श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/133-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला शब्द अथवा वेद ही मुख्य प्रमाण- प्रमाणेर मध्ये श्रुति-प्रमाण-प्रधान। श्रुति ये मुख्यार्थ कहे, सेइ से प्रमाण॥ 135॥ दृष्टान्त :- जीवेर अस्थि-विष्ठा दुइ-शङ्ख-गोमय। श्रुति-वाक्ये सेइ दुइ महापवित्र हय॥ 136॥ गुरु-परम्पराके बिना इन्द्रियज्ञानसे वेदको जानना दुर्बोध :- स्वतःप्रमाण वेद सत्य येइ कय। 'लक्षणा' करिते स्वतःप्रामाण्य-हानि हय॥ 137॥ शङ्कर भाष्य-वेदान्त-विरुद्ध :- व्यास-सूत्रेरे अर्थ-यैछे सूर्येर किरण। स्वकल्पित भाष्य-मेघे करे आच्छादन॥ 138॥ वेद और सात्वतपुराणोंमें सविशेष ब्रह्म अथवा श्रीभगवान् ही उद्दिष्ट :- वेद-पुराणे कहे ब्रह्म निरूपण। सेइ ब्रह्म-बृहद्वस्तु, ईश्वर-लक्षण॥ 139॥ सच्चिदानन्दविग्रह निर्विशेष नहीं :- सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण स्वयं भगवान्। ताँरे निराकार करि' करह व्याख्यान॥ 140॥ 'निर्विशेष' अर्थमें प्राकृत-विशेष या वैचित्र्यका अभाव :- 'निर्विशेष' ताँरे कहे येइ श्रुतिगण। 'प्राकृत' निषेधि करे 'अप्राकृत' स्थापन॥ 141॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-141॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उपनिषद्के वाक्योंका जो मुख्य अर्थ है, उसका ही श्रीवेदव्यासने अपने द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रमें उल्लेख किया है। अर्थात् उसे मुख्य अर्थ ही जानना चाहिये। उसको छोड़कर जिस गौण अर्थकी कल्पना की जाती है और शब्दकी 'अभिधा-वृत्ति'को छोड़कर 'लक्षणावृत्ति'से जो अर्थ किया जाता है, वह अमङ्गलजनक होता है। 'प्रत्यक्ष', 'अनुमान', 'ऐतिह्य' और 'शब्द'-इन चारों प्रकारके प्रमाणोंमें, 'श्रुतिप्रमाण' अर्थात् शब्द-प्रमाण ही सबसे प्रधान है। श्रुति वाक्योंका जो मुख्य अर्थ है, वही प्रमाण है। देखो, पशुओंकी हड्डी और मल-बहुत ही अपवित्र है; किन्तु 'शङ्ख' और 'गोबर' उनमें गिने जानेपर भी श्रुतिवाक्योंके बलसे महापवित्र हुए हैं। वैदिक वाक्योंका अर्थ लक्षणा-वृत्तिके द्वारा करनेपर, उनको 'अनुमान'के अधीन बनाकर उनके स्वतःप्रमाणिकताको नष्ट करना हो जाता है। व्याससूत्रोंके अर्थ सूर्यकी किरणोंके समान देदीप्यमान हैं। मायावादियोंने अपने द्वारा कल्पित भाष्यरूपी-मेघोंके द्वारा उसको आच्छादित कर दिया हैं। वेद और उसके अनुगत पुराणसमूहने एकमात्र ब्रह्मका ही निरूपण किया है। वह ब्रह्म अपने बृहत्व-धर्मवशतः [अर्थात् असीम विस्तारके गुणोंके कारण] ईश्वर-लक्षणोंसे लक्षित होता है। पुनः, उन ईश्वरको उनके सर्वैश्वर्यकी परिपूर्णताके साथ देखनेपर, वही बृहद्-ब्रह्मवस्तु ही स्वयं भगवान् हो जाती है। इसलिये 'ब्रह्म' और 'ईश्वर'-ये भगवद्-तत्त्वके अन्तर्गत उनकी विशेष प्रतीति हैं। षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् सदैव परिपूर्ण 'श्री' अर्थात् रूपसे युक्त हैं, इसलिये वे नित्य सविशेष हैं; उनको 'निराकार' कहकर व्याख्या करनेसे वेदोंका अर्थ विकृत हो जाता है। जो सब श्रुतियाँ उन्हें 'निर्विशेष' कहकर व्याख्या करती हैं, वे केवल 'प्राकृत विशेष'का निषेध करके 'अप्राकृत विशेष' की स्थापना करती हैं। “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥” [पुरुषोत्तम भगवान्के किसी प्रकारके प्राकृत हाथ, पैरादि नहीं हैं। किन्तु वे अपनी अचिन्त्य शक्तिके बलसे अपने अप्राकृत पैरोंसे इतनी तीव्रतासे चल सकते हैं जो अन्य किसीके लिये सम्भव नहीं है। वे अपने अप्राकृत हाथोंसे सर्वत्र ही भक्तोंके द्वारा निवेदित वस्तुओंको ग्रहण करते हैं। वे अप्राकृत नेत्रोंसे सर्वत्र दर्शन करते हैं। वे अप्राकृत कानोंसे भक्तोंके द्वारा किये गये उनके नाम, रूप, गुणादिका कीर्तन सदा श्रवण करते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, तथापि उनके अप्राकृत स्वरूपको कोई प्राकृत व्यक्ति नहीं जान सकता। एकमात्र उनके ऐकान्तिक भक्त उनकी कृपासे 182 ।