श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1034, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/143-147 ] इस अन्नरसमयसे भिन्न अन्य एक आत्मा वाङ्मय है। पहले मायाके प्रति दृष्टि-निक्षेप, उसके फलस्वरूप सृष्टि, वह इस वाङ्मयसे भिन्न अन्य एक आत्मा चक्षुर्मय है। इसलिये भगवान्की दृष्टि-दर्शनादि-अप्राकृत :- वह इस चक्षुर्मयसे भिन्न अन्य एक आत्मा श्रोतमय है। से काले नाहि जन्मे 'प्राकृत' मन-नयन। चक्षुर्मयत्व आदिका पूर्णदर्शनशक्तित्व होनेके कारण अतएव 'अप्राकृत' ब्रह्मोर नेत्र-मन॥ 146॥ चक्षुर्मय कहा गया है। अथवा ऐतरेय-भाष्यमें कथित रीतिके अनुसारसे पूर्णदर्शनशक्तित्व, पूर्णश्रवणशक्तित्व, अनुवाद-सृष्टिसे पहले 'प्राकृत' मन और नेत्रोंकी पूर्णवक्तृत्वशक्तिस्वरूप है। 'यत्प्रयन्ति' अर्थात् प्रलयकालमें उत्पत्ति ही नहीं हुई थी, इसलिये यह प्रमाणित होता है जीवगण जिनके प्रति (जिनकी ओर) गमन करते हैं। कि ब्रह्मके नेत्र और मन अप्राकृत हैं॥ 146 ॥ 'यदभिसंविशन्ति'-मुक्तगण स्वेच्छासे जिनमें सम्यक् प्रवेश अनुभाष्य-सृष्टि करनेके उद्देश्यसे प्राकृतशक्तिपर करते हैं, उनको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करो।" दृष्टिपात करनेसे पहले उन्होंने अप्राकृत नेत्रोंके द्वारा (श्रीमद्भागवतमें-) “यह विश्व भगवान्का अंशस्वरूप दृष्टिपात किया था। उस दर्शनके समय प्राकृत नेत्रोंकी है अर्थात् उनसे प्रपञ्च पृथक् नहीं है; परन्तु इस सृष्टि नहीं हुई थी, क्योंकि प्राकृत-सृष्टि यदि उससे प्रपञ्चसे भगवान् पृथक् हैं, जिनसे इस जगत्की पहले हुई होती, तो उनकी सृष्टि-प्रवृत्तिका उल्लेख सृष्टि-स्थिति-प्रलय होती है।" करनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। तब सविशेष-ब्रह्मका भाः (6/4/30) श्लोककी श्रीधर स्वामीकी टीका नित्य अप्राकृत मन था, जिसके द्वारा उन्होंने प्राकृत देखें॥ 143-144 ॥ सृष्टिका मनन किया था और उनके नित्य अप्राकृत नेत्र भी थे, जिनके द्वारा उन्होंने प्रकृति-शक्तिपर अद्वयज्ञान (एक) श्रीकृष्णसे अनेक प्रकाश दृष्टिपात किया था॥ 146॥ ही प्रत्यक् अथवा श्रौत सिद्धान्त है, विभुचित् या विष्णु-परतत्त्व श्रीकृष्ण ही भगवान् :- अनेकसे एकका सिद्धान्त-अश्रौत :- ब्रह्म-शब्दे कहे पूर्ण स्वयं भगवान्। भगवान् अनेक हैते यबे कैल मन। स्वयं भगवान् कृष्ण, -शास्त्रेर प्रमाण॥ 147 ॥ प्राकृत-शक्तिते तखन कैल विलोकन ॥ 145 ॥ अनुवाद-'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ पूर्ण स्वयं भगवान् है अनुवाद-भगवान्ने जब एकसे अनेक होनेकी और श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं,-यह शास्त्रोंका प्रमाण इच्छा की, तब उन्होंने प्राकृत शक्तिके ऊपर दृष्टिपात है॥ 147 ॥ किया॥ 145 ॥ अनुभाष्य-“शास्त्रयोनित्वात्” (ब्रः सूः 1/1/3) इस अनुभाष्य- (छाःउः 6ठा प्रः 2/3)- सूत्रके भाष्यमें श्रीमन्मध्वाचार्यपादने कहा है- “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।” “ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्। (तैःउः 2/6/1)- मूलरामायणञ्चैव शास्त्रमित्यभिधीयते॥ “सोऽकामयत् बहु स्यां प्रजायेयेति॥" यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम्। [(छाःउः)-उन सच्चिदानन्द भगवान्ने सङ्कल्प किया अतोऽन्यग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत्॥ इति स्कान्दे।” कि अनन्त चिद्-अचिन्मिश्र व्यष्टि जगत्रूपमें मैं ही अर्थात् ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद, महाभारत अनेक हो जाऊँ। (तैःउः) - उन सच्चिदानन्द भगवान्ने (पुराणसहित) सात्वत-तन्त्र, पञ्चरात्र और मूल रामायण-यही कामना की मैं अनेक हो जाऊँ] ॥ 145 ॥ 'शास्त्र'-शब्दसे कहे जाते हैं तथा इनके अनुकूल ग्रन्थ । 185