श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/78-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दिया,—‘ईश्वरतत्त्वको जाननेके लिये अनुमान प्रमाणके रूपमें कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि ईश्वरकी कृपाके बिना कोई भी उनको नहीं जान सकता॥' 78-83॥ कृपाके बिना केवल ज्ञानमार्गसे भगवान् अगोचर :— श्रीमद्भागवत (10/14/29)— तथापि ते देव पदाम्बुजद्वय- प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि। जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ 84॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव, आपके श्रीचरणकमल-युगलोंकी लेशमात्र कृपाको प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही केवल आपकी महिमाके तत्त्वको जान सकता है; किन्तु जो चिरकालसे भी अनुमानके द्वारा शास्त्रोंका विचार करते हुए अन्वेषण करते हैं, उनमेंसे कोई भी उस तत्त्वको नहीं जान पाता॥ 84॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अहङ्कार चूर्ण होनेपर श्रीकृष्णके परमैश्वर्यके दर्शनसे उनके माहात्म्यको जानकर ब्रह्माने इस प्रकार स्तव किया— हे देव [तव महिमा सर्वत्र व्याप्तः], तथापि ते (तव) पदाम्बुजद्वय-प्रसादलेशानुगृहीतः (चरणकमलद्वयानुकम्पा- कणया-सुभगान्वितः) एव हि जनः भगवन्महिम्नः (भगवतस्तव महिम्नः ऐश्वर्यस्य) तत्त्वं जानाति; अन्यः (कृष्णप्रसादरहितः) एकः (कश्चित्) अपि चिरं (दीर्घकालं) विचिन्वन् (विचारयन्) अपि न च जानाति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥ भट्टाचार्यकी नास्तिकताको देखकर मानद होते हुए भी गोपीनाथके द्वारा उनका अनादर :— यद्यपि जगद्गुरु तुमि—शास्त्र-ज्ञानवान्। पृथिवीते नाहि पण्डित तोमार समान॥ 85॥ ईश्वरेर कृपा-लेश नाहिक तोमाते। अतएव ईश्वरतत्त्व ना पार जानिते॥ 86॥ तोमार नाहिक दोष, शास्त्रे एइ कहे। पाण्डित्याद्ये ईश्वरतत्त्व-ज्ञान कभु নহে॥” 87॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,—“यद्यपि आप जगद्गुरु हो तथा सभी शास्त्रोंका आपको ज्ञान है, पृथ्वीपर आपके समान और कोई पण्डित भी नहीं है, तथापि आपपर ईश्वरकी लेशमात्र कृपा भी नहीं है। इसलिये आप ईश्वरके तत्त्वको नहीं जान पा रहे हैं। इसमें आपका कोई दोष नहीं है। शास्त्र यह कहते हैं कि पाण्डित्यादिके द्वारा ईश्वरतत्त्वका ज्ञान कभी नहीं होता॥” 85-87॥ अनुभाष्य—कठोपनिषद् 1/2/23 वाँ मन्त्र— “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्॥” 9 वाँ मन्त्र— “नैषा तर्केण मतिरापनेया॥” अर्थात् “परमात्म-भगवद् वस्तु व्याख्यानके द्वारा प्राप्त नहीं होती; अपनी बुद्धिके बलपर भी प्राप्त नहीं होती; श्रुति-परम्पराको छोड़कर बहुत अधिक श्रवणके द्वारा भी प्राप्त नहीं होती। किन्तु भगवान् जिसको स्वीकार करते हैं अर्थात् जिसके प्रति प्रसन्न होते हैं, उसीको ही वे दिखलायी देते हैं अथवा प्राप्त होते हैं। भक्त ही भगवान्की कृपाके पात्र हैं, इसलिये उनपर ही कृपा करके वे उन्हें अपना दर्शन देते हैं। इस ब्रह्मका साक्षात्कार करानेवाली मतिका तर्कके द्वारा खण्डन करना कर्त्तव्य (उचित) नहीं है॥” 87॥ श्रीसार्वभौमका कुतर्क :— सार्वभौम कहे,—“आचार्य, कह सावधाने। तोमाते ईश्वर-कृपा इथे कि प्रमाणे॥” 88॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“आचार्य ! सावधानीपूर्वक बात कीजिये। आपपर भगवान्की कृपा है, इसका क्या प्रमाण है?”॥ 88॥ 174 ।