श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/142-144 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कहती है। श्रुतियोंका सूक्ष्मरूपसे विचार करनेपर सब प्रकारसे सविशेष-तत्त्व ही वेदोंका मुख्य तात्पर्य दिखलायी देता है॥ 142 ॥ श्रीभगवान् ही सभी कारकोंकी उद्दिष्ट-वस्तु :- ब्रह्म हैते जन्मे विश्व, ब्रह्मेते जीवय। सेइ ब्रह्मे पुनरपि हुये याय लय॥ 143 ॥ ‘अपादान’, ‘करण’, ‘अधिकरण’—कारक तिन। भगवानेर सविशेषे एइ तिन चिह्न॥ 144 ॥ अनुवाद—ब्रह्मसे ही इस विश्वकी सृष्टि होती है, ब्रह्मसे ही विश्वकी स्थिति रहती है और इसी ब्रह्ममें यह विश्व प्रलयके समय लीन हो जाता है। ‘अपादान’, ‘करण’ तथा ‘अधिकरण’–ये तीन कारक ही भगवान्के सविशेष रूपके तीन चिह्न हैं॥ 143-144 ॥ अनुभाष्य—(ऐतःउः 1/1/1-2)— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत् किञ्चन मिषत्। स इमान् लोकानसृजत।” (श्वेःउः 4/9)— “छन्दांसि यज्ञाः क्रु भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। यस्मान् मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः॥” (तैःउःभृः 1अः)— “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म।” वारुणि-भृगुके द्वारा पिता वरुणसे ब्रह्मके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें वरुणके यह वचन हैं। इस मन्त्रमें ‘यतः’ (जिस ब्रह्मसे विश्वका उदय हुआ है)—अपादान-कारक है; ‘येन’ (जिस ब्रह्मके द्वारा विश्व पालित है)—करण-कारक है; ‘यत’ अर्थात् ‘यस्मिन्’ (जिस ब्रह्ममें विश्व प्रवेश करता है)—अधिकरण-कारक है। श्रीराघवेन्द्र-यति कृत टीका— “अन्नमयं प्राणमयं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं मनोमयं वाङ्मयं विज्ञानमयं आनन्दमयञ्च इत्येवं नामैकदेशे नामग्रहण-न्यायेन अयं निर्देशो ध्येयः। विज्ञानमयानन्दमय एवाप्युपलक्ष्यौ, एतेन ब्रह्मवल्ल्यां पञ्चरूपोक्ति-रूपलक्षणम्। चक्षुर्मय-वाङ्मय-श्रोत्रमया अपि ग्राह्या इत्युक्तं भवति। तथाह्युक्तं ‘वाधूल’-शाखायाम्— “तस्माद्वा एतस्मात् अन्न-रसमयात् अन्योऽन्तर आत्मा वाङ्मयः। तस्माद्वा एतस्माद्वाङ्मयात् अन्योऽन्तर आत्मा चक्षुर्मयः। तस्माद्वा एतस्माच्चक्षुर्मयात् अन्योऽन्तर आत्मा श्रोत्रमयः। चक्षुर्मयत्वादेस्तु पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतरितः।” इति ऐतरेयभाष्योक्तरीत्या पूर्णदर्शन-शक्तित्व-पूर्णश्रवणशक्तित्व-पूर्णवक्तृत्वशक्तिस्वरूपा वा। यत्प्रयन्ति प्रलये। यदभि—स्वेच्छया—संविशन्ति मुक्तौ, तद्विजिज्ञासस्व।” (भाः1/5/20)—“इदं हि विश्वं भगवानिवेत्तरो यतो जगत्स्थान-निरोधसम्भवाः।” अर्थात् (ऐतरेय उपनिषद्—) “सृष्टिके पूर्व एकमात्र परमेश्वर ही थे, उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। उन्होंने ही इन समस्त लोकोंकी सृष्टि की है।” (श्वेताश्वतर उपनिषद्—) “वेदसमूह, सभी यज्ञ, समस्त क्रतु, व्रतसमुदाय, यह विश्व और वेदोंमें उक्त अन्यान्य भूत एवं भविष्यत् जो कुछ है, सभीकी मायाके अधीश्वर परमात्माने सृष्टि की है—जिससे अन्य सभी जीव उस मायासे बद्ध होकर रह रहे हैं।” (तैत्तिरीय उपनिषद्—) “जिनसे ये समस्त जीव उत्पन्न हुए हैं, जिनके द्वारा ही उन सब जीवोंका पालन होता है, जिनमें धावित होकर जीव अन्तमें लीन होते हैं, उनको ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करो, वे ही ब्रह्म हैं।” (श्रीराघवेन्द्र यतिकृत टीका—) “नामके एकदेश-ग्रहणके द्वारा वही नाम ही गृहीत होता है—इस न्यायानुसारसे ‘अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनोवाचं’, इनके द्वारा अन्नरसमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोतमय, मनोमय, वाङ्मय, विज्ञानमय, आनन्दमय ब्रह्म इस क्रमसे ऐसे निर्देश चिन्तनीय है। (उनमें) विज्ञानमय, आनन्दमय ये दो उपलक्ष्य (प्रयोजनीय) हैं; इसी कारण ब्रह्मवल्लीमें कथित पाँचरूप (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय)-उक्ति उपलक्षण हैं। यहाँपर चक्षुर्मय, वाङ्मय, श्रोतमय भी ग्रहणीय कहे गये हैं। वह ‘वाधुल-शाखा’में दिखायी देता है, जैसे,—‘वह
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