भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1016, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1016

छठा अध्याय 6/31-40 ] सभी भक्तोंको घरके अन्दर भेजना और सबके साथ यथायोग्य बातचीत :- सार्वभौमे जानाञा सबे निल अभ्यन्तरे। नित्यानन्द-गोसाञिरे तँहो कैल नमस्कारे ॥ 31 ॥ सबा सहित यथायोग्य करिल मिलन। प्रभु देखि' सबार हैल हरषित मन ॥ 32 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यसे भक्तोंके विषयमें जानकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य सभीको अपने घरके भीतर ले गये और श्रीनित्यानन्द प्रभुको देखकर उन्हें प्रणाम किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने सभी भक्तोंके साथ यथायोग्य व्यवहार करते हुए भेंट की। महाप्रभुको देखकर सबका मन आनन्दित हो गया॥ 31-32॥ पुत्र चन्दनेश्वरके साथ सभीको श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये भेजना :- सार्वभौम पाठाइल सबा दर्शन करिते। 'चन्दनेश्वर' निजपुत्र दिल सबार साथे ॥ 33 ॥ अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अपने पुत्र 'चन्दनेश्वर'के साथ उन सब भक्तोंको श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये भेज दिया ॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दर्शन करिते'- श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करनेके लिये ॥ 33 ॥ श्रीजगन्नाथके दर्शनसे निताइमें प्रेमका आवेश :- जगन्नाथ देखि' सबार हइल आनन्द। भावेते आविष्ट हैला प्रभु नित्यानन्द ॥ 34 ॥ सबे' मेलि' धरि' ताँरे सुस्थिर करिल। ईश्वर-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल ॥ 35 ॥ प्रसाद पाञा सबे हैला आनन्दित मने। पुनरपि आइला सबे महाप्रभुर स्थाने ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करके सभीको बहुत आनन्द हुआ। श्रीनित्यानन्द प्रभु तो भावमें आविष्ट हो गये। सभी भक्तोंने मिलकर श्रीनित्यानन्द प्रभुको पकड़ा तथा उन्हें स्थिर किया। तभी श्रीजगन्नाथदेवके सेवकने उन्हें प्रसाद और माला लाकर दिये। श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद पाकर सभीका मन बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वे सब फिरसे महाप्रभुके पास श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर आ गये॥ 34-36 ॥ महाप्रभुके निकट सभी भक्तोंके द्वारा उच्च-स्वरसे कीर्तन और महाप्रभुको बाह्य-दशाकी प्राप्ति :- उच्च करि' करे सबे नाम-सङ्कीर्त्तन । तृतीय प्रहरे हैल प्रभुर चेतन ॥ 37 ॥ श्रीसार्वभौमका शिष्टाचार :- हुङ्कार करिया उठे 'हरि' 'हरि' बलि' । आनन्दे सार्वभौम ताँर लैल पदधूलि ॥ 38 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी चेतना लौटानेके लिये सभी भक्त उच्चस्वरसे नाम-सङ्कीर्तन करने लगे, तब तीसरे प्रहर महाप्रभुको चेतनता आयी। महाप्रभु हुँकार करते हुए उठे और जोरसे 'हरि' 'हरि' बोला। उनकी चेतनता लौटनेपर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महाप्रभुके श्रीचरणोंकी धूलिको ग्रहण किया॥ 37-38 ॥ श्रीसार्वभौमका निमन्त्रण :- सार्वभौम कहे, - “शीघ्र करह मध्याह्न। मुञि भिक्षा दिब आजि महाप्रसादान्न ॥" 39 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने सभीसे कहा,- "आप शीघ्र ही अपना मध्याह्नका स्नान कर लीजिये। मैं आप सबको आज श्रीजगन्नाथदेवका महाप्रसाद लाकर भोजन कराऊँगा ॥ " 39 ॥ अनुभष्य- 'करह मध्याह्न'-दिनके समय किये जानेवाले स्नानके बाद आहारको ग्रहण करो ॥ 39 ॥ स्नानके बाद भक्तों सहित महाप्रभुका प्रसाद-सम्मान :- समुद्रस्नान करि' प्रभु शीघ्र आइला। चरण पाखालि' प्रभु आसने बसिला ॥ 40 ॥ । 167

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1016, कुल 2549 में से · BharatKosha