श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1017, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/40-49 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
बहुत प्रसाद सार्वभौम आनाइल। तबे महाप्रभु सुखे भोजन करिल ॥ 41 ॥ सुवर्ण-थालाते अन्न उत्तम व्यञ्जन। भक्तगण-सङ्गे प्रभु करेन भोजन ॥ 42 ॥
अनुवाद—समुद्रमें स्नान करके महाप्रभु और उनके भक्त शीघ्र ही लौट आये। महाप्रभु चरणोंको धोनेके बाद प्रसाद पानेके लिये आसनपर बैठ गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अनेक प्रकारका श्रीजगन्नाथदेवका महाप्रसाद मँगवाकर रखा था। महाप्रभुने तब बड़े आनन्दके साथ भोजन किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने स्वर्णकी थालीमें महाप्रभुको विशेष चावल और उत्तम व्यञ्जन परोसे। अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने महाप्रसाद ग्रहण किया॥ 40-42 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रसाद परोसना :— सार्वभौम परिवेशन करेन आपने। प्रभु कहे,—“मोरे देह लाफरा-व्यञ्जने ॥ 43 ॥ पीठा-पाना देह तुमि इँहा-सबाकारे।” तबे भट्टाचार्य कहे युड़ि' दुइ करे ॥ 44 ॥ “जगन्नाथ कैछे करियाछेन भोजन। आजि सब महाप्रसाद कर आस्वादन ॥” 45 ॥ एत बलि' पीठा-पाना सब खाओयाइला। भिक्षा कराञा आचमन कराइला ॥ 46 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य स्वयं ही महाप्रसाद परोस रहे थे। महाप्रभुने उनसे कहा,—“आप मुझे केवल लाफरा व्यञ्जन दीजिये और सभी भक्तोंको पीठा-पाना दीजिये। तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने हाथ जोड़कर कहा,—“आज श्रीजगन्नाथदेवने जो-जो भोजन किया है, उस सबका आप स्वयं महाप्रसादके रूपमें आस्वादन करें।” इतना कहकर उन्होंने महाप्रभु और सभी भक्तोंको पीठा-पाना आदि सब कुछ खिलाया और भोजन करानेके बाद आचमन कराया॥ 43-46 ॥
अनुभाष्य—‘लाफरा-व्यञ्जन’—बहुत सी सब्जियोंको काटकर एक साथ मिलाकर जीरा, मिर्च और सरसों आदिका तड़का लगाकर बनाया गया व्यञ्जन ॥ 43 ॥
श्रीगोपीनाथ और श्रीसार्वभौमका महाप्रभुके पास आना :— आज्ञा मागि' गोपीनाथ आचार्यके लञा। प्रभुर निकट आइला भोजन करिया ॥ 47 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुके भोजनके बाद श्रीसार्वभौमने उनकी आज्ञा लेकर श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ बैठकर भोजन किया और पुनः महाप्रभुके पास आये ॥ 47 ॥
श्रीसार्वभौमका प्रणाम और महाप्रभुका आशीर्वाद :— 'नमो नारायणाय' बलि' नमस्कार कैल। 'कृष्णे मति रहु' बलि' गोसाञि कहिल ॥ 48 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने ‘नमो नारायणाय’ कहकर महाप्रभुको प्रणाम किया। उसके उत्तरमें महाप्रभुने कहा,—‘श्रीकृष्णमें तुम्हारी मति रहे।' 48 ॥
अनुभाष्य—चतुर्थ-आश्रमी संन्यासियोंको ‘ॐ नमो नारायणाय' कहकर सम्बोधन करनेकी प्रथा है। संन्यासियोंके लिये 'निराशीर्निर्नमष्क्रियः' (नमस्कार भी नहीं करेगा तथा आशीर्वाद भी नहीं देगा, ऐसी) विधि स्मृतिशास्त्रोंमें कही गयी है; किन्तु वैष्णव-संन्यासिगण अपने आपको श्रीकृष्णदास और श्रीकृष्णकी सेवाको ही सर्वोत्तम जानकर जगत्में सभीको 'श्रीकृष्णचरणकमलोंमें तुम्हारी मति हो' ऐसा करुणापूर्ण आशीर्वाद देते हैं ॥ 48 ॥
श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको वैष्णव-सम्प्रदायका मानना :— 'शुनि' सार्वभौम मने विचार करिल। वैष्णव-संन्यासी इँहो, वचने जानिल ॥ 49 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके उत्तरको सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें विचार किया कि इनके वचनोंसे लगता है ये वैष्णव-संन्यासी हैं॥ 49 ॥
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