श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/143-150 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भी शास्त्रोंमें गिने जाते हैं; इनके अतिरिक्त अन्य जो सब ग्रन्थ हैं, वे शास्त्र ही नहीं हैं, परन्तु उन्हें ‘कुवर्त्म’ अर्थात् ‘कुमार्ग’ कहते हैं। आदिलीला, दूसरा अध्याय देखें ॥ 147 ॥ वेदके अर्थको पूर्ण करनेवाले और अति पुराने युगोंमें प्रकाशित होनेके कारण पुराण अर्थात् प्राचीन नाम :– वेदेर निगूढ़ अर्थ बुझन ना हय। पुराण-वाक्ये सेइ अर्थ करय निश्चय ॥ 148 ॥ अनुवाद—वेदोंके गूढ़ अर्थ सरलतासे समझमें नहीं आते, इसलिये पुराण वाक्योंके द्वारा उन अर्थोंको अच्छी प्रकारसे समझा जा सकता है॥ 148 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते”—(तैः भृः 1) आदि श्रुतिवाक्योंमें यह पाया जाता है, ‘यह चराचर विश्व ब्रह्मसे ही जन्म लेता है, ब्रह्मके द्वारा ही जीवित रहता है और उसी ब्रह्ममें ही पुनः लीन हो जाता है।’ इन सब वेदवाक्योंके द्वारा परब्रह्मके ‘अपादान’, ‘करण’ और ‘अधिकरण’-कारकत्व रूपी तीन प्रकारके लक्षण हैं। इन तीन प्रकारके नित्य-लक्षणोंके द्वारा भगवान् नित्य-सविशेषरूपमें व्यक्त होते हैं। “बहु स्याम्” (तैःउःब्रः 6 अः) आदि श्रुति-मतानुसार भगवान्ने जब अनेक होनेकी इच्छा की, तब “स ऐक्षत” (ऐतःउः 1/1) इस वाक्यके मतानुसार प्राकृत-शक्तिपर उन्होंने दृष्टिपात किया। उस समय प्राकृत मन और नेत्रोंकी सृष्टि नहीं हुई थी; इसलिये भगवान्ने जिस मनमें चिन्ता की, जिस नयनसे प्रकृतिके प्रति दृष्टिपात किया, वे मन और नेत्र प्राकृत सृष्टिके पहले ही थे। इसलिये परब्रह्मके स्वरूपगत अप्राकृत नेत्र और मन थे—यह सभी वेदोंके द्वारा सम्मत है। उपनिषद् वाक्योंमें प्रायः सर्वत्र ही ‘ब्रह्म’-शब्द पाया जाता है। वही ब्रह्म ही अपनी पूर्ण अवस्थामें स्वयं भगवान् है,—यही वेदसम्मत है और शास्त्र-प्रमाणके द्वारा भी यही सिद्ध हो रहा है कि श्रीकृष्ण ही वही स्वयं भगवान् हैं। यदि कहें, वेदोंमें इस प्रकारसे स्पष्ट वाक्य नहीं है (या फिर दिखाई नहीं देते), तब विचार करके देखो,—वेद वाक्योंके अर्थसमूह अत्यन्त निगूढ़ हैं। महर्षियोंने वेदवाक्योंके तात्पर्यको जगत्में समझानेके लिये पुराण-वाक्योंके द्वारा वेदोंके तात्पर्यका निर्णय किया है॥ 143-148 ॥ अनुभाष्य—श्रीजीवप्रभु-कृत तत्त्वसन्दर्भकी 12-17 संख्या और श्रीबलदेव-कृत टीका देखें॥ 148 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/32)— अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ 149 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नन्द-गोप और व्रजवासियोंके भाग्यकी कोई सीमा नहीं है, क्योंकि परमानन्दस्वरूप पूर्णब्रह्म-सनातन उनके मित्ररूपमें प्रकट हुए हैं॥ 149 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अभिमान चूर्ण-विचूर्ण होनेपर ब्रह्मा एकान्त शरणागत होकर श्रीकृष्णका स्तव करते-करते श्रीकृष्णप्रिय व्रजवासियोंके अत्यधिक प्रेम-सौभाग्यकी प्रशंसा कर रहे हैं— नन्द-गोपव्रजौकसां (नन्दराजप्रमुख-पञ्चरसावस्थितानां व्रजवासिनाम्) अहो भाग्यं; यत् (येषां व्रजवासिनां) मित्रं सनातनं (नित्यकालप्रकटितं) पूर्णम् (अखण्डं) परमानन्दं (सच्चिद्घनानन्दं), ब्रह्म। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 149 ॥ श्रुतिमन्त्रोंमें जड़विशेषाका खण्डन करके अप्राकृत सच्चिदानन्द-विग्रहत्व ही उद्दिष्ट :– ‘अपाणि-पाद’-श्रुति वर्जे ‘प्राकृत’ पाणि-चरण। पुनः कहे,—शीघ्र चले, करे सर्व ग्रहण ॥ 150 ॥ अनुवाद—‘अपाणि-पाद’-श्रुतिवचन ब्रह्मके ‘प्राकृत’ हाथ-पैर होनेका निषेध करती है, फिर वही श्रुति यह भी कहती है कि ब्रह्म तेजीसे चलते हैं और उनको अर्पित सब वस्तुओंको वे ग्रहण भी करते हैं॥ 150 ॥ 186 ।