भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1041

[ 6/168-171 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

उनके सिद्धान्तमें निःशक्तिक-ब्रह्म—जड़मय अर्थात् 'ज्ञान', 'ज्ञेय', 'ज्ञाता',—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित है। जड़ाभिमानसे ग्रस्त उनका विचार-निपुणतारूपी 'अज्ञान' प्रबल होनेके कारण वे समझते हैं कि सच्चिदानन्द विग्रहमें भी चिन्मय 'ज्ञान', 'ज्ञेय', 'ज्ञाता'—ये धर्म नहीं हैं। वास्तवमें अज्ञानमय अवस्थाके कारण उनका इस प्रकार कहना है। इसलिये मायावादियोंकी वास्तविक वस्तुके (भगवान्के) ज्ञानके सम्बन्धमें उनके अस्तित्वको ही नकारनेवाली बुद्धि है॥168॥

ब्रह्मसूत्रमें ही जीवका परम कल्याण, शाङ्करभाष्यमें जीवका सर्वनाश निहित :— जीवेर निस्तार लागि' सूत्र कैल व्यास। मायावादि-भाष्य शुनिले हय सर्वनाश॥169॥

अनुवाद—जीवोंका उद्धार करनेके लिये श्रीव्यासदेवने ब्रह्मसूत्रकी रचना की, परन्तु जो इन सूत्रोंके मायावादी भाष्यको सुनता है, तो उसका सर्वनाश हो जाता है॥169॥

अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीव्यासदेवके सूत्रोंमें शुद्धभक्तिवाद है। मायावादियोंने उन सूत्रोंके जो भाष्य लिखे हैं, उनमें परब्रह्मका चिन्मय विग्रह अस्वीकृत हुआ है और जीवोंकी ब्रह्मसे पृथक् सत्ता भी अस्वीकृत हुई है, इसलिये वे शुद्धभक्तितत्त्वके अत्यन्त विरुद्ध हैं। इसलिये मायावादियोंके भाष्यको सुननेसे जीवका सर्वनाश होता है, क्योंकि ब्रह्मके साथ एक होनेकी इच्छारूपी दुराशासे उत्पन्न अभिमानके द्वारा शुद्धभक्ति नष्ट होती है और वास्तवमें यह ईश्वरको नहीं मानना है॥169॥

शक्तिपरिणामवाद ही ब्रह्मसूत्रमें उद्दिष्ट :— 'परिणाम-वाद'—व्याससूत्रे सम्मत। अचिन्त्यशक्ति ईश्वर जगद्रूपे परिणत॥170॥

अनुवाद—'परिणाम-वाद' श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रके द्वारा सम्मत है, अर्थात् भगवान्की अचिन्त्यशक्ति जड़-जगत्के रूपमें परिणत हुई है॥170॥

अनुभाष्य—आदिलीला 7/121-133 संख्याका अनुभाष्य देखें॥170॥

प्राकृत चिन्तामणिका दृष्टान्त; शक्ति परिणत होनेपर भी शक्तिमान् अविकृत :— मणि यैछे अविकृते प्रसवे हेमभार। जगद्रूप हय ईश्वर, तबु अविकार॥171॥

अनुवाद—प्राकृत चिन्तामणिमें जैसे बहुत स्वर्णका प्रसव करनेपर भी कोई विकार नहीं आता, उसी प्रकार अपनी अचिन्त्य शक्तिके द्वारा गुणमय जगत्के रूपमें प्रकाशित होनेपर भी भगवान् अपने नित्य अप्राकृत स्वरूपमें ही रहते हैं॥171॥

अनुभाष्य—शक्ति-परिमाणवाद ही 'जन्माद्यस्य' सूत्रके द्वारा सम्मत है। असंख्य, अनन्त नित्यशक्ति जिनसे उत्पन्न होती है, जिनमें स्थित और अव्यक्त रहती है, तथा शक्तिसमूह जिनके अधीन हैं, ऐसी शक्तिसमूहके प्रभु ही 'ईश्वर' हैं। अनन्त रूपोंमें विराजमान नित्य-अनित्य-शक्ति, आत्म-अनात्म-शक्ति आदिकी एक ही साथ ईश्वरमें अवस्थिति किस प्रकारसे सम्भव है, उसको जीव वर्तमान जड़-बद्धावस्थामें मायाशक्तिके अधीन रहते समय समझ नहीं सकता। इसलिये मानवज्ञानसे इस प्रकारके परस्पर विरुद्ध गुणोंका समाश्रय अचिन्त्य होनेपर भी ईश्वरमें नित्य अवस्थित है। मानव जड़ज्ञानके अहङ्कारके कारण अपने क्षुद्र अज्ञानरूपी सामर्थ्यको झूठी-कल्पनाके द्वारा बहुत बड़ा मानकर, जिस शक्ति-रहितरूप एक अवस्थाकी 'ब्रह्म'के रूपमें कल्पना करता है, वह (ब्रह्म न) होकर चिन्त्य-शक्तिका प्रकारभेद मात्र है। उसके द्वारा जगत्को ईश्वरका 'परिणाम' समझनेसे 'विवर्त्तवाद' को अवश्य ही ग्रहण करना पड़ेगा। किन्तु ईश्वरत्वमें अचिन्त्य नित्यशक्तिमत्ता निहित है, इसका ज्ञान होनेपर यह भी समझमें आयेगा कि ईश्वर अपनी बहिरङ्गा-मायाशक्तिके द्वारा परिणत खण्डज्ञान-गम्य राज्यमें (अर्थात् इस भौतिक जगत्में) भी प्रकाशित अथवा अवतीर्ण हो

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