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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1039

[ 6/158–166 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

होता है। तब साक्षी पुरुषरूपी परमात्मा उसको तत्त्वज्ञ और तत्त्वदर्शी गुरुके द्वारा कृपा प्रदान करते हैं। उस कृपाको ग्रहणकर वह गुरुके आनुगत्यमें भक्ति करते हुए भगवान्‌के सच्चिदानन्दरूपको जानकर मायासे अतीत वैकुण्ठ या गोलोकमें भगवान्‌की नित्य सेवा प्राप्त करता है।” अर्थात् 'ईश्वरको भूलनेपर जीव दण्डका भागीदार होता है, ईश्वरके द्वारा बनाये गये कारागारकी रक्षयित्री माया उस अपराधके कारण जीवको कारागारमें बन्द करके दण्ड देती है।' यहाँपर यह प्रमाणित होता है कि ईश्वर स्वभावतः मायाके अधीश हैं, मायाके वशीभूत नहीं। जीवके स्वभावमें मायारहित सत्ता रहनेपर भी मायाके वशमें होने योग्य एक धर्म है, उसीका नाम ही 'तटस्थत्व' है, इसलिये जीवको तटस्थ कहा जाता है। जब जीवमें ऐसा स्वभावगत (मायाके वशीभूत होने योग्य) और स्वरूपगत (मायारहित सत्ता) नित्य भेद है, तब ऐसा नहीं कह सकते कि किसी विशेष अवस्थामें जीव ईश्वरसे अभेद है। और, गीताशास्त्रमें जीवोंको 'शक्ति' कहा गया है, तब “शक्तिशक्तिमतोरभेदः” इस वेदान्त वाक्यके अनुसार ईश्वरके साथ जीवका जो अभेद बतलाया गया है, उसे भी स्वीकार करनेके लिये हम बाध्य हैं। ईश्वर और जीव तत्त्वका यही अचिन्त्यभेदाभेद ही रहस्य है॥158-163॥

अनुभाष्य—आदिलीला 4/61-62 संख्या देखें॥158-159॥


[R1] अनुवाद—मेरी बहिरङ्गा प्रकृति भूमि, जल, अग्नि, [R2] वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार—इन आठ [R3] भागोंमें विभक्त है। किन्तु, आठ भेदोंवाली यह जड़ा [R4] प्रकृति निकृष्टा है। इससे उत्कृष्ट जीवस्वरूपा मेरी एक [R5] और प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने [R6] कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥164-165॥

[R7] अमृतप्रवाह भाष्य—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, [R8] मन, बुद्धि और अहङ्कार—ये आठ मेरी ही अपरा [R9] शक्तिकी विशेष वृत्तियाँ हैं; जीवतत्त्व इससे पृथक् [R10] है॥164-165॥

[R11] अनुभाष्य—अर्जुनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णकी उक्ति- [R12] भूमिः, आपः, अनलः, वायुः, खं, मनः, बुद्धिः, अहङ्कारः [R13] च इति अष्टधा मे (मम) भिन्ना प्रकृतिः (बहिरङ्गाख्या शक्तिः) [R14] एव। (भूम्यादि-शब्दैः पञ्च महाभूतानि, सूक्ष्मभूतैः रूपरसगन्ध- [R15] शब्दस्पर्शादिभिः सहैकीकृत्य संगृह्यन्ते; अहङ्कार-शब्देन [R16] तत्तत्कार्यभूतानीन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थानि तत्तत्कारण- [R17] भूतमहत्तत्त्वमपि गृह्यते। बुद्धिममनसोः पृथगुक्तिस्तत्त्वेषु तयोः [R18] प्राधान्यात्)।

[R19] श्लोक-भावानुवाद—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, [R20] मन, बुद्धि और अहङ्कार, —यह मेरी आठ प्रकारकी [R21] बहिरङ्गा कहलानेवाली शक्ति है। (भूमि आदि शब्दसे [R22] पाँच महाभूत और उनके साथ सूक्ष्मभूत रूप, रस, [R23] गन्ध, स्पर्श, शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ मिलाकर जानना [R24] होगा; अहङ्कार शब्दसे उन-उन कार्योंको करनेवाली [R25] इन्द्रियाँ—वाणी, हाथ, पैर, मल-मूत्र द्वार तथा उनके [R26] कारणस्वरूप महत्तत्त्वको ग्रहण करना होगा। बुद्धि और [R27] मनको उनकी प्रधानताके कारण अलग तत्त्व कहा गया [R28] है।)

[R29] श्लोक संख्या 165 के लिये आदिलीला 7/118 [R30] संख्या देखें॥164-165॥


भगवान्‌की गुण-माया और जीव-माया :— श्रीमद्भगवद्गीता (7/4-5)— भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधा ॥164॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥165॥

भगवद्-विग्रह—सच्चिदानन्दमय :— ईश्वरेर श्रीविग्रह सच्चिदानन्दाकार। से-विग्रहे कह सत्त्वगुणेर विकार ॥166॥

190 ।

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