श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1030, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/124-134 ] भालमन्द नाहि कह, रह मौन धरि'। बुझ, कि ना बुझ,–इहा जानिते ना पारि ॥' 125 ॥ अनुवाद—तब आठवें दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे पूछा,—"सात दिनोंसे आप वेदान्तका श्रवण कर रहे हो। ठीक-गलत कुछ भी न कहकर केवल मौन धारण करके बैठे हो। इसलिये मैं यह जान नहीं पा रहा हूँ कि आप वेदान्त समझ भी रहें हैं या नहीं॥" 124-125 ॥ महाप्रभुके द्वारा दीनतापूर्वक मायावाद-भाष्यकी उपेक्षा :- प्रभु कहे,—"मूर्ख आमि, नाहि अध्ययन। तोमार आज्ञाते मात्र करिये श्रवण ॥ 126 ॥ संन्यासीर धर्म लागि' श्रवण मात्र करि। तुमि येइ अर्थ कर, बुझिते ना पारि॥" 127 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—"मैं मूर्ख हूँ, इसलिये मैं वेदान्त-सूत्रका अध्ययन नहीं करता। केवल आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही मैं सुन रहा हूँ। संन्यासीका धर्म पालन करनेके लिये मैं श्रवणमात्र ही करनेका प्रयास कर रहा हूँ। किन्तु आप वेदान्त-सूत्रोंकी जो व्याख्या कर रहे हैं, वह मुझे समझ नहीं आ रही॥" 126-127 ॥ भट्टाचार्यका महाप्रभुको अज्ञ समझकर उन्हें मौनका त्याग करके परिप्रश्न करनेका आदेश :- भट्टाचार्य कहे,—"ना बुझि', हेन-ज्ञान यार। बुझिबार लागि' सेह पुछे पुनर्बार ॥ 128 ॥ तुमि शुनि' शुनि' रह मौन-मात्र धरि'। हृदये कि आछे तोमार, बुझिते ना पारि ॥" 129 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—"जिसे यह ज्ञान होता है—'मैं समझ नहीं पा रहा हूँ', वह समझनेके लिये पुनः पुनः प्रश्न करता है। परन्तु आपने बार-बार सुनकर केवल मौन ही धारण कर रखा है। आपके हृदयमें क्या है, मैं उसे समझ नहीं पा रहा हूँ॥" 128-129 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौमकी मायावाद- भाष्य-व्याख्याका खण्डन :- प्रभु कहे,—"सूत्रेर् अर्थ बुझिये निर्मल। तोमार व्याख्या शुनि' मन हय त' विकल ॥ 130 ॥ मुख्य अभिधा-वृत्तिसे ब्रह्मसूत्रका अर्थ सहज, परन्तु गौण- लक्षणारूपी कल्पनाके आश्रयसे वह आवृत :- सूत्रेर् अर्थ-भाष्य कहे प्रकाशिया। भाष्य कह तुमि-सूत्रेर् अर्थ आच्छादिया ॥ 131 ॥ सूत्रेर् मुख्य अर्थ ना करह व्याख्यान। कल्पनार्थे तुमि ताहा कर आच्छादन ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"सूत्रोंके अर्थको तो मैं भलीभाँति समझ पा रहा हूँ, परन्तु आपकी व्याख्याको सुनकर मेरा मन क्षुब्ध हो रहा है। 'भाष्य' तो सूत्रोंके अर्थको प्रकाशित करता है, परन्तु आपके द्वारा कहे हुए 'भाष्य'से तो सूत्रोंका अर्थ आच्छादित हो रहा है। आपने सूत्रोंके मुख्य अर्थको न कहकर अपने कल्पित अर्थके द्वारा उनको आच्छादित कर दिया है॥ 130-132 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सूत्रका जो वास्तविक भाष्य होता है, वह सूत्रके अर्थको प्रकाशित करके बोलता है, किन्तु आप जो भाष्य कर रहे हैं, वह तो सूत्रके अर्थको ढक रहा है ॥ 131 ॥ अनुभाष्य—श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रोंका अभिधा-वृत्तिका आश्रय लेकर जो मुख्य अर्थ होता है, वह व्याख्या न करके सूत्रके अर्थको छिपाकर लक्षणाके द्वारा कल्पित अर्थ कर रहे हो ॥ 132 ॥ उपनिषद्-प्रतिपाद्य अर्थ ही सूत्राकारमें वेदान्तमें निबद्ध :- उपनिषद्-शब्दे येइ मुख्य अर्थ हय। सेइ अर्थ मुख्य,-व्याससूत्रे सब कय ॥ 133 ॥ मुख्यार्थ छाड़िया कर गौणार्थ कल्पना। 'अभिधा'-वृत्ति छाड़ि' कर शब्देर 'लक्षणा' ॥ 134 ॥ । 181