भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1022

छठा अध्याय 6/74-83 ] रहनेसे 'सरस्वती' संन्यासियोंकी भाँति उच्च सम्प्रदायके विचारसे 'भारती' संन्यासियोंकी मध्यमता और 'पुरी' संन्यासियोंकी कनिष्ठता सिद्ध है॥ 74-76 ॥ महाप्रभुके प्रति शासन-वाणीको सुनकर दोनों भक्तोंको दुःख :- शुनि' गोपीनाथ मुकुन्द, दुँहे दुःखी हैला। गोपीनाथाचार्य किछु कहिते लागिला ॥ 77 ॥ श्रीसार्वभौमके अज्ञानको देखकर गोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी महिमाका कीर्तन :- “भट्टाचार्य, तुमि इँहार ना जान महिमा। भगवत्ता-लक्षणेर इँहातेइ सीमा ॥ 78 ॥ ताहाते विख्यात इँहो परम-ईश्वर। अज्ञ-स्थाने किछु नहे विज्ञेर गोचर ॥" 79 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बात सुनकर श्रीगोपीनाथाचार्य और श्रीमुकुन्द दत्त, दोनों बहुत दुःखी हुए। श्रीगोपीनाथाचार्य कुछ कहने लगे, - “भट्टाचार्य ! आप इनकी महिमा नहीं जानते। इनमें भगवत्ताके समस्त लक्षण परम सीमा तक विराजमान हैं। इसलिये ये परम-ईश्वरके रूपमें विख्यात हैं। इस विषयमें विज्ञ व्यक्ति जिन सिद्धान्तोंको जानते हैं, उन्हें अज्ञ व्यक्तियोंके द्वारा समझना बहुत कठिन है॥" 77-79 ॥ तर्कपन्थी और श्रौतपन्थीके विचार; तर्कपन्थाके द्वारा भगवान् अलभ्य और श्रौतपन्थाके द्वारा सुलभ :- शिष्यगण कहे, - “ईश्वर कह कोन प्रमाणे।” आचार्य कहे, - "विज्ञमत ईश्वर-लक्षणे ॥" 80 ॥ शिष्य कहे,-“ईश्वर-तत्त्व साधि अनुमाने।” आचार्य कहे,-"अनुमाने नहे ईश्वर-ज्ञाने ॥" 81 ॥ अनुमान प्रमाण नहे ईश्वरतत्त्व-ज्ञाने। कृपा बिना ईश्वरेरे केह नाहि जाने ॥ 82 ॥ ईश्वरेर कृपा-लेश हयत' याहारे। सेइ त' ईश्वर-तत्त्व जानिबारे पारे ॥ 83 ॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके शिष्योंने पूछा, - "आप किस प्रमाणके आधारपर इन्हें ईश्वर कह रहे हैं।" श्रीगोपीनाथाचार्यने उत्तर दिया, - "ईश्वरके लक्षणके सम्बन्धमें विज्ञ (तत्त्वको जाननेवाले) व्यक्तियोंका मत ही प्रमाण है।" शिष्य कहने लगे, - "ईश्वर-तत्त्व अनुमानके द्वारा ही प्रमाणित होता है।" श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा, - “अनुमानके द्वारा ईश्वर-तत्त्वका ज्ञान नहीं होता। ईश्वर-तत्त्वको जाननेके लिये अनुमान प्रमाण नहीं है। ईश्वरकी कृपाके बिना उनको कोई भी नहीं जान सकता। जिसपर ईश्वरकी लेशमात्र भी कृपा होती है, वही ईश्वर-तत्त्वको जान सकता है॥ 80-83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - विज्ञको जो तत्त्व दिखलायी देता है, वह अज्ञ व्यक्तियोंके लिये कुछ भी नहीं है, - इसी कारणसे ही तुम इनको 'सामान्य मनुष्य' मान रहे हो; वास्तवमें इनमें भगवत्ता-लक्षणोंकी सीमा है। श्रीसार्वभौमके शिष्योंने श्रीगोपीनाथको कहा, - 'तुम किस प्रमाणके द्वारा इनको 'ईश्वर' कह रहे हो?' गोपीनाथने उत्तर दिया, - 'विज्ञ व्यक्ति जिन लक्षणोंके आधारपर ईश्वरको स्थापित करते हैं, मैं उन्हीं लक्षणोंके आधारपर ही इनको ईश्वर कह रहा हूँ।' शिष्योंने कहा, - ईश्वरतत्त्व अनुमानके द्वारा जाना जाता है। व्याप्तिज्ञान-लक्षण ही अनुमान है; जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' अर्थात् 'जहाँ धुआँ देखा जायेगा, वहाँ अग्नि है, ऐसा जानना होगा; 'धुआँ दिखाई दे रहा है, इसलिये पर्वतपर अग्नि हैं', यही बात यहाँ प्रमाणित होती है। ईश्वरके विषयमें अनुमान ऐसे कार्य करता है, - जैसे, जितनी वस्तुएँ देखी जाती हैं, सभीका ही कारण है; यह परिदृश्यमान जगत् भी एक वस्तु है; इसलिये इसका कोई कारण नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता। इसलिये ईश्वर-विश्वका कारण हैं', यह तत्त्व प्रमाणित हुआ। हम इसी प्रणालीसे ईश्वरतत्त्वका निरूपण करते हैं। आप यदि दिखा पायें कि ये संन्यासी इस युक्तिके अनुसार ईश्वर हो सकते हैं, तब हम मान सकते हैं।' श्रीगोपीनाथने उत्तर । 173