भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1038

छठा अध्याय 6/158-163 चिद्विलासकी निर्विशेषरूपमें धारणा-दम्भमात्र :- षड्‌विध ऐश्वर्य-प्रभुर चिच्छक्ति-विलास। हेन शक्ति नाहि मान,—परम साहस॥161॥ भगवान् और जीवका नित्य भेद, केवल-अभेदवाद-नास्तिकता :- 'मायाधीश'-'मायावश'—ईश्वरे-जीवे भेद। हेन-जीवे ईश्वर-सह कह त' अभेद॥162॥ गीतामें 'जीव'-भगवच्छक्ति :- गीताशास्त्रे जीवरूप 'शक्ति' करि' माने। हेन-जीवे 'भेद' कर ईश्वरेर सने॥163॥ अनुवाद-ईश्वरका स्वरूप सच्चिदानन्दमय है। तीन अंशोंमें भगवान्‌की एक ही चिद्-शक्ति तीन रूपोंमें प्रकाशित होती है। आनन्द-अंशसे 'ह्लादिनी', सत्-अंशसे 'सन्धिनी' और चित्-अंशसे 'सम्वित्', वही सम्वित् ही श्रीकृष्ण-सम्बन्धीय ज्ञान है। 'अन्तरङ्गा' अर्थात् चिद्-शक्ति स्वयं, 'तटस्था' अर्थात् जीवशक्ति, 'बहिरङ्गा' अर्थात् मायाशक्ति-तीनों शक्तियाँ ही भगवान्‌की प्रेममयी सेवा करती हैं। भगवान्‌का षड्‌विध ऐश्वर्य ही उनकी चिद्-शक्तिका विलास है। उनकी ऐसी शक्तिको नहीं मानते हो, तो यह आपका दुःसाहस या धृष्टता है। ईश्वर मायाधीश हैं और जीव मायाके वशमें होने योग्य है, ऐसे जीवको ईश्वरके साथ अभेद कहते हो। गीताशास्त्रमें जीवको भगवान्‌की शक्ति कहा गया है, तो भी आप कहते हैं कि जीव और भगवान्‌में पूर्णतया भेद है (अमृतप्रवाह भाष्य देखें) ॥158-163॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वेद-वेदान्त-मतानुसार-ईश्वर, जीव और माया, इन तीन तत्त्वोंका स्वरूप और सम्बन्ध जानना आवश्यक है। सर्वप्रथम ईश्वरके स्वरूपको जानना अति आवश्यक है। ईश्वरका स्वरूप सच्चिदानन्दमय ही है। भगवान्‌की एक चिद्-शक्ति ही 'सत्', 'चित्' और 'आनन्द'-इन तीन अंशोंमें तीन रूपोंमें प्रकाशित होती है। आनन्द-अंशसे 'ह्लादिनी', सत्-अंशसे 'सन्धिनी' और चित्-अंशसे 'सम्वित्'। वही सम्वित् ही श्रीकृष्ण-सम्बन्धीय ज्ञान है। ईश्वरकी स्वरूपशक्ति तीन स्वरूपोंमें प्रकाशित होती है—'अन्तरङ्गा' अर्थात् चिद्-शक्ति स्वयं, 'तटस्था' अर्थात् जीवशक्ति, 'बहिरङ्गा' अर्थात् मायाशक्ति। इन तीन प्रकाशोंमें ह्लादिनी, सन्धिनी और सम्वित्‌के क्रियानुसार तीन-तीन भाव समझने चाहिये। चिद्-शक्ति अपनी ह्लादिनी और सम्वित्‌के मिलितसार (भक्ति), जीवको प्रदान करनेके बाद, जीवशक्ति यदि उसको ग्रहण करती है, तब निष्कपट-चिद्-शक्तिके प्रभावसे मायाशक्तिका आवरण- विक्षेपात्मक अचित्-विक्रम दूर होकर जीवको कृष्णप्रेमभक्तिका अधिकारी बना देता है। परमेश्वरका षड्‌विध ऐश्वर्य ही उनका ऐश्वर्य विलास है; उनको 'निराकार', 'निःशक्तिक' कहनेसे अत्यन्त अवैदिक वाक्यका प्रयोग होता है। ईश्वर-स्वभावतः ही मायाके अधीश्वर हैं; जीव-स्वभावतः ही अणु-चैतन्य होनेके कारण मायाके वशमें होने योग्य है। मुण्डकोपनिषद् (3/1/1-2)में कहा गया है- “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः॥” अर्थात् “प्रत्येक जीवके देहरूप वृक्षमें परमात्मा और आत्मा, दोनों सख्यभावसे नित्य वास करनेपर भी जीवात्मा विवर्तवशः अपने पुराने और वर्तमान कर्मफलोंका भोक्ता है, इसी अभिमानमें आसक्त होता है। किन्तु परमात्मा यद्यपि उसी वृक्षमें अवस्थान करते हैं, किन्तु वे किसीरूपमें कर्मफलके भोक्ता नहीं हैं, केवल साक्षीरूप और प्रयोजककर्त्ताके रूपमें अवस्थान करते हैं। माया उनको स्पर्श नहीं कर पाती। जीवका तटस्थ धर्म और बहिर्मुख वृत्ति होनेके कारण वह सब समय मायाके तीन तापोंसे दग्ध होता है। जीव यदि किसी रूपमें अज्ञात पारमार्थिक सुकृति लाभ करे, तभी वह स्वयंको मायाके हाथोंसे छूटनेमें असहाय और बलहीन पाता है और तब वह चिद्बल पानेके लिये व्याकुल । 189

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