भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1026

छठा अध्याय 6/87-102 ] अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगोपीनाथने कहा,–'शास्त्रोंमें “लीलावतार कृष्णेर ना याय गणन। यही निरूपण किया गया है कि पाण्डित्यादि गुणोंसे प्रधान करिया कहि दिग्दर्शन। ईश्वरतत्त्वको नहीं जाना जा सकता, इसलिये इसमें मत्स्य-कूर्म-रघुनाथ-नृसिंह-वामन। तुम्हारा क्या दोष है? इस सिद्धान्तको सुनकर श्रीसार्वभौमने वराहादि लेखा याँर, ना याय गणन॥” कहा,–'आचार्य, आप थोड़ासा सावधान होकर बात अर्थात् “श्रीकृष्णके लीलावतारोंकी गणना नहीं की कहिये; आपके प्रति ईश्वरकी कृपा हुई है, इसका क्या जा सकती। उनमें से मुख्य-मुख्य अवतारोंका दिग्दर्शन प्रमाण है?' श्रीगोपीनाथने उत्तर दिया,–'परमतत्त्व-वस्तुके करा रहा हूँ। मत्स्य, कूर्म, श्रीरामचन्द्र, नृसिंह, वामन विषयमें जो ज्ञान है, उसको ही 'वस्तुज्ञान' कहते हैं और वराहादि अनेक लीलावतार हैं, जिनकी गणना और वस्तुतत्त्वज्ञान ही ईश्वरकी कृपाका प्रमाण है। नहीं की जा सकती।” आपने इनके महाप्रेमावेशरूपी ईश्वरके लक्षण देखे हैं, इसका अनुभाष्य और भाः 10/2/40 श्लोक देखें। तब भी ईश्वरकी मायाके द्वारा आच्छन्न (ढके) होकर लघुभागवतामृतमें पच्चीस लीलावतार कहे गये हैं— इनको 'ईश्वर' नहीं जान पाये। बहिर्मुख व्यक्ति उनको (1) चतुःसन, (2) नारद, (3) वराह, (4) मत्स्य, देखकर भी नहीं देखते हैं। ईश्वरकी कृपाका अभाव (5) यज्ञ, (6) नर-नारायण, (7) कपिल, (8) दत्तात्रेय, ही इसका एकमात्र कारण है।' श्रीसार्वभौमने हास्य करते (9) हयशीर्ष (हयग्रीव), (10) हंस, (11) पृश्निगर्भ, हुए कहा,–'केवल वितर्क छोड़कर अभिलाषित सत्य-विचार (12) ऋषभ, (13) पृथु, (14) नृसिंह, (15) कूर्म, करनेवालोंके मतानुसार, शास्त्रदृष्टिपूर्वक विचार करके (16) धन्वन्तरि, (17) मोहिनी, (18) वामन, कह रहा हूँ, सुनो;—ये चैतन्य गोसाईं परम भागवत हैं, (19) परशुराम, (20) राघवेन्द्र, (21) व्यास, क्योंकि कलियुगमें विष्णुका अवतार नहीं होता; इसलिये (22) बलराम, (23) कृष्ण, (24) बुद्ध और (25) विष्णुका एक नाम 'त्रियुग' है।' श्रीगोपीनाथने उत्तर कल्कि॥99॥ दिया,–'आप अपने आपको 'शास्त्रज्ञ' मानकर अभिमान चार युगोंमें चार वर्णोंका अवतार :— कर रहे हो, किन्तु शास्त्रोंमें प्रधान (मुख्य) जो 'भागवत' श्रीमद्भागवत (10/8/13) — और 'महाभारत' हैं, उन दोनों ग्रन्थोंके वचनोंकी ओर आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। आपका ध्यान नहीं है। उन दोनों ग्रन्थोंमें, कलियुगमें शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥101॥ साक्षात् अवतार है,–ऐसा सिद्धान्त स्थापित हुआ है। यह सत्य है कि कलियुगमें भगवान्‌का कोई लीलावतार अनुवाद—आपका यह पुत्र अन्य तीन युगोंमें नहीं होता; इसलिये उनको 'त्रियुग' कहा गया है। शुक्ल, रक्त एवं पीतवर्ण धारण करता है, परन्तु प्रत्येक युगमें श्रीकृष्णका जो युगावतार होता है, उसको वर्तमान द्वापरयुगमें इसने कृष्णवर्ण धारण किया है॥101॥ आप अपने तर्कनिष्ठ-हृदयसे समझ नहीं पा रहे अनुभाष्य—आदिलीला 3/36 संख्या देखें॥101॥ हो॥' 87-100॥ श्रीमद्भागवत (11/5/31-32)— अनुभाष्य—'लीलावतार'—विविध प्रकारकी विचित्रताओंसे इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीश्वरम्। युक्त, चेष्टारहित, नित्य नयी-नयी उल्लासमयी तरङ्गोंसे नानातन्त्रविधानेन कलावपि तथा शृणु॥102॥ उद्वेलित, अपनी इच्छानुसार विशेष लीला करनेवाले अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥102॥ अवतारको 'लीलावतार' कहते हैं। श्रीसनातन शिक्षामें—मध्यलीला, 20/297-298 संख्यामें— अनुभाष्य—विदेहराज निमिके प्रश्नके उत्तरमें । 177