श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1036, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/150–153 ] अनुभाष्य—(श्वेःउः 3/19)— “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥” अर्थात् “पुरुषोत्तम भगवान् अपने अप्राकृत सच्चिदानन्द स्वरूपमें सदा विराजमान हैं। उनके किसी प्रकारसे प्राकृत पैर-हाथादि नहीं हैं, किन्तु अपनी अचिन्त्यशक्तिके बलसे वे उन अप्राकृत पैरोंसे चलते हैं, हाथोंसे भक्तोंके द्वारा अर्पित द्रव्योंको ग्रहण करते हैं। केवल ऐसा ही नहीं है, उनके पैरोंसे चलनेकी गति इतनी अधिक है कि इस जगत्की किसी भी शक्तिके प्रयोगसे उतना गतिशील नहीं हुआ जा सकता। इसीके अनुरूप उनके अप्राकृत दोनों हाथ सर्वत्र विराजमान हैं, क्योंकि वे प्रेमीभक्तोंकी निवेदित वस्तुको सादर ग्रहण करते हैं। उनके प्राकृत नेत्र नहीं होनेपर भी वे उन अप्राकृत नेत्रोंके द्वारा सभीके द्रष्टा हैं। उनके प्राकृत कान नहीं होनेपर भी वे अपने अप्राकृत कानोंके द्वारा प्रेमी भक्तोंके द्वारा किया गया अपने अप्राकृत नाम-रूप-गुणादिका कीर्तन श्रवण करते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, परन्तु उनके अप्राकृत स्वरूपको कोई प्राकृत व्यक्ति नहीं जान सकता। एकमात्र जो उनके ऐकान्तिक भक्त हैं, वे उनकी कृपासे दिव्यज्ञान प्राप्त करके उनके असमोध्र्व अचिन्त्य स्वरूपको जान पाते हैं॥” 150 ॥ मुख्यवृत्तिमें सविशेषत्व और गौणवृत्तिमें निर्विशेषत्व :— अतएव श्रुति कहे, ब्रह्म—सविशेष। 'मुख्य' छाड़ि' 'लक्षणा'ते माने निर्विशेष॥ 151 ॥ अनुवाद—इसलिये श्रुतियाँ ब्रह्मको सविशेष कहती हैं। परन्तु मुख्य अभिधावृत्तिको छोड़कर लक्षणावृत्ति ग्रहण करनेवाले (मायावादी) ब्रह्मके स्वरूपको निर्विशेष रूपमें ही स्वीकार करते हैं॥ 151 ॥ अनुभाष्य—पूर्व-उल्लिखित श्रुतिके वचनोंने ब्रह्मके विशेषत्वका ही निरूपण किया है; किन्तु मुख्य अभिधावृत्तिका त्याग करके लक्षणाके द्वारा मायावादी निर्विशेष-मतवादकी स्थापना करते हैं। लक्षणाके द्वारा सिद्ध निर्विशेषत्व भी विशेषवादका ही एक परिचय मात्र है; जड़-जगत्की विशेषताओंसे ब्रह्मका पार्थक्य स्थापन करना उसका उद्देश्यमात्र है॥ 151 ॥ चिद्विलासका निर्विलासके रूपमें स्थापन ही मायावाद :— षडैश्वर्यपूर्णानन्द-विग्रह याँहार। हेन-भगवाने तुमि कह निराकार? ॥ 152 ॥ स्वाभाविक तिन शक्ति येइ ब्रह्मे हय। 'निःशक्तिक' करि' ताँरे करह निश्चय? ॥ 153 ॥ अनुवाद—जिनका षडैश्वर्यपूर्ण सच्चिदानन्द विग्रह है, उन भगवान्को आप निराकार कह रहे हैं? जिन ब्रह्मकी तीन स्वाभाविक शक्तियाँ हैं, क्या आप यह प्रमाणित करना चाहते हैं कि वे 'निःशक्तिक' अर्थात् शक्तिहीन हैं? ॥ 152–153 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता” (श्वेः उः 3/19)—यह श्रुति वाक्य है। ब्रह्मके 'प्राकृत हाथ-पैर नहीं हैं' ऐसा पहले कहकर बादमें 'शीघ्र चलते हैं और सभी वस्तुओंको ग्रहण करते हैं'—इस वाक्यके द्वारा 'अप्राकृत हाथ-पैर हैं' कहकर ब्रह्मको 'सविशेष' स्थापित किया है। श्रुतिके मुख्यार्थको छोड़कर लक्षणा-वृत्तिसे ब्रह्मके सविशेष-निषेधक निर्विशेषत्वका अन्यायरूपमें स्थापन कर रहे हैं। मायावादी ब्रह्मको नित्य निराकार कहकर स्थापित करते हैं, परन्तु शास्त्रके मतानुसार वे ब्रह्म षडैश्वर्य-पूर्णानन्द-विग्रहवाले भगवद्-स्वरूपमें नित्य विराजमान हैं। मायावादी ब्रह्मको 'निःशक्तिक' कहकर स्थापित करते हैं, किन्तु 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते” (श्वेः उः 6/8)—आदि अनेक वेदवाक्यमूलक शास्त्र वाक्योंमें उन ब्रह्मकी तीन स्वाभाविक शक्तियाँ स्वीकृत हुई हैं॥ 150–153 ॥ अनुभाष्य—शक्तिको अज्ञानके द्वारा उत्पन्न अनित्य विशेष-अवस्था माननेके कारण केवलाद्वैतवादियोंका विचार है कि निःशक्तित्व ही ब्रह्मका लक्षण है। किन्तु ब्रह्ममें तीन शक्तियाँ नित्य विराजमान होनेपर भी काल्पनिक । 187