श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1015, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/19-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पूर्व परिचयके अनुसार मुकुन्दादिके साथ बातचीत करनेपर महाप्रभुके संवादका श्रवण :- मुकुन्द-सहित पूर्वे आछे परिचय। मुकुन्द देखिया ताँर हइल विस्मय॥ 19॥ मुकुन्द ताँहारे देखि' कैल नमस्कार। तेंहो आलिङ्गिया पूछे प्रभुर समाचार॥ 20॥ मुकुन्द कहे,—"प्रभुर इँहा हैल आगमने। आमि-सब आसियाछि महाप्रभुर सने॥" 21॥ नित्यानन्द-गोसाञिके आचार्य कैल नमस्कार। सबे मेलि' पुछे प्रभुर वार्त्ता बार बार॥ 22॥ मुकुन्द कहे,—"महाप्रभु संन्यास करिया। नीलाचले आइला सङ्गे आमा-सबा लञा॥ 23॥ आमा-सबा छाड़ि' आगे गेला दरशने। आमि-सब पाछे आइलाङ ताँर अन्वेषणे॥ 24॥ अन्योन्ये लोकेर मुखे ये कथा शुनिल। सार्वभौम-गृहे प्रभु,—अनुमान कैल॥ 25॥ ईश्वर-दर्शने प्रभु प्रेमे अचेतन। सार्वभौम लञा गेला आपन-भवन॥ 26॥ तोमार मिलने यबे आमार हैल मन। दैवे सेइ क्षणे पाइलुँ तोमार दरशन॥ 27॥ श्रीजगन्नाथकी अपेक्षा महाप्रभुके प्रति अधिक प्रेम :- चल, सबे याइ सार्वभौमेर भवन। प्रभु देखि' पाछे करिब ईश्वर-दर्शन॥" 28॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यका श्रीमुकुन्द दत्तके साथ पहलेसे ही परिचय था, इसलिये श्रीमुकुन्द दत्तको वहाँ देखकर वे आश्चर्यचकित हुए। श्रीमुकुन्द दत्तने उनको देखकर प्रणाम किया। श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीमुकुन्द दत्तका आलिङ्गन करके उनसे महाप्रभुका समाचार पूछा। श्रीमुकुन्द दत्तने कहा,—"महाप्रभु यहाँ नीलाचलमें आये हैं और हम सब उनके साथ ही आये हैं।" श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्रणाम किया और फिर सबसे मिलकर वे बार-बार महाप्रभुके बारेमें पूछने लगे कि वे कहाँ हैं? श्रीमुकुन्दने कहा,—"महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया है। वे हम सबको अपने साथ लेकर नीलाचल आये हैं। हम सबको छोड़कर वे आगे श्रीजगन्नाथका दर्शन करने आये थे और हम सब उन्हें ढूँढ़ते हुए आ रहे हैं। दूसरे लोगोंके मुखसे हमने जो बात सुनी है, उससे तो यह अनुमान लग रहा है कि वे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें हैं। हमने उनसे सुना कि भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके वे प्रेममें आविष्ट होकर अचेतन हो गये थे और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें अपने घर ले गये हैं। इस परिस्थितिमें सहायताके लिये मैं आपका स्मरण कर ही रहा था कि भाग्यसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हो गया है। चलो, हम सब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर जाकर पहले महाप्रभुका दर्शन करें। बादमें श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करेंगे॥" 19-28॥ सभी भक्तोंका श्रीसार्वभौमके घरकी ओर गमन :- एत शुनि' गोपीनाथ सबारे लञा। सार्वभौम-घरे गेला हरषित हञा॥ 29॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीगोपीनाथाचार्य हर्षित होकर सब भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर गये॥ 29॥ वहाँ महाप्रभुका दर्शन, गोपीनाथको महाप्रभुके दर्शनसे एकसाथ हर्ष और विषाद :- सार्वभौम-स्थाने गिया प्रभुके देखिल। प्रभु देखि' आचार्येर दुःख-हर्ष हैल॥ 30॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर जाकर सभीने देखा कि महाप्रभु मूर्च्छित पड़े हैं। महाप्रभुकी ऐसी दशा देखकर श्रीगोपीनाथाचार्यको दुःख हुआ और साथ ही उनके दर्शनसे उन्हें हर्ष भी हुआ॥ 30॥ 166 ।