भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1024, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1024

छठा अध्याय 6/89-94 ] श्रीगोपीनाथके द्वारा उनकी बातका खण्डन :- आचार्य कहे, — “वस्तु-विषये हय वस्तुज्ञान। वस्तुतत्त्व-ज्ञान हय कृपाते, — प्रमाण ॥ 89 ॥ तबु त' ईश्वर-ज्ञान ना हय तोमार। ईश्वरेर माया, — एइ बलि व्यवहार ॥ 91 ॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा, — “वस्तुके विषयमें जो ज्ञान है, उसे 'वस्तु-ज्ञान' कहते हैं और वस्तुका तत्त्व-ज्ञान ईश्वरकी कृपासे ही होता है, — यह प्रमाण है ॥ 89 ॥ अनुवाद—इनके शरीरमें ईश्वरके सभी लक्षण हैं। इनके महाप्रेमावेशके आपने दर्शन किये थे, किन्तु तब भी आपको इनमें ईश्वर-ज्ञान नहीं हुआ। आप इनकी लीलाको भी ईश्वरकी मायाका कार्य समझ रहे हैं॥ 90-91॥ अनुभाष्य—श्रीसार्वभौमने तर्कका सहारा लेकर अपने बहनोई श्रीगोपीनाथको कहा, — 'मेरे प्रति ईश्वरकी कृपा नहीं हुई है, यह सत्य है, किन्तु तुम्हारे ऊपर भगवान्की कृपा किस प्रकार हुई है, मुझे समझा दो।' उसके उत्तरमें आचार्य गोपीनाथने कहा, — 'वस्तु और वस्तुशक्ति 'एक' होनेके कारण वस्तु-विषयसे ही वस्तुका ज्ञान होता है। वस्तु-अखण्ड-ज्ञानमय, अद्वितीय है, किन्तु शक्ति—बहुत प्रकारकी है। अखण्ड अद्वयज्ञानमय वस्तु खण्डज्ञान अर्थात् प्राकृत ज्ञानसे नहीं जानी जा सकती, किन्तु वस्तु-विषयक अनुभूति होनेसे ही वस्तुका ज्ञान होता है। जैसे जलानेकी शक्तिके ज्ञानसे ही अग्निका ज्ञान होता है। अद्वयज्ञान-तत्त्ववस्तुकी उपलब्धिका प्रमाण—केवलमात्र भगवान्की कृपा है। (87 संख्याका अनुभाष्य देखें)। वे जिसको अपनी कृपाके द्वारा अपने स्वरूपका दर्शन करायेंगे, वे ही उनको समझ पायेंगे। वस्तुविषयके अतिरिक्त अन्य विषयोंका सहारा लेनेसे वस्तुका ज्ञान होनेकी सम्भावना नहीं है। कृपाके बिना उनका दर्शन या वस्तुज्ञान नहीं होता। जिन्होंने उनकी कृपाको प्राप्त किया है, वे ही उनके स्वरूपको समझकर कृपा-भिक्षुक हुए हैं एवं वे किसी भी और प्रकारके ज्ञानकी सहायतासे उनको समझनेकी चेष्टा नहीं करते ॥ 89 ॥ अनुभाष्य—आपने भगवान्के महाप्रेमावेशको देखा है। उन अलौकिक प्रेममय पुरुषको 'ईश्वर'के रूपमें नहीं जान पाकर भगवान्की वैसी लीलाको भी मायिक अर्थात् व्यावहारिक मात्र समझ रहे हो ॥ 91 ॥ बहिर्मुखका आवृत्त-दर्शनके कारण भगवद्दर्शन-अभाव :- देखिले ना देखे तारे बहिर्मुख जन।” शुनि' हासि' सार्वभौम बलिल वचन ॥ 92 ॥ अनुवाद—जो बहिर्मुख लोग हैं, वे ईश्वरको देखकर भी उन्हें देख अर्थात् पहचान नहीं पाते।” यह सुनकर श्रीसार्वभौम मुस्कुराते हुए कहने लगे ॥ 92 ॥ अनुभाष्य—जिनके हृदयमें मायासे अतीत श्रीकृष्णसेवाकी प्रवृत्ति उदित नहीं हुई है, उनका ऐसा माननेपर भी कि उन्होंने अपनी भोगमय कर्म-बुद्धिके द्वारा वस्तुविषयका (भगवान्का) अनुभव किया है या कर रहे हैं, वास्तवमें प्रेममय भगवद्-स्वरूप बाह्यविषय-ज्ञानके द्वारा दिखायी नहीं देता ॥ 92 ॥ प्रत्यक्ष ईश्वर-लक्षण देखकर भी ईश्वरमें अविश्वास—मायाका खेल :- इँहार शरीरे सब ईश्वर-लक्षण। महा-प्रेमावेश तुमि पाञाछ दर्शन ॥ 90 ॥ श्रीसार्वभौमकी भ्रमपूर्ण शास्त्रयुक्ति :- “इष्टगोष्ठी विचार करि, ना करिह रोष। शास्त्रदृष्ट्ये कहि, किछु ना लइह दोष ॥ 93 ॥ महाप्रभुके प्रति महाभागवत ज्ञान होनेपर भी 'ईश्वर' माननेमें अविश्वास :- महा-भागवत हय चैतन्य-गोसाञि। एइ कलिक़ाले विष्णुर अवतार नाइ ॥ 94 ॥ । 175

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