे उठना ॥ 67 ॥ श्रीमुकुन्दके साथ श्रीसार्वभौमके घरमें आगमन :- मुकुन्ददत्त लञा आइला सार्वभौम-स्थाने। सार्वभौम किछु ताँरे बलिला वचने ॥ 68 ॥ श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुके प्रति स्नेहप्रीति और उनके संन्यास-परिचयकी जिज्ञासा :- "प्रकृति-विनीत, संन्यासी देखिते सुन्दर। आमार बहुप्रीति बाड़े इँहार उपर ॥ 69 ॥ 170