श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1018, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/50-58 ] श्रीगोपीनाथसे महाप्रभुके पूर्व आश्रमके सम्बन्धमें पूछना :- गोपीनाथ आचार्ये कहे सार्वभौम। “गोसाञिर जानिते चाहि काँहा पूर्वाश्रम॥”50॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यसे पूछा,—“मैं इन संन्यासीके पूर्वाश्रमके बारेमें जानना चाहता हूँ॥” 50॥ अनुभाष्य—‘पूर्वाश्रम’—संन्यासाश्रम ग्रहण करनेसे पहले गृहमें रहते समय किस नामसे परिचित थे और किस स्थानपर वास करते थे॥50॥ गोपीनाथके द्वारा परिचय-प्रदान :- गोपीनाथाचार्य कहे,–“नवद्वीपे घर। ‘जगन्नाथ’–नाम, पदवी–‘मिश्र पुरन्दर’॥51॥ ‘विश्वम्भर’–नाम इँहार, ताँर इँहो पुत्र। नीलाम्बर चक्रवर्त्तीर हयेन दौहित्र॥”52॥ सार्वभौम कहे,-“नीलाम्बर चक्रवर्त्ती। विशारदेर समाध्यायी,-एइ ताँर ख्याति॥53॥ ‘मिश्र पुरन्दर’ ताँर मान्य, हेन जानि। पितार सम्बन्धे दोँहाके पूज्य करि’ मानि॥”54॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“नवद्वीपमें श्रीजगन्नाथ नामके एक व्यक्ति रहते हैं, जिनकी पदवी—‘मिश्र पुरन्दर’ है। इनका नाम ‘विश्वम्भर’ है और ये उनके पुत्र तथा श्रीनीलाम्बर चक्रवर्तीके नाती हैं।” श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“नीलाम्बर चक्रवर्ती तो मेरे पिताजी श्रीमहेश्वर विशारदके सहपाठी थे, उनके विषयमें मैं यही जानता हूँ। श्रीजगन्नाथ मिश्र पुरन्दरका भी मेरे पिताजी बहुत सम्मान करते हैं। इसलिये पिताजीके सम्बन्धसे मैं श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती तथा श्रीजगन्नाथ मिश्र दोनोंको ही अपना पूजनीय मानता हूँ॥”51-54॥ महाप्रभुके परिचय-श्रवणसे श्रीसार्वभौमको आनन्द :- नदीया-सम्बन्धे सार्वभौम हृष्ट हैला। प्रीत हञा गोसाञिरे कहिते लागिला॥55॥ श्रीसार्वभौमका दैन्य-विनय :- “सहजेइ पूज्य तुमि, आरे त’ संन्यास। अतएव हङ तोमार आमि निज दास॥”56॥ अनुवाद—महाप्रभुको नदीयावासी जानकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत प्रसन्न हुए और वे महाप्रभुसे कहने लगे,—“आप तो सहज ही हमारे पूज्य हैं और आप संन्यासी भी हैं। इसलिये मैं आपका निज-दास हूँ॥” 56॥ अनुभाष्य—आपकी स्वाभाविक-वृत्तिके उत्कर्षका विचार करनेपर आप मेरे पूजनीय हो; और बाह्य आश्रम विचारसे भी आप संन्यास ग्रहण करनेके कारण हमारे जैसे गृहस्थोंके पूजनीय हो। इसलिये मैं आपका दास हूँ और आप मेरे सेव्य हो॥56॥ महाप्रभुका दूसरोंको सम्मान देनेका धर्म :- शुनि’ महाप्रभु कैल श्रीविष्णु-स्मरण। भट्टाचार्ये कहे किछु विनय वचन॥57॥ “तुमि जगद्गुरु—सर्वलोक-हितकर्त्ता। वेदान्त पड़ाओ, संन्यासीर उपकर्त्ता॥58॥ अनुवाद—अपनी प्रशंसा सुनकर महाप्रभुने लज्जित होकर श्रीविष्णुका स्मरण किया और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको विनम्रतासे कहने लगे,—“आप तो वेदान्त पढ़ाते हैं, इसलिये जगद्गुरु और सबके हितकारी हैं। आप तो संन्यासियोंका भी उपकार करनेवाले हैं॥57-58॥ अनुभाष्य—आप तो जगत्के गुरुपदपर आसीन हैं, वेदान्तके अध्यापक, अज्ञानी छात्रोंको शिक्षा प्रदान करनेवाले, संन्यासियोंके शुभाकाङ्क्षी; उन्हें वेदान्तके अर्थोंका श्रवण कराके वैराग्यका उपदेश देकर उनके अज्ञानको दूर करनेवाले और भिक्षुओंको (त्यागियोंको) अपने घरमें भिक्षा (भोजन) कराके उनका उपकार करनेवाले हैं॥58॥ । 169