श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/93–100 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अतएव 'त्रियुग' करि' कहि विष्णुनाम। कलियुगे अवतार नाहि,–शास्त्रज्ञान ॥” 95 ॥ अनुवाद–“हम इष्टगोष्ठीमें विचार-विमर्श कर रहे हैं, इसलिये आप क्रोध मत करना। मैं शास्त्रोंके आधारपर ही अपनी बात कह रहा हूँ, इसमें मेरा कोई दोष मत लेना। श्रीचैतन्य गोसाईं निश्चय ही महाभागवत हैं, परन्तु वे ईश्वर नहीं हो सकते, क्योंकि कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता। कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता, इसलिये उनका एक नाम त्रियुग है,—ऐसा शास्त्र कहते हैं॥” 93–95 ॥ अनुभाष्य–'इष्टगोष्ठी'–अभीष्ट अर्थात् अभिलषित वस्तुको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे एकत्रित मण्डलीके बीचमें। 'त्रियुग'–(भाः 7/9/38)– “इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै– र्लोकान् विभावयसि हंसि जगत् प्रतीपान्। धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम्॥” अर्थात् “हे पुरुषोत्तम ! इस प्रकार आप मनुष्य, पशु-पक्षी, ऋषि, देवता और मत्स्य आदि अवतार लेकर लोकोंका पालन तथा विश्वके द्रोहियोंका संहार करते हैं। इन अवतारोंके द्वारा आप प्रत्येक युगमें उसके धर्मोंकी रक्षा करते हैं। कलियुगमें आप छिपकर गुप्तरूपसे ही रहते हैं, इसलिये आपका एक नाम 'त्रियुग' भी है। श्रीधर स्वामिपादकी टीका– “कलौ तु (वधरक्षणादिकं) न करोषि, यतस्तदा त्वं छन्नोऽभवः, अतस्त्रिष्वेव युगेष्वाविर्भावात् स एवम्भूतस्त्वं त्रियुग इति प्रसिद्धः।” अर्थात् “कलियुगमें आप असुरोंका वध और साधुओंकी रक्षाका कार्य प्रत्यक्ष रूपमें नहीं करते हैं अर्थात् अपने ऐश्वर्यको गोपन करके आप प्रकट होते हैं। अन्य तीन युगोंमें आपका साक्षात् आविर्भाव होता है, इसलिये आप त्रियुगके नामसे प्रसिद्ध हैं।” ॥ 93–95 ॥ गोपीनाथके द्वारा श्रीसार्वभौमके भ्रान्त सिद्धान्तका खण्डन और यथार्थ शास्त्र सिद्धान्तका प्रदर्शन :- शुनिय़ा आचार्य कहे दुःखी हञा मने। “शास्त्रज्ञ हञा तुमि कर अभिमाने ॥ 96 ॥ महाभारत और भारतार्थविनिर्णयमें श्रीमद्भागवत ही एकमात्र मुख्य प्रमाण :- भागवत-भारत, दुइ–शास्त्रेर प्रधान। सेइ दुइग्रन्थ-वाक्ये नाहि अवधान ॥ 97 ॥ अनुवाद–यह सुनकर श्रीगोपीनाथाचार्य मनमें दुखी होकर कहने लगे,–“आप शास्त्रज्ञ होनेका अभिमान करते हैं। भागवत और महाभारत–ये दोनों सभी शास्त्रोंमें प्रधान शास्त्र हैं, परन्तु उनके वाक्योंपर आपने ठीकसे विचार नहीं किया है॥ 96–97 ॥ अनुभाष्य–आदिलीला 3/49 संख्याका अनुभाष्य एवं 3/51 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97 ॥ इस कलियुगमें लीलावतारके नहीं रहनेपर भी स्वयंरूप अवतारीका आविर्भाव :- सेइ दुइ कहे कलिते साक्षात् अवतार। तुमि कह,–'कलिते नाहि विष्णुर प्रचार ॥' 98 ॥ कलियुगमें लीलावतारके नहीं होनेपर भी युगावतारका आविर्भाव :- कलिक़ाले लीलावतार ना करे भगवान्। अतएव 'त्रियुग' करि' कहि तार नाम ॥ 99 ॥ प्रतियुगे करेन कृष्ण युग-अवतार। तर्कनिष्ठ हृदय तोमार नाहिक विचार ॥ 100 ॥ अनुवाद–इन दोनों ग्रन्थोंमें ही कलियुगमें भगवान्के साक्षात् अवतारके विषयमें कहा गया है, परन्तु आप कह रहे हैं कि 'कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता।' कलियुगमें भगवान्का लीलावतार नहीं होता, इसलिये उनका एक नाम 'त्रियुग' है। श्रीकृष्ण प्रत्येक युगमें ही युगावतार ग्रहण करते हैं। आपका हृदय तर्कनिष्ठ है, इसलिये आप इस बातपर विचार नहीं कर पा रहे हैं॥ 98–100 ॥ 176 ।