श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 6/19-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पूर्व परिचयके अनुसार मुकुन्दादिके साथ बातचीत करनेपर महाप्रभुके संवादका श्रवण :- मुकुन्द-सहित पूर्वे आछे परिचय। मुकुन्द देखिया ताँर हइल विस्मय॥ 19॥ मुकुन्द ताँहारे देखि' कैल नमस्कार। तेंहो आलिङ्गिया पूछे प्रभुर समाचार॥ 20॥ मुकुन्द कहे,—"प्रभुर इँहा हैल आगमने। आमि-सब आसियाछि महाप्रभुर सने॥" 21॥ नित्यानन्द-गोसाञिके आचार्य कैल नमस्कार। सबे मेलि' पुछे प्रभुर वार्त्ता बार बार॥ 22॥ मुकुन्द कहे,—"महाप्रभु संन्यास करिया। नीलाचले आइला सङ्गे आमा-सबा लञा॥ 23॥ आमा-सबा छाड़ि' आगे गेला दरशने। आमि-सब पाछे आइलाङ ताँर अन्वेषणे॥ 24॥ अन्योन्ये लोकेर मुखे ये कथा शुनिल। सार्वभौम-गृहे प्रभु,—अनुमान कैल॥ 25॥ ईश्वर-दर्शने प्रभु प्रेमे अचेतन। सार्वभौम लञा गेला आपन-भवन॥ 26॥ तोमार मिलने यबे आमार हैल मन। दैवे सेइ क्षणे पाइलुँ तोमार दरशन॥ 27॥ श्रीजगन्नाथकी अपेक्षा महाप्रभुके प्रति अधिक प्रेम :- चल, सबे याइ सार्वभौमेर भवन। प्रभु देखि' पाछे करिब ईश्वर-दर्शन॥" 28॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यका श्रीमुकुन्द दत्तके साथ पहलेसे ही परिचय था, इसलिये श्रीमुकुन्द दत्तको वहाँ देखकर वे आश्चर्यचकित हुए। श्रीमुकुन्द दत्तने उनको देखकर प्रणाम किया। श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीमुकुन्द दत्तका आलिङ्गन करके उनसे महाप्रभुका समाचार पूछा। श्रीमुकुन्द दत्तने कहा,—"महाप्रभु यहाँ नीलाचलमें आये हैं और हम सब उनके साथ ही आये हैं।" श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्रणाम किया और फिर सबसे मिलकर वे बार-बार महाप्रभुके बारेमें पूछने लगे कि वे कहाँ हैं? श्रीमुकुन्दने कहा,—"महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया है। वे हम सबको अपने साथ लेकर नीलाचल आये हैं। हम सबको छोड़कर वे आगे श्रीजगन्नाथका दर्शन करने आये थे और हम सब उन्हें ढूँढ़ते हुए आ रहे हैं। दूसरे लोगोंके मुखसे हमने जो बात सुनी है, उससे तो यह अनुमान लग रहा है कि वे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें हैं। हमने उनसे सुना कि भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके वे प्रेममें आविष्ट होकर अचेतन हो गये थे और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें अपने घर ले गये हैं। इस परिस्थितिमें सहायताके लिये मैं आपका स्मरण कर ही रहा था कि भाग्यसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हो गया है। चलो, हम सब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर जाकर पहले महाप्रभुका दर्शन करें। बादमें श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करेंगे॥" 19-28॥ सभी भक्तोंका श्रीसार्वभौमके घरकी ओर गमन :- एत शुनि' गोपीनाथ सबारे लञा। सार्वभौम-घरे गेला हरषित हञा॥ 29॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीगोपीनाथाचार्य हर्षित होकर सब भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर गये॥ 29॥ वहाँ महाप्रभुका दर्शन, गोपीनाथको महाप्रभुके दर्शनसे एकसाथ हर्ष और विषाद :- सार्वभौम-स्थाने गिया प्रभुके देखिल। प्रभु देखि' आचार्येर दुःख-हर्ष हैल॥ 30॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर जाकर सभीने देखा कि महाप्रभु मूर्च्छित पड़े हैं। महाप्रभुकी ऐसी दशा देखकर श्रीगोपीनाथाचार्यको दुःख हुआ और साथ ही उनके दर्शनसे उन्हें हर्ष भी हुआ॥ 30॥ 166 ।
छठा अध्याय 6/31-40 ] सभी भक्तोंको घरके अन्दर भेजना और सबके साथ यथायोग्य बातचीत :- सार्वभौमे जानाञा सबे निल अभ्यन्तरे। नित्यानन्द-गोसाञिरे तँहो कैल नमस्कारे ॥ 31 ॥ सबा सहित यथायोग्य करिल मिलन। प्रभु देखि' सबार हैल हरषित मन ॥ 32 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यसे भक्तोंके विषयमें जानकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य सभीको अपने घरके भीतर ले गये और श्रीनित्यानन्द प्रभुको देखकर उन्हें प्रणाम किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने सभी भक्तोंके साथ यथायोग्य व्यवहार करते हुए भेंट की। महाप्रभुको देखकर सबका मन आनन्दित हो गया॥ 31-32॥ पुत्र चन्दनेश्वरके साथ सभीको श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये भेजना :- सार्वभौम पाठाइल सबा दर्शन करिते। 'चन्दनेश्वर' निजपुत्र दिल सबार साथे ॥ 33 ॥ अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अपने पुत्र 'चन्दनेश्वर'के साथ उन सब भक्तोंको श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये भेज दिया ॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दर्शन करिते'- श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करनेके लिये ॥ 33 ॥ श्रीजगन्नाथके दर्शनसे निताइमें प्रेमका आवेश :- जगन्नाथ देखि' सबार हइल आनन्द। भावेते आविष्ट हैला प्रभु नित्यानन्द ॥ 34 ॥ सबे' मेलि' धरि' ताँरे सुस्थिर करिल। ईश्वर-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल ॥ 35 ॥ प्रसाद पाञा सबे हैला आनन्दित मने। पुनरपि आइला सबे महाप्रभुर स्थाने ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करके सभीको बहुत आनन्द हुआ। श्रीनित्यानन्द प्रभु तो भावमें आविष्ट हो गये। सभी भक्तोंने मिलकर श्रीनित्यानन्द प्रभुको पकड़ा तथा उन्हें स्थिर किया। तभी श्रीजगन्नाथदेवके सेवकने उन्हें प्रसाद और माला लाकर दिये। श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद पाकर सभीका मन बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वे सब फिरसे महाप्रभुके पास श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर आ गये॥ 34-36 ॥ महाप्रभुके निकट सभी भक्तोंके द्वारा उच्च-स्वरसे कीर्तन और महाप्रभुको बाह्य-दशाकी प्राप्ति :- उच्च करि' करे सबे नाम-सङ्कीर्त्तन । तृतीय प्रहरे हैल प्रभुर चेतन ॥ 37 ॥ श्रीसार्वभौमका शिष्टाचार :- हुङ्कार करिया उठे 'हरि' 'हरि' बलि' । आनन्दे सार्वभौम ताँर लैल पदधूलि ॥ 38 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी चेतना लौटानेके लिये सभी भक्त उच्चस्वरसे नाम-सङ्कीर्तन करने लगे, तब तीसरे प्रहर महाप्रभुको चेतनता आयी। महाप्रभु हुँकार करते हुए उठे और जोरसे 'हरि' 'हरि' बोला। उनकी चेतनता लौटनेपर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महाप्रभुके श्रीचरणोंकी धूलिको ग्रहण किया॥ 37-38 ॥ श्रीसार्वभौमका निमन्त्रण :- सार्वभौम कहे, - “शीघ्र करह मध्याह्न। मुञि भिक्षा दिब आजि महाप्रसादान्न ॥" 39 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने सभीसे कहा,- "आप शीघ्र ही अपना मध्याह्नका स्नान कर लीजिये। मैं आप सबको आज श्रीजगन्नाथदेवका महाप्रसाद लाकर भोजन कराऊँगा ॥ " 39 ॥ अनुभष्य- 'करह मध्याह्न'-दिनके समय किये जानेवाले स्नानके बाद आहारको ग्रहण करो ॥ 39 ॥ स्नानके बाद भक्तों सहित महाप्रभुका प्रसाद-सम्मान :- समुद्रस्नान करि' प्रभु शीघ्र आइला। चरण पाखालि' प्रभु आसने बसिला ॥ 40 ॥ । 167
[ 6/40-49 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
बहुत प्रसाद सार्वभौम आनाइल। तबे महाप्रभु सुखे भोजन करिल ॥ 41 ॥ सुवर्ण-थालाते अन्न उत्तम व्यञ्जन। भक्तगण-सङ्गे प्रभु करेन भोजन ॥ 42 ॥
अनुवाद—समुद्रमें स्नान करके महाप्रभु और उनके भक्त शीघ्र ही लौट आये। महाप्रभु चरणोंको धोनेके बाद प्रसाद पानेके लिये आसनपर बैठ गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अनेक प्रकारका श्रीजगन्नाथदेवका महाप्रसाद मँगवाकर रखा था। महाप्रभुने तब बड़े आनन्दके साथ भोजन किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने स्वर्णकी थालीमें महाप्रभुको विशेष चावल और उत्तम व्यञ्जन परोसे। अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने महाप्रसाद ग्रहण किया॥ 40-42 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रसाद परोसना :— सार्वभौम परिवेशन करेन आपने। प्रभु कहे,—“मोरे देह लाफरा-व्यञ्जने ॥ 43 ॥ पीठा-पाना देह तुमि इँहा-सबाकारे।” तबे भट्टाचार्य कहे युड़ि' दुइ करे ॥ 44 ॥ “जगन्नाथ कैछे करियाछेन भोजन। आजि सब महाप्रसाद कर आस्वादन ॥” 45 ॥ एत बलि' पीठा-पाना सब खाओयाइला। भिक्षा कराञा आचमन कराइला ॥ 46 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य स्वयं ही महाप्रसाद परोस रहे थे। महाप्रभुने उनसे कहा,—“आप मुझे केवल लाफरा व्यञ्जन दीजिये और सभी भक्तोंको पीठा-पाना दीजिये। तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने हाथ जोड़कर कहा,—“आज श्रीजगन्नाथदेवने जो-जो भोजन किया है, उस सबका आप स्वयं महाप्रसादके रूपमें आस्वादन करें।” इतना कहकर उन्होंने महाप्रभु और सभी भक्तोंको पीठा-पाना आदि सब कुछ खिलाया और भोजन करानेके बाद आचमन कराया॥ 43-46 ॥
अनुभाष्य—‘लाफरा-व्यञ्जन’—बहुत सी सब्जियोंको काटकर एक साथ मिलाकर जीरा, मिर्च और सरसों आदिका तड़का लगाकर बनाया गया व्यञ्जन ॥ 43 ॥
श्रीगोपीनाथ और श्रीसार्वभौमका महाप्रभुके पास आना :— आज्ञा मागि' गोपीनाथ आचार्यके लञा। प्रभुर निकट आइला भोजन करिया ॥ 47 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुके भोजनके बाद श्रीसार्वभौमने उनकी आज्ञा लेकर श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ बैठकर भोजन किया और पुनः महाप्रभुके पास आये ॥ 47 ॥
श्रीसार्वभौमका प्रणाम और महाप्रभुका आशीर्वाद :— 'नमो नारायणाय' बलि' नमस्कार कैल। 'कृष्णे मति रहु' बलि' गोसाञि कहिल ॥ 48 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने ‘नमो नारायणाय’ कहकर महाप्रभुको प्रणाम किया। उसके उत्तरमें महाप्रभुने कहा,—‘श्रीकृष्णमें तुम्हारी मति रहे।' 48 ॥
अनुभाष्य—चतुर्थ-आश्रमी संन्यासियोंको ‘ॐ नमो नारायणाय' कहकर सम्बोधन करनेकी प्रथा है। संन्यासियोंके लिये 'निराशीर्निर्नमष्क्रियः' (नमस्कार भी नहीं करेगा तथा आशीर्वाद भी नहीं देगा, ऐसी) विधि स्मृतिशास्त्रोंमें कही गयी है; किन्तु वैष्णव-संन्यासिगण अपने आपको श्रीकृष्णदास और श्रीकृष्णकी सेवाको ही सर्वोत्तम जानकर जगत्में सभीको 'श्रीकृष्णचरणकमलोंमें तुम्हारी मति हो' ऐसा करुणापूर्ण आशीर्वाद देते हैं ॥ 48 ॥
श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको वैष्णव-सम्प्रदायका मानना :— 'शुनि' सार्वभौम मने विचार करिल। वैष्णव-संन्यासी इँहो, वचने जानिल ॥ 49 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके उत्तरको सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें विचार किया कि इनके वचनोंसे लगता है ये वैष्णव-संन्यासी हैं॥ 49 ॥
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छठा अध्याय 6/50-58 ] श्रीगोपीनाथसे महाप्रभुके पूर्व आश्रमके सम्बन्धमें पूछना :- गोपीनाथ आचार्ये कहे सार्वभौम। “गोसाञिर जानिते चाहि काँहा पूर्वाश्रम॥”50॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यसे पूछा,—“मैं इन संन्यासीके पूर्वाश्रमके बारेमें जानना चाहता हूँ॥” 50॥ अनुभाष्य—‘पूर्वाश्रम’—संन्यासाश्रम ग्रहण करनेसे पहले गृहमें रहते समय किस नामसे परिचित थे और किस स्थानपर वास करते थे॥50॥ गोपीनाथके द्वारा परिचय-प्रदान :- गोपीनाथाचार्य कहे,–“नवद्वीपे घर। ‘जगन्नाथ’–नाम, पदवी–‘मिश्र पुरन्दर’॥51॥ ‘विश्वम्भर’–नाम इँहार, ताँर इँहो पुत्र। नीलाम्बर चक्रवर्त्तीर हयेन दौहित्र॥”52॥ सार्वभौम कहे,-“नीलाम्बर चक्रवर्त्ती। विशारदेर समाध्यायी,-एइ ताँर ख्याति॥53॥ ‘मिश्र पुरन्दर’ ताँर मान्य, हेन जानि। पितार सम्बन्धे दोँहाके पूज्य करि’ मानि॥”54॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“नवद्वीपमें श्रीजगन्नाथ नामके एक व्यक्ति रहते हैं, जिनकी पदवी—‘मिश्र पुरन्दर’ है। इनका नाम ‘विश्वम्भर’ है और ये उनके पुत्र तथा श्रीनीलाम्बर चक्रवर्तीके नाती हैं।” श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“नीलाम्बर चक्रवर्ती तो मेरे पिताजी श्रीमहेश्वर विशारदके सहपाठी थे, उनके विषयमें मैं यही जानता हूँ। श्रीजगन्नाथ मिश्र पुरन्दरका भी मेरे पिताजी बहुत सम्मान करते हैं। इसलिये पिताजीके सम्बन्धसे मैं श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती तथा श्रीजगन्नाथ मिश्र दोनोंको ही अपना पूजनीय मानता हूँ॥”51-54॥ महाप्रभुके परिचय-श्रवणसे श्रीसार्वभौमको आनन्द :- नदीया-सम्बन्धे सार्वभौम हृष्ट हैला। प्रीत हञा गोसाञिरे कहिते लागिला॥55॥ श्रीसार्वभौमका दैन्य-विनय :- “सहजेइ पूज्य तुमि, आरे त’ संन्यास। अतएव हङ तोमार आमि निज दास॥”56॥ अनुवाद—महाप्रभुको नदीयावासी जानकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत प्रसन्न हुए और वे महाप्रभुसे कहने लगे,—“आप तो सहज ही हमारे पूज्य हैं और आप संन्यासी भी हैं। इसलिये मैं आपका निज-दास हूँ॥” 56॥ अनुभाष्य—आपकी स्वाभाविक-वृत्तिके उत्कर्षका विचार करनेपर आप मेरे पूजनीय हो; और बाह्य आश्रम विचारसे भी आप संन्यास ग्रहण करनेके कारण हमारे जैसे गृहस्थोंके पूजनीय हो। इसलिये मैं आपका दास हूँ और आप मेरे सेव्य हो॥56॥ महाप्रभुका दूसरोंको सम्मान देनेका धर्म :- शुनि’ महाप्रभु कैल श्रीविष्णु-स्मरण। भट्टाचार्ये कहे किछु विनय वचन॥57॥ “तुमि जगद्गुरु—सर्वलोक-हितकर्त्ता। वेदान्त पड़ाओ, संन्यासीर उपकर्त्ता॥58॥ अनुवाद—अपनी प्रशंसा सुनकर महाप्रभुने लज्जित होकर श्रीविष्णुका स्मरण किया और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको विनम्रतासे कहने लगे,—“आप तो वेदान्त पढ़ाते हैं, इसलिये जगद्गुरु और सबके हितकारी हैं। आप तो संन्यासियोंका भी उपकार करनेवाले हैं॥57-58॥ अनुभाष्य—आप तो जगत्के गुरुपदपर आसीन हैं, वेदान्तके अध्यापक, अज्ञानी छात्रोंको शिक्षा प्रदान करनेवाले, संन्यासियोंके शुभाकाङ्क्षी; उन्हें वेदान्तके अर्थोंका श्रवण कराके वैराग्यका उपदेश देकर उनके अज्ञानको दूर करनेवाले और भिक्षुओंको (त्यागियोंको) अपने घरमें भिक्षा (भोजन) कराके उनका उपकार करनेवाले हैं॥58॥ । 169
Here is the complete Devanagari text transcribed from the image:
[ 6/59-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुका अपनेको पाल्य और श्रीसार्वभौमको पालक मानना :- आमि बालक-संन्यासी—भाल-मन्द नाहि जानि। तोमार आश्रय निलुँ, गुरु करि' मानि ॥ 59 ॥ तोमार सङ्ग लागि' मोर इँहा आगमन। सर्वप्रकारे करिबे आमाय पालन ॥ 60 ॥ महाप्रभुके द्वारा कृतज्ञता दिखलाना :- आजि ये हैल आमार बड़इ विपत्ति। ताहा हैते कैले तुमि आमार अव्याहति ॥" 61 ॥ अनुवाद-मैं तो एक युवा संन्यासी हूँ, अपना अच्छा-बुरा कुछ नहीं जानता हूँ। इसलिये मैं आपको गुरु मानकर आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। आपका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये ही मैं यहाँ आया हूँ, आप मेरा सब प्रकारसे पालन कीजिये। आज जो मुझपर इतनी बड़ी विपत्ति आ पड़ी थी, उससे आपने ही मेरी रक्षा की थी॥" 59-61 ॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथके दर्शनसे मैं मूर्च्छित होकर संज्ञाहीन हो गया था, आपने मेरी सेवाके भारको ग्रहण करके अज्ञानको दूर करके चेतन किया है अर्थात् अन्तर्दशासे बहिर्दशामें पहुँचा दिया है॥ 61 ॥ भट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुके प्रति स्नेहपूर्ण उपदेश :- भट्टाचार्य कहे,- “एकले तुमि ना याइह दर्शने। आमार सङ्गे याबे, किंवा आमार लोक-सने ॥" 62 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - "अब आप अकेले श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये मत जाना। मेरे साथ जाना या मेरे किसी आदमीके साथ जाना ॥ "62 ॥ महाप्रभुकी सम्मतिसूचक उक्ति :- प्रभु कहे, - "मन्दिर-भितरे ना याइब। गरुड़ेर पाशे रहि' दर्शन करिब ॥ " 63 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "अब मैं मन्दिरके भीतर नहीं जाऊँगा। गरुड़-स्तम्भके पास खड़े होकर ही श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करूँगा ॥" 63 ॥ श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा अपने बहनोईको महाप्रभुकी देखरेख करनेकी प्रार्थना :- गोपीनाथाचार्यके कहे सार्वभौम। "तुमि गोसाञिरे कराइह दर्शन ॥ 64 ॥ आमार मातृस्वसा-गृह—निर्जन स्थान। ताँहा वासा देह, कर सर्व समाधान ॥"65 ॥ गोपीनाथ प्रभु लञा ताँहा वासा दिल। जलपात्र आदि सर्व समाधान कैल ॥ 66 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यको कहा, - "आप गोसाईं जीको अपने साथ ले जाकर इन्हें श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन कराना। मेरी मौसीका घर निर्जन स्थानमें है, वहाँ आप इनके रहनेकी और जो-जो आवश्यक वस्तुएँ हैं, उन सबकी व्यवस्था कर दीजिये।" तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभुको साथ ले जाकर उन्हें उनके रहनेका स्थान दिखाया। उन्होंने जलपात्र आदि सभी आवश्यक वस्तुओंकी भी व्यवस्था कर दी ॥ 64-66 ॥ श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुको श्रीजगन्नाथकी सेवाका प्रदर्शन :- आर दिन गोपीनाथ प्रभु-स्थाने गिया। शय्योत्थान दरशन कराइल लञा ॥ 67 ॥ अनुवाद-अगले दिन श्रीगोपीनाथाचार्य महाप्रभुके स्थानपर गये और उन्हें श्रीजगन्नाथदेवके शय्योत्थान दर्शन कराये ॥ 67 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'शय्योत्थान' - श्रीजगन्नाथदेवका शय्यासे उठना ॥ 67 ॥ श्रीमुकुन्दके साथ श्रीसार्वभौमके घरमें आगमन :- मुकुन्ददत्त लञा आइला सार्वभौम-स्थाने। सार्वभौम किछु ताँरे बलिला वचने ॥ 68 ॥ श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुके प्रति स्नेहप्रीति और उनके संन्यास-परिचयकी जिज्ञासा :- "प्रकृति-विनीत, संन्यासी देखिते सुन्दर। आमार बहुप्रीति बाड़े इँहार उपर ॥ 69 ॥ 170
छठा अध्याय 6/68-73 ] कोन् सम्प्रदाये संन्यास करयाछेन ग्रहण। कि नाम इँहार, शुनिते हय मन॥”70॥ अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्य श्रीमुकुन्द दत्तको लेकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर आये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कहने लगे,—“ये संन्यासी विनम्र स्वभावके हैं और देखनेमें भी बहुत सुन्दर हैं। उनके प्रति मेरी प्रीति बढ़ती ही जा रही है। मुझे यह सुननेकी बहुत उत्कण्ठा हो रही है कि इन्होंने किस सम्प्रदायसे संन्यास ग्रहण किया है तथा इनका नाम क्या है?”॥68-70॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने वास्तविक संन्यासीके अधिकारको ग्रहण करनेपर भी दैन्यपूर्वक संन्यासीके शिष्य 'ब्रह्मचारी'-नामसे ही अपना परिचय देना उचित समझा। वास्तविक संन्यासी होनेपर भी 'ब्रह्मचारी'-परिचय प्रदान करना स्वाभाविक विनयका आदर्श है॥69॥ श्रीगोपीनाथके द्वारा परिचय-प्रदान :- गोपीनाथ कहे,—“इँहार नाम श्रीकृष्णचैतन्य। गुरु इँहार केशव-भारती महाधन्य॥”71॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने बतलाया,—“इनका नाम श्रीकृष्णचैतन्य है और इनके संन्यास गुरु परम सौभाग्यवान् श्रीकेशव-भारती हैं॥”71॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा सम्प्रदायकी समालोचना :- सार्वभौम कहे,—“इँहार नाम सर्वोत्तम। भारती-सम्प्रदाय एइ—हयेन मध्यम॥”72॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“इनका नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' तो सर्वोत्तम है, परन्तु ये भारती-सम्प्रदायके हैं, इसलिये ये मध्यम श्रेणीके संन्यासी हैं॥”72॥ श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुके सम्प्रदायका समर्थन :- गोपीनाथ कहे,—“इँहार नाहि बाह्यापेक्षा। अतएव बड़ सम्प्रदायरे नाहिक अपेक्षा॥”73॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“ये किसी बाहरी औपचारिकचाकी आवश्यकता नहीं समझते, इसलिये इन्हें बड़े सम्प्रदायकी कोई अपेक्षा नहीं है॥”73॥ अनुभाष्य—शङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित दशनामी संन्यासियोंमें 'तीर्थ', 'आश्रम' और 'सरस्वती'—ये सर्वोच्च हैं। शृङ्गेरि मठमें 'सरस्वती'—उत्तम, 'भारती'—मध्यम और 'पुरी'—कनिष्ठ—ये तीन संन्यासियोंकी उपाधियाँ हैं। श्रीशङ्कर-सम्प्रदायकी जिस प्रकार तीर्थ आदि दशनामी संन्यासियोंकी व्याख्या प्रकाशित है, वह यह है— जो त्रिवेणी-सङ्गम तीर्थमें 'तत्त्वमसि' आदि लक्षणोंसे युक्त वाक्यके अनुसार तत्त्वका अर्थ समझकर स्नान करते हैं, वे 'तीर्थ' नामसे जाने जाते हैं। जिनका संन्यासाश्रममें रहनेका विशेष आग्रह है अथवा गुरु-गृहमें शिक्षा पूर्ण होनेपर गृहस्थ आश्रममें जानेके अनिच्छुक और सांसारिक आशाके बन्धनोंसे मुक्त एवं योनिभ्रमणमुक्त (कोई सांसारिक आसक्ति नहीं होनेके कारण जन्म-मरणके चक्रसे मुक्त) हैं, वे 'आश्रम' नामसे परिचित होते हैं। जो मनोहर निर्जनस्थान या वनमें वास करते हैं और आशाबन्धनसे मुक्त हैं, वे 'वन'-नामसे कहे जाते हैं। जो नित्यकाल अरण्यमें रहकर आनन्दरूपी नन्दनकाननमें वास करनेके लिये इस विश्वके समस्त सम्बन्धोंका त्याग करते हैं, वे 'अरण्य' हैं। जो पर्वतोंपर वनमें वास करके सदैव गीता-अध्ययनमें रत हैं, जिसकी बुद्धि पर्वतके समान गम्भीर हैं, वे 'गिरि' हैं। जिन्होंने पर्वतवासी प्राणियोंके मध्य वास करके अत्यन्त गूढ़ ज्ञान लाभ करके संसारके सार एवं असार वस्तुओंके भेदको जान लिया है, वे 'पर्वत' हैं। जो तत्त्व-सागरसे ज्ञानरूपी रत्न एकत्रित करके कभी भी मर्यादाका उल्लङ्घन नहीं करते, वे 'सागर' हैं। जो उदात्तादि अथवा षड्ज-ऋषभ आदि स्वरज्ञानकी चर्चामें रत हैं, स्वर-आलापादिमें निपुण एवं असार-संसार विनाशकारी हैं, वे 'सरस्वती' कहलाते हैं। जिन्होंने विद्यामें पूर्णता लाभ करके अविद्याके सम्पूर्ण भारका परित्याग कर दिया है और जो किसी भी प्रकारके दुःखसे दुःखी नहीं । 171
[ 6/72–76 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला होते, वे 'भारती' हैं। जो तत्त्वज्ञानमें पारङ्गत एवं पूर्णतत्त्वपदमें अवस्थित होकर सब समय परब्रह्मकी चर्चामें रत हैं, वे 'पुरी' नामसे प्रसिद्ध हैं। श्रीशङ्कर-सम्प्रदायमें 'ब्रह्मचारी' नामोंका अर्थ जिस प्रकारसे प्रदान किया जाता है, वह यह है— जो अपने स्वरूपको भलीभाँति जानते हैं, स्वधर्मका पालन करते हैं एवं नित्यकाल अपने आनन्दमें मग्न हैं, वे 'स्वरूप'-नामक ब्रह्मचारी हैं। जो स्वयं ज्योतिर्ब्रह्मको विशेष रूपसे जानते हैं और तत्त्वज्ञानके प्रकाशके द्वारा विशेषरूपसे योगयुक्त है, वे 'प्रकाश' नामसे जाने जाते हैं। जो तत्त्वज्ञान प्राप्त करके सत्य, ज्ञान, अनन्त और ब्रह्मका सदैव ध्यान करते हैं एवं स्वानन्दमें विहार करते हैं, वे 'आनन्द' नामसे प्रसिद्ध हैं। जो अचित्-मिश्रभावसे अतीत चिन्मात्र, मायाके द्वारा चित्तविकारसे रहित, और जो अनन्त, अजर और मङ्गलमय ब्रह्मको जानते हैं, वे विद्वान हैं और 'चैतन्य'-नामसे कहे जाते हैं (मञ्जूषा-द्वितीय संख्या)। श्रीसार्वभौमने कहा, —“श्रीमन्महाप्रभुका नाम— 'श्रीकृष्ण' एवं ब्रह्मचारी-उपाधि—'चैतन्य' है। इसलिये श्रीकृष्णनाम सभी नामोंकी अपेक्षा उत्तम है, किन्तु श्रीमहाप्रभु सर्वोच्च सरस्वती-सम्प्रदायमें प्रवेश ना करके मध्यम-सम्प्रदायमें प्रविष्ट हुए हैं।” इसके उत्तरमें श्रीगोपीनाथने कहा, —“इनका मध्यम-सम्प्रदायमें प्रवेश करनेका कारण यह है कि इनकी किसी प्रकारकी कोई बाह्यापेक्षा नहीं है। भीतरमें मर्यादाका अहङ्कार रहनेपर मनुष्य मर्यादा पानेका प्रयास करता है। अकिञ्चन होकर दीनभावसे हरिभजन करनेकी इच्छा होनेपर भारती-सम्प्रदायकी उपेक्षा करके सरस्वती-सम्प्रदायका अनुसन्धान करके उसमें प्रवेश करनेकी आकाङ्क्षा नहीं होती॥ 72–73॥ साधारण युवा समझकर महाप्रभुके प्रति भट्टाचार्यकी गुरुकी भाँति उपदेशमूलक उक्ति :— भट्टाचार्य कहे, —“इँहार प्रौढ़ यौवन। केमने संन्यास-धर्म हबेक रक्षण॥ 74॥ निरन्तर इँहाके वेदान्त शुनाइब। वैराग्य-अद्वैत-मार्गे प्रवेश कराइब॥ 75॥ कहेन यदि, पुनरपि योग-पट्ट दिया। संस्कार करिये उत्तम-सम्प्रदाये आनिया॥” 76॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, —“श्रीकृष्ण- चैतन्य पूर्ण यौवनमें हैं, ये अपने संन्यास धर्मकी रक्षा कैसे करेंगे? इसलिये मैं इन्हें निरन्तर वेदान्त सुनाकर इनको वैराग्यमें स्थिर रखूँगा और अद्वैत-मार्गमें प्रवेश कराऊँगा। यदि श्रीकृष्णचैतन्य कहेंगे, तो मैं उन्हें फिरसे संन्यास-वस्त्र देकर और संस्कार करके उत्तम सम्प्रदायमें ले आऊँगा॥” 74–76॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस मायिक जगत्को कौवेकी विष्ठाके (मलके) समान तुच्छ ज्ञान करानेवाले केवल-अद्वैतपथमें प्रवेश करा दूँा। 'योगपट्ट'—संन्यासियोंका विशेष वेश। उत्तम सम्प्रदायके योग्य योगपट्ट अर्थात् संन्यासियोंके द्वारा व्यवहार किये जानेवाले वस्त्रोंको देकर पुनः संस्कार कर दूँगा॥ 75–76॥ अनुभाष्य—संन्यासिगण सदैव वेदान्तवाक्योंका अनुशीलन करके विषयोंके प्रति वैराग्य उत्पन्न करते हैं एवं कौपीनाश्रित होकर कौपीनकी मर्यादाकी रक्षा करते हैं। सदैव शम-दमादि छह प्रकारके साधनोंमें पारदर्शी होनेके लिये भक्तिरहित-विचारकोंकी युक्तिके अनुसार ज्ञान और वैराग्यकी उपासना आवश्यक है। द्वितीय (देहमें) अभिनिवेश होनेपर ही मायिक वस्तुओंके पराक्रमकी आशङ्का होती है, इसलिये ज्ञान-वैराग्यसे युक्त कराके अद्वैत-पथमें प्रवेश करानेपर युवावस्थाके कारण कामसे उत्पन्न चेष्टाएँ बलवान् नहीं हो पायेंगी। महाप्रभु यदि उच्च सरस्वती-सम्प्रदायमें प्रवेशाधिकारकी इच्छा करें, तो फिर पुनः सरस्वती-सम्प्रदायके संन्यासीके द्वारा उनको त्यागियोंके वस्त्र-दण्ड आदि प्रदान कराके उन्नत करा सकता हूँ। शौक्रब्राह्मणके अतिरिक्त कोई भी वर्ण उच्च 'सरस्वती' सम्प्रदायमें प्रवेश नहीं कर सकता; इसलिये 'भारती' आदि सम्प्रदायमें विधिकी शिथिलता 172 ।
छठा अध्याय 6/74-83 ] रहनेसे 'सरस्वती' संन्यासियोंकी भाँति उच्च सम्प्रदायके विचारसे 'भारती' संन्यासियोंकी मध्यमता और 'पुरी' संन्यासियोंकी कनिष्ठता सिद्ध है॥ 74-76 ॥ महाप्रभुके प्रति शासन-वाणीको सुनकर दोनों भक्तोंको दुःख :- शुनि' गोपीनाथ मुकुन्द, दुँहे दुःखी हैला। गोपीनाथाचार्य किछु कहिते लागिला ॥ 77 ॥ श्रीसार्वभौमके अज्ञानको देखकर गोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी महिमाका कीर्तन :- “भट्टाचार्य, तुमि इँहार ना जान महिमा। भगवत्ता-लक्षणेर इँहातेइ सीमा ॥ 78 ॥ ताहाते विख्यात इँहो परम-ईश्वर। अज्ञ-स्थाने किछु नहे विज्ञेर गोचर ॥" 79 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बात सुनकर श्रीगोपीनाथाचार्य और श्रीमुकुन्द दत्त, दोनों बहुत दुःखी हुए। श्रीगोपीनाथाचार्य कुछ कहने लगे, - “भट्टाचार्य ! आप इनकी महिमा नहीं जानते। इनमें भगवत्ताके समस्त लक्षण परम सीमा तक विराजमान हैं। इसलिये ये परम-ईश्वरके रूपमें विख्यात हैं। इस विषयमें विज्ञ व्यक्ति जिन सिद्धान्तोंको जानते हैं, उन्हें अज्ञ व्यक्तियोंके द्वारा समझना बहुत कठिन है॥" 77-79 ॥ तर्कपन्थी और श्रौतपन्थीके विचार; तर्कपन्थाके द्वारा भगवान् अलभ्य और श्रौतपन्थाके द्वारा सुलभ :- शिष्यगण कहे, - “ईश्वर कह कोन प्रमाणे।” आचार्य कहे, - "विज्ञमत ईश्वर-लक्षणे ॥" 80 ॥ शिष्य कहे,-“ईश्वर-तत्त्व साधि अनुमाने।” आचार्य कहे,-"अनुमाने नहे ईश्वर-ज्ञाने ॥" 81 ॥ अनुमान प्रमाण नहे ईश्वरतत्त्व-ज्ञाने। कृपा बिना ईश्वरेरे केह नाहि जाने ॥ 82 ॥ ईश्वरेर कृपा-लेश हयत' याहारे। सेइ त' ईश्वर-तत्त्व जानिबारे पारे ॥ 83 ॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके शिष्योंने पूछा, - "आप किस प्रमाणके आधारपर इन्हें ईश्वर कह रहे हैं।" श्रीगोपीनाथाचार्यने उत्तर दिया, - "ईश्वरके लक्षणके सम्बन्धमें विज्ञ (तत्त्वको जाननेवाले) व्यक्तियोंका मत ही प्रमाण है।" शिष्य कहने लगे, - "ईश्वर-तत्त्व अनुमानके द्वारा ही प्रमाणित होता है।" श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा, - “अनुमानके द्वारा ईश्वर-तत्त्वका ज्ञान नहीं होता। ईश्वर-तत्त्वको जाननेके लिये अनुमान प्रमाण नहीं है। ईश्वरकी कृपाके बिना उनको कोई भी नहीं जान सकता। जिसपर ईश्वरकी लेशमात्र भी कृपा होती है, वही ईश्वर-तत्त्वको जान सकता है॥ 80-83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - विज्ञको जो तत्त्व दिखलायी देता है, वह अज्ञ व्यक्तियोंके लिये कुछ भी नहीं है, - इसी कारणसे ही तुम इनको 'सामान्य मनुष्य' मान रहे हो; वास्तवमें इनमें भगवत्ता-लक्षणोंकी सीमा है। श्रीसार्वभौमके शिष्योंने श्रीगोपीनाथको कहा, - 'तुम किस प्रमाणके द्वारा इनको 'ईश्वर' कह रहे हो?' गोपीनाथने उत्तर दिया, - 'विज्ञ व्यक्ति जिन लक्षणोंके आधारपर ईश्वरको स्थापित करते हैं, मैं उन्हीं लक्षणोंके आधारपर ही इनको ईश्वर कह रहा हूँ।' शिष्योंने कहा, - ईश्वरतत्त्व अनुमानके द्वारा जाना जाता है। व्याप्तिज्ञान-लक्षण ही अनुमान है; जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' अर्थात् 'जहाँ धुआँ देखा जायेगा, वहाँ अग्नि है, ऐसा जानना होगा; 'धुआँ दिखाई दे रहा है, इसलिये पर्वतपर अग्नि हैं', यही बात यहाँ प्रमाणित होती है। ईश्वरके विषयमें अनुमान ऐसे कार्य करता है, - जैसे, जितनी वस्तुएँ देखी जाती हैं, सभीका ही कारण है; यह परिदृश्यमान जगत् भी एक वस्तु है; इसलिये इसका कोई कारण नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता। इसलिये ईश्वर-विश्वका कारण हैं', यह तत्त्व प्रमाणित हुआ। हम इसी प्रणालीसे ईश्वरतत्त्वका निरूपण करते हैं। आप यदि दिखा पायें कि ये संन्यासी इस युक्तिके अनुसार ईश्वर हो सकते हैं, तब हम मान सकते हैं।' श्रीगोपीनाथने उत्तर । 173
[ 6/78-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दिया,—‘ईश्वरतत्त्वको जाननेके लिये अनुमान प्रमाणके रूपमें कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि ईश्वरकी कृपाके बिना कोई भी उनको नहीं जान सकता॥' 78-83॥ कृपाके बिना केवल ज्ञानमार्गसे भगवान् अगोचर :— श्रीमद्भागवत (10/14/29)— तथापि ते देव पदाम्बुजद्वय- प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि। जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ 84॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव, आपके श्रीचरणकमल-युगलोंकी लेशमात्र कृपाको प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही केवल आपकी महिमाके तत्त्वको जान सकता है; किन्तु जो चिरकालसे भी अनुमानके द्वारा शास्त्रोंका विचार करते हुए अन्वेषण करते हैं, उनमेंसे कोई भी उस तत्त्वको नहीं जान पाता॥ 84॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अहङ्कार चूर्ण होनेपर श्रीकृष्णके परमैश्वर्यके दर्शनसे उनके माहात्म्यको जानकर ब्रह्माने इस प्रकार स्तव किया— हे देव [तव महिमा सर्वत्र व्याप्तः], तथापि ते (तव) पदाम्बुजद्वय-प्रसादलेशानुगृहीतः (चरणकमलद्वयानुकम्पा- कणया-सुभगान्वितः) एव हि जनः भगवन्महिम्नः (भगवतस्तव महिम्नः ऐश्वर्यस्य) तत्त्वं जानाति; अन्यः (कृष्णप्रसादरहितः) एकः (कश्चित्) अपि चिरं (दीर्घकालं) विचिन्वन् (विचारयन्) अपि न च जानाति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥ भट्टाचार्यकी नास्तिकताको देखकर मानद होते हुए भी गोपीनाथके द्वारा उनका अनादर :— यद्यपि जगद्गुरु तुमि—शास्त्र-ज्ञानवान्। पृथिवीते नाहि पण्डित तोमार समान॥ 85॥ ईश्वरेर कृपा-लेश नाहिक तोमाते। अतएव ईश्वरतत्त्व ना पार जानिते॥ 86॥ तोमार नाहिक दोष, शास्त्रे एइ कहे। पाण्डित्याद्ये ईश्वरतत्त्व-ज्ञान कभु নহে॥” 87॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,—“यद्यपि आप जगद्गुरु हो तथा सभी शास्त्रोंका आपको ज्ञान है, पृथ्वीपर आपके समान और कोई पण्डित भी नहीं है, तथापि आपपर ईश्वरकी लेशमात्र कृपा भी नहीं है। इसलिये आप ईश्वरके तत्त्वको नहीं जान पा रहे हैं। इसमें आपका कोई दोष नहीं है। शास्त्र यह कहते हैं कि पाण्डित्यादिके द्वारा ईश्वरतत्त्वका ज्ञान कभी नहीं होता॥” 85-87॥ अनुभाष्य—कठोपनिषद् 1/2/23 वाँ मन्त्र— “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्॥” 9 वाँ मन्त्र— “नैषा तर्केण मतिरापनेया॥” अर्थात् “परमात्म-भगवद् वस्तु व्याख्यानके द्वारा प्राप्त नहीं होती; अपनी बुद्धिके बलपर भी प्राप्त नहीं होती; श्रुति-परम्पराको छोड़कर बहुत अधिक श्रवणके द्वारा भी प्राप्त नहीं होती। किन्तु भगवान् जिसको स्वीकार करते हैं अर्थात् जिसके प्रति प्रसन्न होते हैं, उसीको ही वे दिखलायी देते हैं अथवा प्राप्त होते हैं। भक्त ही भगवान्की कृपाके पात्र हैं, इसलिये उनपर ही कृपा करके वे उन्हें अपना दर्शन देते हैं। इस ब्रह्मका साक्षात्कार करानेवाली मतिका तर्कके द्वारा खण्डन करना कर्त्तव्य (उचित) नहीं है॥” 87॥ श्रीसार्वभौमका कुतर्क :— सार्वभौम कहे,—“आचार्य, कह सावधाने। तोमाते ईश्वर-कृपा इथे कि प्रमाणे॥” 88॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“आचार्य ! सावधानीपूर्वक बात कीजिये। आपपर भगवान्की कृपा है, इसका क्या प्रमाण है?”॥ 88॥ 174 ।
छठा अध्याय 6/89-94 ] श्रीगोपीनाथके द्वारा उनकी बातका खण्डन :- आचार्य कहे, — “वस्तु-विषये हय वस्तुज्ञान। वस्तुतत्त्व-ज्ञान हय कृपाते, — प्रमाण ॥ 89 ॥ तबु त' ईश्वर-ज्ञान ना हय तोमार। ईश्वरेर माया, — एइ बलि व्यवहार ॥ 91 ॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा, — “वस्तुके विषयमें जो ज्ञान है, उसे 'वस्तु-ज्ञान' कहते हैं और वस्तुका तत्त्व-ज्ञान ईश्वरकी कृपासे ही होता है, — यह प्रमाण है ॥ 89 ॥ अनुवाद—इनके शरीरमें ईश्वरके सभी लक्षण हैं। इनके महाप्रेमावेशके आपने दर्शन किये थे, किन्तु तब भी आपको इनमें ईश्वर-ज्ञान नहीं हुआ। आप इनकी लीलाको भी ईश्वरकी मायाका कार्य समझ रहे हैं॥ 90-91॥ अनुभाष्य—श्रीसार्वभौमने तर्कका सहारा लेकर अपने बहनोई श्रीगोपीनाथको कहा, — 'मेरे प्रति ईश्वरकी कृपा नहीं हुई है, यह सत्य है, किन्तु तुम्हारे ऊपर भगवान्की कृपा किस प्रकार हुई है, मुझे समझा दो।' उसके उत्तरमें आचार्य गोपीनाथने कहा, — 'वस्तु और वस्तुशक्ति 'एक' होनेके कारण वस्तु-विषयसे ही वस्तुका ज्ञान होता है। वस्तु-अखण्ड-ज्ञानमय, अद्वितीय है, किन्तु शक्ति—बहुत प्रकारकी है। अखण्ड अद्वयज्ञानमय वस्तु खण्डज्ञान अर्थात् प्राकृत ज्ञानसे नहीं जानी जा सकती, किन्तु वस्तु-विषयक अनुभूति होनेसे ही वस्तुका ज्ञान होता है। जैसे जलानेकी शक्तिके ज्ञानसे ही अग्निका ज्ञान होता है। अद्वयज्ञान-तत्त्ववस्तुकी उपलब्धिका प्रमाण—केवलमात्र भगवान्की कृपा है। (87 संख्याका अनुभाष्य देखें)। वे जिसको अपनी कृपाके द्वारा अपने स्वरूपका दर्शन करायेंगे, वे ही उनको समझ पायेंगे। वस्तुविषयके अतिरिक्त अन्य विषयोंका सहारा लेनेसे वस्तुका ज्ञान होनेकी सम्भावना नहीं है। कृपाके बिना उनका दर्शन या वस्तुज्ञान नहीं होता। जिन्होंने उनकी कृपाको प्राप्त किया है, वे ही उनके स्वरूपको समझकर कृपा-भिक्षुक हुए हैं एवं वे किसी भी और प्रकारके ज्ञानकी सहायतासे उनको समझनेकी चेष्टा नहीं करते ॥ 89 ॥ अनुभाष्य—आपने भगवान्के महाप्रेमावेशको देखा है। उन अलौकिक प्रेममय पुरुषको 'ईश्वर'के रूपमें नहीं जान पाकर भगवान्की वैसी लीलाको भी मायिक अर्थात् व्यावहारिक मात्र समझ रहे हो ॥ 91 ॥ बहिर्मुखका आवृत्त-दर्शनके कारण भगवद्दर्शन-अभाव :- देखिले ना देखे तारे बहिर्मुख जन।” शुनि' हासि' सार्वभौम बलिल वचन ॥ 92 ॥ अनुवाद—जो बहिर्मुख लोग हैं, वे ईश्वरको देखकर भी उन्हें देख अर्थात् पहचान नहीं पाते।” यह सुनकर श्रीसार्वभौम मुस्कुराते हुए कहने लगे ॥ 92 ॥ अनुभाष्य—जिनके हृदयमें मायासे अतीत श्रीकृष्णसेवाकी प्रवृत्ति उदित नहीं हुई है, उनका ऐसा माननेपर भी कि उन्होंने अपनी भोगमय कर्म-बुद्धिके द्वारा वस्तुविषयका (भगवान्का) अनुभव किया है या कर रहे हैं, वास्तवमें प्रेममय भगवद्-स्वरूप बाह्यविषय-ज्ञानके द्वारा दिखायी नहीं देता ॥ 92 ॥ प्रत्यक्ष ईश्वर-लक्षण देखकर भी ईश्वरमें अविश्वास—मायाका खेल :- इँहार शरीरे सब ईश्वर-लक्षण। महा-प्रेमावेश तुमि पाञाछ दर्शन ॥ 90 ॥ श्रीसार्वभौमकी भ्रमपूर्ण शास्त्रयुक्ति :- “इष्टगोष्ठी विचार करि, ना करिह रोष। शास्त्रदृष्ट्ये कहि, किछु ना लइह दोष ॥ 93 ॥ महाप्रभुके प्रति महाभागवत ज्ञान होनेपर भी 'ईश्वर' माननेमें अविश्वास :- महा-भागवत हय चैतन्य-गोसाञि। एइ कलिक़ाले विष्णुर अवतार नाइ ॥ 94 ॥ । 175
[ 6/93–100 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अतएव 'त्रियुग' करि' कहि विष्णुनाम। कलियुगे अवतार नाहि,–शास्त्रज्ञान ॥” 95 ॥ अनुवाद–“हम इष्टगोष्ठीमें विचार-विमर्श कर रहे हैं, इसलिये आप क्रोध मत करना। मैं शास्त्रोंके आधारपर ही अपनी बात कह रहा हूँ, इसमें मेरा कोई दोष मत लेना। श्रीचैतन्य गोसाईं निश्चय ही महाभागवत हैं, परन्तु वे ईश्वर नहीं हो सकते, क्योंकि कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता। कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता, इसलिये उनका एक नाम त्रियुग है,—ऐसा शास्त्र कहते हैं॥” 93–95 ॥ अनुभाष्य–'इष्टगोष्ठी'–अभीष्ट अर्थात् अभिलषित वस्तुको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे एकत्रित मण्डलीके बीचमें। 'त्रियुग'–(भाः 7/9/38)– “इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै– र्लोकान् विभावयसि हंसि जगत् प्रतीपान्। धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम्॥” अर्थात् “हे पुरुषोत्तम ! इस प्रकार आप मनुष्य, पशु-पक्षी, ऋषि, देवता और मत्स्य आदि अवतार लेकर लोकोंका पालन तथा विश्वके द्रोहियोंका संहार करते हैं। इन अवतारोंके द्वारा आप प्रत्येक युगमें उसके धर्मोंकी रक्षा करते हैं। कलियुगमें आप छिपकर गुप्तरूपसे ही रहते हैं, इसलिये आपका एक नाम 'त्रियुग' भी है। श्रीधर स्वामिपादकी टीका– “कलौ तु (वधरक्षणादिकं) न करोषि, यतस्तदा त्वं छन्नोऽभवः, अतस्त्रिष्वेव युगेष्वाविर्भावात् स एवम्भूतस्त्वं त्रियुग इति प्रसिद्धः।” अर्थात् “कलियुगमें आप असुरोंका वध और साधुओंकी रक्षाका कार्य प्रत्यक्ष रूपमें नहीं करते हैं अर्थात् अपने ऐश्वर्यको गोपन करके आप प्रकट होते हैं। अन्य तीन युगोंमें आपका साक्षात् आविर्भाव होता है, इसलिये आप त्रियुगके नामसे प्रसिद्ध हैं।” ॥ 93–95 ॥ गोपीनाथके द्वारा श्रीसार्वभौमके भ्रान्त सिद्धान्तका खण्डन और यथार्थ शास्त्र सिद्धान्तका प्रदर्शन :- शुनिय़ा आचार्य कहे दुःखी हञा मने। “शास्त्रज्ञ हञा तुमि कर अभिमाने ॥ 96 ॥ महाभारत और भारतार्थविनिर्णयमें श्रीमद्भागवत ही एकमात्र मुख्य प्रमाण :- भागवत-भारत, दुइ–शास्त्रेर प्रधान। सेइ दुइग्रन्थ-वाक्ये नाहि अवधान ॥ 97 ॥ अनुवाद–यह सुनकर श्रीगोपीनाथाचार्य मनमें दुखी होकर कहने लगे,–“आप शास्त्रज्ञ होनेका अभिमान करते हैं। भागवत और महाभारत–ये दोनों सभी शास्त्रोंमें प्रधान शास्त्र हैं, परन्तु उनके वाक्योंपर आपने ठीकसे विचार नहीं किया है॥ 96–97 ॥ अनुभाष्य–आदिलीला 3/49 संख्याका अनुभाष्य एवं 3/51 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97 ॥ इस कलियुगमें लीलावतारके नहीं रहनेपर भी स्वयंरूप अवतारीका आविर्भाव :- सेइ दुइ कहे कलिते साक्षात् अवतार। तुमि कह,–'कलिते नाहि विष्णुर प्रचार ॥' 98 ॥ कलियुगमें लीलावतारके नहीं होनेपर भी युगावतारका आविर्भाव :- कलिक़ाले लीलावतार ना करे भगवान्। अतएव 'त्रियुग' करि' कहि तार नाम ॥ 99 ॥ प्रतियुगे करेन कृष्ण युग-अवतार। तर्कनिष्ठ हृदय तोमार नाहिक विचार ॥ 100 ॥ अनुवाद–इन दोनों ग्रन्थोंमें ही कलियुगमें भगवान्के साक्षात् अवतारके विषयमें कहा गया है, परन्तु आप कह रहे हैं कि 'कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता।' कलियुगमें भगवान्का लीलावतार नहीं होता, इसलिये उनका एक नाम 'त्रियुग' है। श्रीकृष्ण प्रत्येक युगमें ही युगावतार ग्रहण करते हैं। आपका हृदय तर्कनिष्ठ है, इसलिये आप इस बातपर विचार नहीं कर पा रहे हैं॥ 98–100 ॥ 176 ।
छठा अध्याय 6/87-102 ] अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगोपीनाथने कहा,–'शास्त्रोंमें “लीलावतार कृष्णेर ना याय गणन। यही निरूपण किया गया है कि पाण्डित्यादि गुणोंसे प्रधान करिया कहि दिग्दर्शन। ईश्वरतत्त्वको नहीं जाना जा सकता, इसलिये इसमें मत्स्य-कूर्म-रघुनाथ-नृसिंह-वामन। तुम्हारा क्या दोष है? इस सिद्धान्तको सुनकर श्रीसार्वभौमने वराहादि लेखा याँर, ना याय गणन॥” कहा,–'आचार्य, आप थोड़ासा सावधान होकर बात अर्थात् “श्रीकृष्णके लीलावतारोंकी गणना नहीं की कहिये; आपके प्रति ईश्वरकी कृपा हुई है, इसका क्या जा सकती। उनमें से मुख्य-मुख्य अवतारोंका दिग्दर्शन प्रमाण है?' श्रीगोपीनाथने उत्तर दिया,–'परमतत्त्व-वस्तुके करा रहा हूँ। मत्स्य, कूर्म, श्रीरामचन्द्र, नृसिंह, वामन विषयमें जो ज्ञान है, उसको ही 'वस्तुज्ञान' कहते हैं और वराहादि अनेक लीलावतार हैं, जिनकी गणना और वस्तुतत्त्वज्ञान ही ईश्वरकी कृपाका प्रमाण है। नहीं की जा सकती।” आपने इनके महाप्रेमावेशरूपी ईश्वरके लक्षण देखे हैं, इसका अनुभाष्य और भाः 10/2/40 श्लोक देखें। तब भी ईश्वरकी मायाके द्वारा आच्छन्न (ढके) होकर लघुभागवतामृतमें पच्चीस लीलावतार कहे गये हैं— इनको 'ईश्वर' नहीं जान पाये। बहिर्मुख व्यक्ति उनको (1) चतुःसन, (2) नारद, (3) वराह, (4) मत्स्य, देखकर भी नहीं देखते हैं। ईश्वरकी कृपाका अभाव (5) यज्ञ, (6) नर-नारायण, (7) कपिल, (8) दत्तात्रेय, ही इसका एकमात्र कारण है।' श्रीसार्वभौमने हास्य करते (9) हयशीर्ष (हयग्रीव), (10) हंस, (11) पृश्निगर्भ, हुए कहा,–'केवल वितर्क छोड़कर अभिलाषित सत्य-विचार (12) ऋषभ, (13) पृथु, (14) नृसिंह, (15) कूर्म, करनेवालोंके मतानुसार, शास्त्रदृष्टिपूर्वक विचार करके (16) धन्वन्तरि, (17) मोहिनी, (18) वामन, कह रहा हूँ, सुनो;—ये चैतन्य गोसाईं परम भागवत हैं, (19) परशुराम, (20) राघवेन्द्र, (21) व्यास, क्योंकि कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता; इसलिये (22) बलराम, (23) कृष्ण, (24) बुद्ध और (25) विष्णुका एक नाम 'त्रियुग' है।' श्रीगोपीनाथने उत्तर कल्कि॥99॥ दिया,–'आप अपने आपको 'शास्त्रज्ञ' मानकर अभिमान चार युगोंमें चार वर्णोंका अवतार :— कर रहे हो, किन्तु शास्त्रोंमें प्रधान (मुख्य) जो 'भागवत' श्रीमद्भागवत (10/8/13) — और 'महाभारत' हैं, उन दोनों ग्रन्थोंके वचनोंकी ओर आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। आपका ध्यान नहीं है। उन दोनों ग्रन्थोंमें, कलियुगमें शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥101॥ साक्षात् अवतार है,–ऐसा सिद्धान्त स्थापित हुआ है। यह सत्य है कि कलियुगमें भगवान्का कोई लीलावतार अनुवाद—आपका यह पुत्र अन्य तीन युगोंमें नहीं होता; इसलिये उनको 'त्रियुग' कहा गया है। शुक्ल, रक्त एवं पीतवर्ण धारण करता है, परन्तु प्रत्येक युगमें श्रीकृष्णका जो युगावतार होता है, उसको वर्तमान द्वापरयुगमें इसने कृष्णवर्ण धारण किया है॥101॥ आप अपने तर्कनिष्ठ-हृदयसे समझ नहीं पा रहे अनुभाष्य—आदिलीला 3/36 संख्या देखें॥101॥ हो॥' 87-100॥ श्रीमद्भागवत (11/5/31-32)— अनुभाष्य—'लीलावतार'—विविध प्रकारकी विचित्रताओंसे इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीश्वरम्। युक्त, चेष्टारहित, नित्य नयी-नयी उल्लासमयी तरङ्गोंसे नानातन्त्रविधानेन कलावपि तथा शृणु॥102॥ उद्वेलित, अपनी इच्छानुसार विशेष लीला करनेवाले अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥102॥ अवतारको 'लीलावतार' कहते हैं। श्रीसनातन शिक्षामें—मध्यलीला, 20/297-298 संख्यामें— अनुभाष्य—विदेहराज निमिके प्रश्नके उत्तरमें । 177
[ 6/102-108 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकरभाजन-मुनि कलिकालके अवतार और उनके भजनकी प्रणालीका वर्णन कर रहे हैं— हे उर्वीश (पृथ्वीपते निमे), द्वापरे [भक्ताः] जगदीश्वरं (वासुदेवादि-चतुष्टयं) स्तुवन्ति (पञ्चरात्रादि-कथितेन अर्चन-विधिना पूजां कुर्वन्ति)। तथा कलौ अपि नानातान्त्रविधानेन (येन येन पञ्चरात्रादि-सात्वत-तन्त्राद्युक्त-विधिना) स्तुवन्ति, तत् [मत्तः] शृणु। श्लोक-भावानुवाद—हे राजन् निमि! द्वापरयुगमें लोग वासुदेवादि चतुर्व्यूहकी पञ्चरात्रादिमें वर्णित अर्चन-विधिके अनुसार पूजा करते हैं। तथा कलियुगमें भी लोग जिन-जिन पञ्चरात्रादि सात्वत-तन्त्रोंमें कही गयी विधियोंके द्वारा स्तुति करते हैं, वे अब श्रवण करो॥102॥ कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 103 ॥ अनुवाद—जिनके मुखमें सदैव कृष्ण-वर्ण अर्थात् श्रीकृष्णनाम और जिनकी कान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥103॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥103॥ महाभारत दानधर्म (149), विष्णुसहस्रनाम-स्तोत्र (92, 75) :— सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥ 104 ॥ अनुवाद—सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग, सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित। संन्यासाश्रमी, हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्तन-रूप महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान्, केवलाद्वैतवादी अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण। [प्रथम चार लक्षण महाप्रभुकी गृहस्थलीलामें और शेष चार लक्षण संन्यासलीलामें लक्षित होते हैं।] ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/49 संख्या देखें॥104॥ श्रीगोपीनाथके द्वारा श्रीभट्टाचार्यकी उपेक्षा और उपहास :— तोमार आगे एत कथार नाहि प्रयोजन। ऊषर-भूमिते येन बीजेर रोपण ॥ 105 ॥ भगवद्-कृपासे ही भगवान्की महिमाका ज्ञान :— तोमार उपरे ताँर कृपा यबे हबे। एसब सिद्धान्त तबे तुमिह कहिबे ॥ 106 ॥ अप्राकृत वस्तुके विषयमें कुतर्क-मायाजनित :— तोमार ये शिष्य कहे कुतर्क, नानावाद। इहार कि दोष—एइ मायार प्रसाद ॥ 107 ॥ अनुवाद—आपके सामने इन सब प्रमाणोंको कहनेका कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि बंजर भूमिमें बीज बोनेसे कोई लाभ नहीं होता। जब आपपर भगवान्की कृपा होगी, तब आप स्वयं इन सब सिद्धान्तोंको अपने मुखसे कहेंगे। आपके शिष्य जो अनेक प्रकारके कुतर्क करके अनेक वाद स्थापित कर रहे हैं, इसमें इनका कोई दोष नहीं—यह तो मायादेवीकी कृपा है॥ 105-107 ॥ श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्ति ही अक्षज विचारकोंमें मोह उत्पन्न करनेवाली :— श्रीमद्भागवत (6/4/31)— यच्छक्तयो वदतां वादिनां वै, विवाद-संवाद-भुवो-भवन्ति। कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं, तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने ॥ 108 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥108॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रजापति दक्षने कहा,―"वादियोंके सम्बन्धमें जिनकी सब शक्तियाँ विवाद और संवाद उत्पन्न करती हैं एवं उनके आत्ममोहको बार-बार उत्पन्न कर देती हैं, उन अनन्त-गुणस्वरूप भूमा-पुरुषको मैं नमस्कार करता हूँ॥108॥ अनुभाष्य—भगवान् श्रीहरिके प्रति प्रजापति दक्षका हंसगुह्यस्तव— 178 ।
छठा अध्याय 6/108-115 ] यच्छक्तयः (यस्य बहिरङ्गा-मायाविद्याः शक्तयः) वदतां वादिनां (पूर्वोत्तरपक्षाश्रितानां) विवादसंवादभूवः (विवादस्य क्वचित् संवादस्य च भुवः उत्पत्तिहेतवः) भवन्ति; एषां (विवादशीलानां) मुहुः (पुनः पुनः) आत्ममोहं कुर्वन्ति, तस्मै अनन्तगुणाय (सर्वशक्तिविशिष्टाय) भूम्ने (परमात्मने) नमः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 108 ॥ अधोक्षज-सेवक ब्राह्मण ही युक्त, अक्षज-ज्ञानी मायादास अयुक्त :- श्रीमद्भागवत (11/22/4)- युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा। मायां मदीयमुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥" 109 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्राह्मणोंने जो कहा है, वह सर्वत्र युक्त हुआ है; क्योंकि मेरी मायाका सहारा लेकर जो बोलते हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्घट नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान्की माया अघटनघटनपटीयसी (असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव करनेवाली) शक्ति है; इसलिये वह अनेक स्थानोंपर सत्यको गोपन करके मिथ्याको प्रमाणित कर सकती है। उसी मायाके आश्रयमें कपिल, गौतम, जैमिनी और कणाद आदि ब्राह्मणोंने बहुतसे असार वाक्योंको सार वाक्योंकी भाँति प्रकाशित किया है॥ 109 ॥ अनुभाष्य-तत्त्व संख्याके विषयमें उद्धवके द्वाराकी गयी जिज्ञासाके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,- यथा ब्राह्मणाः भाषन्ते (निर्णीतवन्तः), [तत्] च सर्वत्र युक्तं सन्ति। मदीयां मायां (अचिन्त्य-स्वरूपशक्तिं, न तु अविद्याम्) उद्गृह्य (स्वीकृत्य) वदतां (जनानां) किं दुर्घटं नु (प्रश्ने, न किमपीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 109 ॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा श्रीगोपीनाथके उपदेश अनसुना करना :- तबे भट्टाचार्य कहे,-"याह गोसाञिर स्थाने। आमार नामे गण-सहित कर निमन्त्रणे॥ 110 ॥ प्रसाद आनि' ताँरे कराह आगे भिक्षा। पश्चात् आसि' आमारे कराइह शिक्षा॥" 111 ॥ अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उनकी बातको अनसुना करके कहा,-"अभी श्रीचैतन्य गोसाईंके स्थानपर जाकर मेरी ओरसे उन्हें उनके सङ्गियों सहित मेरे घरपर प्रसाद पानेको निमन्त्रण दीजिये। भगवान् श्रीजगन्नाथका प्रसाद लाकर पहले उन्हें भोजन कराइये और उसके बादमें मुझे शिक्षा देना॥" 110-111 ॥ श्रीगोपीनाथकी अनेक प्रकारसे श्रीभट्टाचार्यका उपकार करनेकी चेष्टा :- आचार्य-भगिनीपति, श्यालक-भट्टाचार्य। निन्दा-स्तुति-हास्ये शिक्षा करा'न आचार्य॥ 112 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य बहनोई थे तथा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उनके साले थे। ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके कारण श्रीगोपीनाथाचार्य कभी निन्दाके द्वारा, कभी स्तुतिके द्वारा एवं कभी हास-परिहासके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको शिक्षा प्रदान कर रहे थे॥ 112 ॥ श्रीभट्टाचार्यके मायावाद-वाक्यको सुनकर श्रीमुकुन्दका क्रोध करना ही उनके प्रति कृपा :- आचार्येर सिद्धान्ते मुकुन्देर हैल सन्तोष। भट्टाचार्येर वाक्ये मने हैल दुःख-रोष॥ 113 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यके सिद्धान्तको सुनकर श्रीमुकुन्द दत्त बहुत सन्तुष्ट हुए, परन्तु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके वचनोंको सुनकर वे मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए तथा उनमें कुछ रोष भी भर आया॥ 113 ॥ महाप्रभुको निमन्त्रण :- गोसाञिर स्थाने आचार्य कैल आगमन। भट्टाचार्येर नामे ताँरे कैल निमन्त्रण॥ 114 ॥ श्रीमुकुन्द, श्रीगोपीनाथकी श्रीभट्टाचार्यके विरुद्ध निन्दा :- मुकुन्द-सहित कहे भट्टाचार्येर कथा। भट्टाचार्ये निन्दा करे, मने पाञा व्यथा॥ 115 ॥ । 179
[ 6/114-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्य महाप्रभुके पास गये और उन्हें श्रीभट्टाचार्यकी ओरसे निमन्त्रण दिया। श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीमुकुन्द दत्तके साथ मिलकर महाप्रभुको श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा कही गयी सभी बातोंको बतलाया और मनमें दुःख होनेके कारण उन्होंने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी निन्दा भी की॥114-115॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको सम्मान प्रदान :— शुनि' महाप्रभु कहे,—“ऐछे मत् कह। आमा प्रति भट्टाचार्येर हय अनुग्रह ॥ 116 ॥ आमार संन्यास-धर्म चाहेन राखिते। वात्सल्ये करुणा करेन, कि दोष इहाते ॥”117 ॥ अनुवाद—उनकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा, —“ऐसा मत कहो। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी मेरे ऊपर बहुत कृपा है। मेरे प्रति अपने हृदयमें वात्सल्यमय करुणाके कारण वे मेरे संन्यास-धर्मकी रक्षा करना चाहते हैं, तो इसमें क्या दोष है?”॥ 116-117 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौमके साथ श्रीजगन्नाथ दर्शन करनेके बाद उनके घरमें जाना :— आर दिन महाप्रभु भट्टाचार्य-सने। आनन्दे करिला जगन्नाथ-दरशने ॥ 118 ॥ भट्टाचार्य-सङ्गे ताँर मन्दिरे आइला। प्रभुरे आसन दिया आपने बसिला ॥ 119 ॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ आनन्दपूर्वक श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन किया। फिर वे श्रीभट्टाचार्यके साथ उनके घरपर आये। उन्होंने महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन प्रदान किया और स्वयं भी बैठ गये॥ 118-119 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुको वेदान्तका पढ़ाना और उपदेश देना :— वेदान्त पड़ाइते तबे आरम्भ करिला। स्नेह-भक्ति करि' किछु प्रभुरे कहिला ॥ 120 ॥ “वेदान्त-श्रवण, —एइ संन्यासीर धर्म। निरन्तर कर तुमि वेदान्त श्रवण ॥”121 ॥ अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको वेदान्त पढ़ाना आरम्भ किया। स्नेह-भक्तिके साथ वे महाप्रभुसे कहने लगे,—“वेदान्तका श्रवण करना ही संन्यासीका धर्म है, इसलिये आप निरन्तर वेदान्तका श्रवण कीजिये॥”120-121 ॥ अनुभाष्य—'वेदान्त'—यहाँ वेदान्तका तात्पर्य शङ्कराचार्यके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रका निर्विशेष-ब्रह्म-प्रतिपादक शारीरक भाष्य है। 'वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तः' [वेदान्तसूत्रके वाक्योंमें सदा आनन्द अनुभव करना चाहिये], यह संन्यासियोंका धर्म है॥ 121 ॥ महाप्रभुका दैन्य :— प्रभु कहे,—“मोरे तुमि कर अनुग्रह। सेइ से कर्त्तव्य, तुमि येइ मोरे कह ॥”122 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आपकी मेरे प्रति बहुत कृपा है, इसलिये आप मुझे जैसा कहेंगे, वैसा करना ही मेरा कर्तव्य है॥”122 ॥ श्रीसार्वभौमके मुखसे महाप्रभुका सात दिन तक वेदान्त श्रवण और मायावाद-भाष्यके श्रवणमें अनादर होनेके कारण मौनवृत्ति :— सप्तदिन पर्यन्त ऐछे करेन श्रवणे। भाल-मन्द नाहि कहे, बसि' मात्र सुने ॥ 123 ॥ अनुवाद—तब सात दिन तक महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे वेदान्त श्रवण किया। ठीक या गलत, उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, बैठकर मात्र श्रवण करते रहे॥ 123 ॥ आठवें दिन श्रीसार्वभौमकी उसके कारणकी जिज्ञासा :— अष्टम-दिवसे ताँरे पुछे सार्वभौम। “सातदिन कर तुमि वेदान्त-श्रवण ॥ 124 ॥ 180 ।
छठा अध्याय 6/124-134 ] भालमन्द नाहि कह, रह मौन धरि'। बुझ, कि ना बुझ,–इहा जानिते ना पारि ॥' 125 ॥ अनुवाद—तब आठवें दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे पूछा,—"सात दिनोंसे आप वेदान्तका श्रवण कर रहे हो। ठीक-गलत कुछ भी न कहकर केवल मौन धारण करके बैठे हो। इसलिये मैं यह जान नहीं पा रहा हूँ कि आप वेदान्त समझ भी रहें हैं या नहीं॥" 124-125 ॥ महाप्रभुके द्वारा दीनतापूर्वक मायावाद-भाष्यकी उपेक्षा :- प्रभु कहे,—"मूर्ख आमि, नाहि अध्ययन। तोमार आज्ञाते मात्र करिये श्रवण ॥ 126 ॥ संन्यासीर धर्म लागि' श्रवण मात्र करि। तुमि येइ अर्थ कर, बुझिते ना पारि॥" 127 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—"मैं मूर्ख हूँ, इसलिये मैं वेदान्त-सूत्रका अध्ययन नहीं करता। केवल आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही मैं सुन रहा हूँ। संन्यासीका धर्म पालन करनेके लिये मैं श्रवणमात्र ही करनेका प्रयास कर रहा हूँ। किन्तु आप वेदान्त-सूत्रोंकी जो व्याख्या कर रहे हैं, वह मुझे समझ नहीं आ रही॥" 126-127 ॥ भट्टाचार्यका महाप्रभुको अज्ञ समझकर उन्हें मौनका त्याग करके परिप्रश्न करनेका आदेश :- भट्टाचार्य कहे,—"ना बुझि', हेन-ज्ञान यार। बुझिबार लागि' सेह पुछे पुनर्बार ॥ 128 ॥ तुमि शुनि' शुनि' रह मौन-मात्र धरि'। हृदये कि आछे तोमार, बुझिते ना पारि ॥" 129 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—"जिसे यह ज्ञान होता है—'मैं समझ नहीं पा रहा हूँ', वह समझनेके लिये पुनः पुनः प्रश्न करता है। परन्तु आपने बार-बार सुनकर केवल मौन ही धारण कर रखा है। आपके हृदयमें क्या है, मैं उसे समझ नहीं पा रहा हूँ॥" 128-129 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौमकी मायावाद- भाष्य-व्याख्याका खण्डन :- प्रभु कहे,—"सूत्रेर् अर्थ बुझिये निर्मल। तोमार व्याख्या शुनि' मन हय त' विकल ॥ 130 ॥ मुख्य अभिधा-वृत्तिसे ब्रह्मसूत्रका अर्थ सहज, परन्तु गौण- लक्षणारूपी कल्पनाके आश्रयसे वह आवृत :- सूत्रेर् अर्थ-भाष्य कहे प्रकाशिया। भाष्य कह तुमि-सूत्रेर् अर्थ आच्छादिया ॥ 131 ॥ सूत्रेर् मुख्य अर्थ ना करह व्याख्यान। कल्पनार्थे तुमि ताहा कर आच्छादन ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"सूत्रोंके अर्थको तो मैं भलीभाँति समझ पा रहा हूँ, परन्तु आपकी व्याख्याको सुनकर मेरा मन क्षुब्ध हो रहा है। 'भाष्य' तो सूत्रोंके अर्थको प्रकाशित करता है, परन्तु आपके द्वारा कहे हुए 'भाष्य'से तो सूत्रोंका अर्थ आच्छादित हो रहा है। आपने सूत्रोंके मुख्य अर्थको न कहकर अपने कल्पित अर्थके द्वारा उनको आच्छादित कर दिया है॥ 130-132 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सूत्रका जो वास्तविक भाष्य होता है, वह सूत्रके अर्थको प्रकाशित करके बोलता है, किन्तु आप जो भाष्य कर रहे हैं, वह तो सूत्रके अर्थको ढक रहा है ॥ 131 ॥ अनुभाष्य—श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रोंका अभिधा-वृत्तिका आश्रय लेकर जो मुख्य अर्थ होता है, वह व्याख्या न करके सूत्रके अर्थको छिपाकर लक्षणाके द्वारा कल्पित अर्थ कर रहे हो ॥ 132 ॥ उपनिषद्-प्रतिपाद्य अर्थ ही सूत्राकारमें वेदान्तमें निबद्ध :- उपनिषद्-शब्दे येइ मुख्य अर्थ हय। सेइ अर्थ मुख्य,-व्याससूत्रे सब कय ॥ 133 ॥ मुख्यार्थ छाड़िया कर गौणार्थ कल्पना। 'अभिधा'-वृत्ति छाड़ि' कर शब्देर 'लक्षणा' ॥ 134 ॥ । 181
[ 6/133-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला शब्द अथवा वेद ही मुख्य प्रमाण- प्रमाणेर मध्ये श्रुति-प्रमाण-प्रधान। श्रुति ये मुख्यार्थ कहे, सेइ से प्रमाण॥ 135॥ दृष्टान्त :- जीवेर अस्थि-विष्ठा दुइ-शङ्ख-गोमय। श्रुति-वाक्ये सेइ दुइ महापवित्र हय॥ 136॥ गुरु-परम्पराके बिना इन्द्रियज्ञानसे वेदको जानना दुर्बोध :- स्वतःप्रमाण वेद सत्य येइ कय। 'लक्षणा' करिते स्वतःप्रामाण्य-हानि हय॥ 137॥ शङ्कर भाष्य-वेदान्त-विरुद्ध :- व्यास-सूत्रेरे अर्थ-यैछे सूर्येर किरण। स्वकल्पित भाष्य-मेघे करे आच्छादन॥ 138॥ वेद और सात्वतपुराणोंमें सविशेष ब्रह्म अथवा श्रीभगवान् ही उद्दिष्ट :- वेद-पुराणे कहे ब्रह्म निरूपण। सेइ ब्रह्म-बृहद्वस्तु, ईश्वर-लक्षण॥ 139॥ सच्चिदानन्दविग्रह निर्विशेष नहीं :- सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण स्वयं भगवान्। ताँरे निराकार करि' करह व्याख्यान॥ 140॥ 'निर्विशेष' अर्थमें प्राकृत-विशेष या वैचित्र्यका अभाव :- 'निर्विशेष' ताँरे कहे येइ श्रुतिगण। 'प्राकृत' निषेधि करे 'अप्राकृत' स्थापन॥ 141॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-141॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उपनिषद्के वाक्योंका जो मुख्य अर्थ है, उसका ही श्रीवेदव्यासने अपने द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रमें उल्लेख किया है। अर्थात् उसे मुख्य अर्थ ही जानना चाहिये। उसको छोड़कर जिस गौण अर्थकी कल्पना की जाती है और शब्दकी 'अभिधा-वृत्ति'को छोड़कर 'लक्षणावृत्ति'से जो अर्थ किया जाता है, वह अमङ्गलजनक होता है। 'प्रत्यक्ष', 'अनुमान', 'ऐतिह्य' और 'शब्द'-इन चारों प्रकारके प्रमाणोंमें, 'श्रुतिप्रमाण' अर्थात् शब्द-प्रमाण ही सबसे प्रधान है। श्रुति वाक्योंका जो मुख्य अर्थ है, वही प्रमाण है। देखो, पशुओंकी हड्डी और मल-बहुत ही अपवित्र है; किन्तु 'शङ्ख' और 'गोबर' उनमें गिने जानेपर भी श्रुतिवाक्योंके बलसे महापवित्र हुए हैं। वैदिक वाक्योंका अर्थ लक्षणा-वृत्तिके द्वारा करनेपर, उनको 'अनुमान'के अधीन बनाकर उनके स्वतःप्रमाणिकताको नष्ट करना हो जाता है। व्याससूत्रोंके अर्थ सूर्यकी किरणोंके समान देदीप्यमान हैं। मायावादियोंने अपने द्वारा कल्पित भाष्यरूपी-मेघोंके द्वारा उसको आच्छादित कर दिया हैं। वेद और उसके अनुगत पुराणसमूहने एकमात्र ब्रह्मका ही निरूपण किया है। वह ब्रह्म अपने बृहत्व-धर्मवशतः [अर्थात् असीम विस्तारके गुणोंके कारण] ईश्वर-लक्षणोंसे लक्षित होता है। पुनः, उन ईश्वरको उनके सर्वैश्वर्यकी परिपूर्णताके साथ देखनेपर, वही बृहद्-ब्रह्मवस्तु ही स्वयं भगवान् हो जाती है। इसलिये 'ब्रह्म' और 'ईश्वर'-ये भगवद्-तत्त्वके अन्तर्गत उनकी विशेष प्रतीति हैं। षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् सदैव परिपूर्ण 'श्री' अर्थात् रूपसे युक्त हैं, इसलिये वे नित्य सविशेष हैं; उनको 'निराकार' कहकर व्याख्या करनेसे वेदोंका अर्थ विकृत हो जाता है। जो सब श्रुतियाँ उन्हें 'निर्विशेष' कहकर व्याख्या करती हैं, वे केवल 'प्राकृत विशेष'का निषेध करके 'अप्राकृत विशेष' की स्थापना करती हैं। “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥” [पुरुषोत्तम भगवान्के किसी प्रकारके प्राकृत हाथ, पैरादि नहीं हैं। किन्तु वे अपनी अचिन्त्य शक्तिके बलसे अपने अप्राकृत पैरोंसे इतनी तीव्रतासे चल सकते हैं जो अन्य किसीके लिये सम्भव नहीं है। वे अपने अप्राकृत हाथोंसे सर्वत्र ही भक्तोंके द्वारा निवेदित वस्तुओंको ग्रहण करते हैं। वे अप्राकृत नेत्रोंसे सर्वत्र दर्शन करते हैं। वे अप्राकृत कानोंसे भक्तोंके द्वारा किये गये उनके नाम, रूप, गुणादिका कीर्तन सदा श्रवण करते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, तथापि उनके अप्राकृत स्वरूपको कोई प्राकृत व्यक्ति नहीं जान सकता। एकमात्र उनके ऐकान्तिक भक्त उनकी कृपासे 182 ।
छठा अध्याय 6/133-142 ] दिव्यज्ञान प्राप्त करके उनके अचिन्त्यनीय स्वरूपको जान सकते हैं।]—(श्वेताश्वतर उपनिषद् 3/19) आदि बहुतसी श्रुतियोंमें अप्राकृत-साकार-सच्चिदानन्दतत्त्वका वर्णन है॥ 133-141 ॥ अनुभाष्य—'उपनिषद्'—आदिलीला, 2/5 संख्याके अनुभाष्यमें अन्वय और आदिलीला 7/106 संख्याका अनुभाष्य एवं 7/108 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य और अनुभाष्य देखें। श्रील जीवगोस्वामीके तत्त्वसन्दर्भमें 10-11 संख्या और श्रीबलदेव विद्याभूषण-रचित टीका एवं “शास्त्रयोनित्वात्” (ब्रह्मसूत्र 1/1/3), “तर्काप्रतिष्ठानात्” (ब्रह्मसूत्र 2/1/11) एवं “श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्” (ब्रह्मसूत्र 2/1/27) आदि सूत्रोंके श्रीभाष्य, श्रीमाध्वभाष्य, श्रीनिम्बार्कभाष्य और श्रीबलदेव-कृत गोविन्दभाष्य देखें। श्रीजीव प्रभुने 'सर्वसम्वादिनी' में लिखा है,— “तथापि भ्रम-प्रमाद-विप्रलिप्सा-करणापाटव-दोषरहितवचनात्मकः शब्द एव मूलं प्रमाणम्। अन्येषां प्रायः पुरुष-भ्रमादि- दोषमयस्यान्यथा-प्रतीति-दर्शनेन प्रमाणं वा तदाभासो वेति पुरुषैर्निर्णतुमशक्यत्वात्, तस्य तदभावात्॥” अर्थात् “प्रत्यक्षादि दस प्रकारके प्रमाण विद्यमान रहनेपर भी भ्रमादि चार प्रकारके दोषोंसे रहित वचनात्मक 'शब्द' या श्रुति ही मूल प्रमाण है; अन्यान्य प्रमाणोंके विषयमें मनुष्योंके वाक्यादि प्रायः ही भ्रमादि दोषोंसे युक्त होनेके कारण उनके द्वारा अन्य प्रकारकी प्रतीति देखी जाती है, इसलिये अन्य नौ प्रमाण वास्तवमें प्रमाण हैं या फिर प्रमाणाभास हैं, उसका निर्णय नहीं किया जा सकता, किन्तु वास्तव-दर्शनमूलक होनेके कारण शब्द प्रमाणमें इस प्रकारकी आशङ्का नहीं है।” (ब्रह्मसूत्र 2/1/5)—'दृश्यते तु', इस सूत्रके भाष्यमें श्रीमन्मध्वाचार्यपादने इन 'भविष्यपुराण'के वचनोंको उद्धृत किया है— 'ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्। मूलरामायणञ्चैव 'वेद' इत्येव शब्दितः॥ पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः। स्वतःप्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चित् विचार्यते॥” अर्थात् “ऋक्, यजुः, साम और अथर्व, महाभारत, पञ्चरात्र और मूल-रामायणको 'वेद' कहा गया है। पण्डितगण जो सब वैष्णव अर्थात् सात्त्विक पुराण हैं, उन्हींको यहाँपर 'वेद'के रूपमें जानते हैं। इनके स्वतःप्रमाण-विषयमें किसी प्रकारका विचार (तर्क) नहीं चलता है॥” 133-137॥ सविशेष श्रीभगवान् ही श्रुतिका उद्दिष्ट विषय :— श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (6/67) में उद्धृत हयशीर्ष-पञ्चरात्रवचन— या या श्रुतिर्जल्पति निर्विशेषं सा साभिधत्ते सविशेषमेव। विचारयोगे सति हन्त तासां प्रायो बलीयः सविशेषमेव ॥ 142 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो जो श्रुति तत्त्ववस्तुको 'निर्विशेष' कहकर कल्पना करती है, वही-वही श्रुति अन्तमें सविशेष-तत्त्वको ही प्रतिपादित करती है। 'निर्विशेष' और 'सविशेष'—भगवान्के ये दोनों गुण ही नित्य हैं। इसका विचार करनेपर सविशेष-तत्त्व ही प्रबल हो जाता है; क्योंकि जगत्में सविशेष-तत्त्वका ही अनुभव होता है, निर्विशेष-तत्त्वका अनुभव नहीं होता ॥ 142 ॥ अनुभाष्य— या या श्रुतिः (वेदमन्त्रः) निर्विशेषं (ब्रह्मणः विशेषरहितभावं केवलचिन्मात्रं) जल्पति (प्रकाशयति), सा सा श्रुतिः सविशेषं (नामरूपगुणलीलादिरूपम्) एव अभिधत्ते (मुख्यया अभिधया वृत्त्या वदति); हन्त तासां (श्रुतीनां) विचारयोगे सति (सूक्ष्मानुशीलनेन) प्रायः (सर्वतोभावेन) सविशेषं एव वलीयः (वेद-वचनानां मुख्यतात्पर्यम्)। श्लोक-भावानुवाद—जो जो श्रुति तत्त्ववस्तुको केवल चिन्मात्र 'निर्विशेष' कहकर प्रकाश करती है, वही-वही श्रुति मुख्य अर्थात् अभिधा वृत्तिसे सविशेष-तत्त्वको ही । 183
[ 6/142-144 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कहती है। श्रुतियोंका सूक्ष्मरूपसे विचार करनेपर सब प्रकारसे सविशेष-तत्त्व ही वेदोंका मुख्य तात्पर्य दिखलायी देता है॥ 142 ॥ श्रीभगवान् ही सभी कारकोंकी उद्दिष्ट-वस्तु :- ब्रह्म हैते जन्मे विश्व, ब्रह्मेते जीवय। सेइ ब्रह्मे पुनरपि हुये याय लय॥ 143 ॥ ‘अपादान’, ‘करण’, ‘अधिकरण’—कारक तिन। भगवानेर सविशेषे एइ तिन चिह्न॥ 144 ॥ अनुवाद—ब्रह्मसे ही इस विश्वकी सृष्टि होती है, ब्रह्मसे ही विश्वकी स्थिति रहती है और इसी ब्रह्ममें यह विश्व प्रलयके समय लीन हो जाता है। ‘अपादान’, ‘करण’ तथा ‘अधिकरण’–ये तीन कारक ही भगवान्के सविशेष रूपके तीन चिह्न हैं॥ 143-144 ॥ अनुभाष्य—(ऐतःउः 1/1/1-2)— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत् किञ्चन मिषत्। स इमान् लोकानसृजत।” (श्वेःउः 4/9)— “छन्दांसि यज्ञाः क्रु भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। यस्मान् मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः॥” (तैःउःभृः 1अः)— “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म।” वारुणि-भृगुके द्वारा पिता वरुणसे ब्रह्मके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें वरुणके यह वचन हैं। इस मन्त्रमें ‘यतः’ (जिस ब्रह्मसे विश्वका उदय हुआ है)—अपादान-कारक है; ‘येन’ (जिस ब्रह्मके द्वारा विश्व पालित है)—करण-कारक है; ‘यत’ अर्थात् ‘यस्मिन्’ (जिस ब्रह्ममें विश्व प्रवेश करता है)—अधिकरण-कारक है। श्रीराघवेन्द्र-यति कृत टीका— “अन्नमयं प्राणमयं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं मनोमयं वाङ्मयं विज्ञानमयं आनन्दमयञ्च इत्येवं नामैकदेशे नामग्रहण-न्यायेन अयं निर्देशो ध्येयः। विज्ञानमयानन्दमय एवाप्युपलक्ष्यौ, एतेन ब्रह्मवल्ल्यां पञ्चरूपोक्ति-रूपलक्षणम्। चक्षुर्मय-वाङ्मय-श्रोत्रमया अपि ग्राह्या इत्युक्तं भवति। तथाह्युक्तं ‘वाधूल’-शाखायाम्— “तस्माद्वा एतस्मात् अन्न-रसमयात् अन्योऽन्तर आत्मा वाङ्मयः। तस्माद्वा एतस्माद्वाङ्मयात् अन्योऽन्तर आत्मा चक्षुर्मयः। तस्माद्वा एतस्माच्चक्षुर्मयात् अन्योऽन्तर आत्मा श्रोत्रमयः। चक्षुर्मयत्वादेस्तु पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतरितः।” इति ऐतरेयभाष्योक्तरीत्या पूर्णदर्शन-शक्तित्व-पूर्णश्रवणशक्तित्व-पूर्णवक्तृत्वशक्तिस्वरूपा वा। यत्प्रयन्ति प्रलये। यदभि—स्वेच्छया—संविशन्ति मुक्तौ, तद्विजिज्ञासस्व।” (भाः1/5/20)—“इदं हि विश्वं भगवानिवेत्तरो यतो जगत्स्थान-निरोधसम्भवाः।” अर्थात् (ऐतरेय उपनिषद्—) “सृष्टिके पूर्व एकमात्र परमेश्वर ही थे, उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। उन्होंने ही इन समस्त लोकोंकी सृष्टि की है।” (श्वेताश्वतर उपनिषद्—) “वेदसमूह, सभी यज्ञ, समस्त क्रतु, व्रतसमुदाय, यह विश्व और वेदोंमें उक्त अन्यान्य भूत एवं भविष्यत् जो कुछ है, सभीकी मायाके अधीश्वर परमात्माने सृष्टि की है—जिससे अन्य सभी जीव उस मायासे बद्ध होकर रह रहे हैं।” (तैत्तिरीय उपनिषद्—) “जिनसे ये समस्त जीव उत्पन्न हुए हैं, जिनके द्वारा ही उन सब जीवोंका पालन होता है, जिनमें धावित होकर जीव अन्तमें लीन होते हैं, उनको ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करो, वे ही ब्रह्म हैं।” (श्रीराघवेन्द्र यतिकृत टीका—) “नामके एकदेश-ग्रहणके द्वारा वही नाम ही गृहीत होता है—इस न्यायानुसारसे ‘अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनोवाचं’, इनके द्वारा अन्नरसमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोतमय, मनोमय, वाङ्मय, विज्ञानमय, आनन्दमय ब्रह्म इस क्रमसे ऐसे निर्देश चिन्तनीय है। (उनमें) विज्ञानमय, आनन्दमय ये दो उपलक्ष्य (प्रयोजनीय) हैं; इसी कारण ब्रह्मवल्लीमें कथित पाँचरूप (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय)-उक्ति उपलक्षण हैं। यहाँपर चक्षुर्मय, वाङ्मय, श्रोतमय भी ग्रहणीय कहे गये हैं। वह ‘वाधुल-शाखा’में दिखायी देता है, जैसे,—‘वह
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छठा अध्याय 6/143-147 ] इस अन्नरसमयसे भिन्न अन्य एक आत्मा वाङ्मय है। पहले मायाके प्रति दृष्टि-निक्षेप, उसके फलस्वरूप सृष्टि, वह इस वाङ्मयसे भिन्न अन्य एक आत्मा चक्षुर्मय है। इसलिये भगवान्की दृष्टि-दर्शनादि-अप्राकृत :- वह इस चक्षुर्मयसे भिन्न अन्य एक आत्मा श्रोतमय है। से काले नाहि जन्मे 'प्राकृत' मन-नयन। चक्षुर्मयत्व आदिका पूर्णदर्शनशक्तित्व होनेके कारण अतएव 'अप्राकृत' ब्रह्मोर नेत्र-मन॥ 146॥ चक्षुर्मय कहा गया है। अथवा ऐतरेय-भाष्यमें कथित रीतिके अनुसारसे पूर्णदर्शनशक्तित्व, पूर्णश्रवणशक्तित्व, अनुवाद-सृष्टिसे पहले 'प्राकृत' मन और नेत्रोंकी पूर्णवक्तृत्वशक्तिस्वरूप है। 'यत्प्रयन्ति' अर्थात् प्रलयकालमें उत्पत्ति ही नहीं हुई थी, इसलिये यह प्रमाणित होता है जीवगण जिनके प्रति (जिनकी ओर) गमन करते हैं। कि ब्रह्मके नेत्र और मन अप्राकृत हैं॥ 146 ॥ 'यदभिसंविशन्ति'-मुक्तगण स्वेच्छासे जिनमें सम्यक् प्रवेश अनुभाष्य-सृष्टि करनेके उद्देश्यसे प्राकृतशक्तिपर करते हैं, उनको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करो।" दृष्टिपात करनेसे पहले उन्होंने अप्राकृत नेत्रोंके द्वारा (श्रीमद्भागवतमें-) “यह विश्व भगवान्का अंशस्वरूप दृष्टिपात किया था। उस दर्शनके समय प्राकृत नेत्रोंकी है अर्थात् उनसे प्रपञ्च पृथक् नहीं है; परन्तु इस सृष्टि नहीं हुई थी, क्योंकि प्राकृत-सृष्टि यदि उससे प्रपञ्चसे भगवान् पृथक् हैं, जिनसे इस जगत्की पहले हुई होती, तो उनकी सृष्टि-प्रवृत्तिका उल्लेख सृष्टि-स्थिति-प्रलय होती है।" करनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। तब सविशेष-ब्रह्मका भाः (6/4/30) श्लोककी श्रीधर स्वामीकी टीका नित्य अप्राकृत मन था, जिसके द्वारा उन्होंने प्राकृत देखें॥ 143-144 ॥ सृष्टिका मनन किया था और उनके नित्य अप्राकृत नेत्र भी थे, जिनके द्वारा उन्होंने प्रकृति-शक्तिपर अद्वयज्ञान (एक) श्रीकृष्णसे अनेक प्रकाश दृष्टिपात किया था॥ 146॥ ही प्रत्यक् अथवा श्रौत सिद्धान्त है, विभुचित् या विष्णु-परतत्त्व श्रीकृष्ण ही भगवान् :- अनेकसे एकका सिद्धान्त-अश्रौत :- ब्रह्म-शब्दे कहे पूर्ण स्वयं भगवान्। भगवान् अनेक हैते यबे कैल मन। स्वयं भगवान् कृष्ण, -शास्त्रेर प्रमाण॥ 147 ॥ प्राकृत-शक्तिते तखन कैल विलोकन ॥ 145 ॥ अनुवाद-'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ पूर्ण स्वयं भगवान् है अनुवाद-भगवान्ने जब एकसे अनेक होनेकी और श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं,-यह शास्त्रोंका प्रमाण इच्छा की, तब उन्होंने प्राकृत शक्तिके ऊपर दृष्टिपात है॥ 147 ॥ किया॥ 145 ॥ अनुभाष्य-“शास्त्रयोनित्वात्” (ब्रः सूः 1/1/3) इस अनुभाष्य- (छाःउः 6ठा प्रः 2/3)- सूत्रके भाष्यमें श्रीमन्मध्वाचार्यपादने कहा है- “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।” “ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्। (तैःउः 2/6/1)- मूलरामायणञ्चैव शास्त्रमित्यभिधीयते॥ “सोऽकामयत् बहु स्यां प्रजायेयेति॥" यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम्। [(छाःउः)-उन सच्चिदानन्द भगवान्ने सङ्कल्प किया अतोऽन्यग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत्॥ इति स्कान्दे।” कि अनन्त चिद्-अचिन्मिश्र व्यष्टि जगत्रूपमें मैं ही अर्थात् ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद, महाभारत अनेक हो जाऊँ। (तैःउः) - उन सच्चिदानन्द भगवान्ने (पुराणसहित) सात्वत-तन्त्र, पञ्चरात्र और मूल रामायण-यही कामना की मैं अनेक हो जाऊँ] ॥ 145 ॥ 'शास्त्र'-शब्दसे कहे जाते हैं तथा इनके अनुकूल ग्रन्थ । 185