भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1029, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1029

[ 6/114-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्य महाप्रभुके पास गये और उन्हें श्रीभट्टाचार्यकी ओरसे निमन्त्रण दिया। श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीमुकुन्द दत्तके साथ मिलकर महाप्रभुको श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा कही गयी सभी बातोंको बतलाया और मनमें दुःख होनेके कारण उन्होंने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी निन्दा भी की॥114-115॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको सम्मान प्रदान :— शुनि' महाप्रभु कहे,—“ऐछे मत् कह। आमा प्रति भट्टाचार्येर हय अनुग्रह ॥ 116 ॥ आमार संन्यास-धर्म चाहेन राखिते। वात्सल्ये करुणा करेन, कि दोष इहाते ॥”117 ॥ अनुवाद—उनकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा, —“ऐसा मत कहो। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी मेरे ऊपर बहुत कृपा है। मेरे प्रति अपने हृदयमें वात्सल्यमय करुणाके कारण वे मेरे संन्यास-धर्मकी रक्षा करना चाहते हैं, तो इसमें क्या दोष है?”॥ 116-117 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौमके साथ श्रीजगन्नाथ दर्शन करनेके बाद उनके घरमें जाना :— आर दिन महाप्रभु भट्टाचार्य-सने। आनन्दे करिला जगन्नाथ-दरशने ॥ 118 ॥ भट्टाचार्य-सङ्गे ताँर मन्दिरे आइला। प्रभुरे आसन दिया आपने बसिला ॥ 119 ॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ आनन्दपूर्वक श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन किया। फिर वे श्रीभट्टाचार्यके साथ उनके घरपर आये। उन्होंने महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन प्रदान किया और स्वयं भी बैठ गये॥ 118-119 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुको वेदान्तका पढ़ाना और उपदेश देना :— वेदान्त पड़ाइते तबे आरम्भ करिला। स्नेह-भक्ति करि' किछु प्रभुरे कहिला ॥ 120 ॥ “वेदान्त-श्रवण, —एइ संन्यासीर धर्म। निरन्तर कर तुमि वेदान्त श्रवण ॥”121 ॥ अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको वेदान्त पढ़ाना आरम्भ किया। स्नेह-भक्तिके साथ वे महाप्रभुसे कहने लगे,—“वेदान्तका श्रवण करना ही संन्यासीका धर्म है, इसलिये आप निरन्तर वेदान्तका श्रवण कीजिये॥”120-121 ॥ अनुभाष्य—'वेदान्त'—यहाँ वेदान्तका तात्पर्य शङ्कराचार्यके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रका निर्विशेष-ब्रह्म-प्रतिपादक शारीरक भाष्य है। 'वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तः' [वेदान्तसूत्रके वाक्योंमें सदा आनन्द अनुभव करना चाहिये], यह संन्यासियोंका धर्म है॥ 121 ॥ महाप्रभुका दैन्य :— प्रभु कहे,—“मोरे तुमि कर अनुग्रह। सेइ से कर्त्तव्य, तुमि येइ मोरे कह ॥”122 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आपकी मेरे प्रति बहुत कृपा है, इसलिये आप मुझे जैसा कहेंगे, वैसा करना ही मेरा कर्तव्य है॥”122 ॥ श्रीसार्वभौमके मुखसे महाप्रभुका सात दिन तक वेदान्त श्रवण और मायावाद-भाष्यके श्रवणमें अनादर होनेके कारण मौनवृत्ति :— सप्तदिन पर्यन्त ऐछे करेन श्रवणे। भाल-मन्द नाहि कहे, बसि' मात्र सुने ॥ 123 ॥ अनुवाद—तब सात दिन तक महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे वेदान्त श्रवण किया। ठीक या गलत, उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, बैठकर मात्र श्रवण करते रहे॥ 123 ॥ आठवें दिन श्रीसार्वभौमकी उसके कारणकी जिज्ञासा :— अष्टम-दिवसे ताँरे पुछे सार्वभौम। “सातदिन कर तुमि वेदान्त-श्रवण ॥ 124 ॥ 180 ।